कंपनी में सामान्य कर्मचारी की तरह काम करते थे रतन टाटा, पिता से इस बात को लेकर हो गया था मतभेद

रतन टाटा के पिता जे.आर.डी ने उन्हें टाटा स्टील में भेज दिया था। यहां वह एक कर्मचारी की तरह मेहनत करते थे। वह जब पहली बार फैक्ट्री पहुंचे तो उन्होंने ‘ब्लू यूनिफॉर्म’ पहनी हुई थी।

Ratan Tata, Tata Group
बिजनेसमैन रतन टाटा (फाइल फोटो)

जाने-माने बिजनेसमैन रतन टाटा का बचपन काफी मुश्किलों से गुजरा। रतन की परवरिश उनकी दादी नवजबाई ने की थी। यही वजह थी कि जब दादी की तबीयत खराब हुई तो रतन टाटा सबकुछ छोड़कर भारत वापस लौट आए थे। भारत आने के बाद वह ज्यादातर समय अपनी दादी के साथ बिताया करते थे। साल 1962 में भारत आने के बाद रतन टाटा ने अपने व्यवसाय को भी समझने का फैसला किया।

इस दौरान उनके पिता जेआरडी टाटा कंपनी के चेयरमैन थे। टाटा ग्रुप के चेयरमैन की हैसियत से जेआरडी ने रतन को स्टील प्लांट में काम करने के लिए जमशेदपुर भेज दिया था। उन्हें टाटा स्टील में भेजने का मुख्य कारण था कि वह कंपनी के तौर-तरीके और कई अहम चीजों को समझ सकें। आर.सी गुप्ता ने अपनी किताब ‘ए कंप्लीट बायोग्राफी ऑफ रतन टाटा’ में इसका विस्तार से जिक्र किया है।

कर्मचारी बनकर पहुंचे फैक्ट्री: आर.सी गुप्ता लिखते हैं, रतन एक तेज-तर्रार युवा के रूप में फैक्ट्री में दाखिल हुए थे। लेकिन वह फैक्ट्री के कर्मचारियों से खुद को कभी भी अलग नहीं मानते थे। वह जब टाटा स्टील में गए तो यहां उन्होंने अन्य कर्मचारियों की तरह ‘ब्लू यूनिफॉर्म’ पहनी हुई थी। ये यूनिफॉर्म आमतौर पर फैक्ट्री में काम करने वाले कर्मचारी ही पहनते थे। यहां रतन ने फैक्ट्री में होने वाले सभी काम भी किए, जिसमें फावड़े से चूना-पत्थर निकालना और भट्टी में किसी मेहनतकश मजदूर की तरह काम तक करना शामिल था।

पिता से मतभेद: धीरे-धीरे वह कंपनी के ढांचे को समझने लगे तो साल 1971 में उनके पिता और चेयरमैन जे.आर.डी ने उन्हें नेशनल रेडियो एंड इलेक्ट्रॉनिक कंपनी (NELCO) की जिम्मेदारी भी दे दी। NELCO उस समय आर्थिक नुकसान झेल रही थी। ये वो समय था जब किसी को कंपनी के कामयाब होने की उम्मीद भी नहीं थी।

रतन ने कंपनी के चेयरमैन को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि NELCO में कंपनी ज्यादा निवेश करना चाहिए। जबकि जे.आर.डी और रतन के बीच इस बात को लेकर मतभेद था। जे.आर.डी निवेश करना नहीं चाहते थे।

ये वो समय था जब भारत में लाइसेंस राज चलता था। नतीजा ये हुआ कि कंपनी को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। इससे रतन टाटा को एक नई ऊर्जा और काम करने का नया तरीका मिला। उन्होंने कंपनी में कई बदलाव किए जो आगे चलकर फायदेमंद ही साबित हुए।

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