राजनीति के उस पार: विवादों में सपा नेता रामगोपाल यादव पर आई किताब, बिना कुछ किए कवर पर छपा वेद प्रताप वैदिक का नाम

प्रो. रामगोपाल यादव पर केंद्रित हाल ही में आई किताब विवादों में आ गई है। विवाद दो हैं। एक तो शीर्षक को लेकर और दूसरा संपादन को लेकर।

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करीब सात साल बाद अब “राजनीति के उस पार” नाम से एक नई किताब आई (Photo – Prof. Ram Goapal Yadav/Twitter)

समाजवादी पार्टी के महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव पर केंद्रित एक किताब इन दिनों चर्चा में है। किताब का शीर्षक है ‘राजनीति के उस पार’। बीते 23 नवंबर को रामगोपाल यादव के 75वें जन्मदिन के मौके पर लखनऊ में इस किताब का विमोचन किया गया। कार्यक्रम में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश के अलावा वैचारिक मतभेद से परे दूसरे सियासी दलों के नेताओं ने भी शिरकत की। जिसमें कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी, आम आदमी पार्टी के राज्‍यसभा सदस्‍य संजय सिंह, कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार अंजान प्रमुख थे। मुख्य अतिथि के तौर पर डॉ. कुमार विश्वास मंच संभालते नजर आए।

विमोचन को अभी एक पखवाड़ा भी नहीं बीता है कि प्रो. रामगोपाल यादव पर केंद्रित यह किताब विवादों में आ गई है। विवाद दो हैं। एक तो किताब के शीर्षक को लेकर और दूसरा किताब के संपादक मंडल को लेकर। दरअसल, जिस नाम से यह किताब आई है, इसी नाम से 7 साल पहले यानी 2014 में एक किताब छप चुकी है और वह किताब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के गैर- राजनीतिक भाषणों का संग्रह है।

संपादक मंडल को लेकर क्यों है विवाद? आपको बता दें कि प्रो. रामगोपाल यादव पर केंद्रित किताब पर संपादक के तौर पर प्रो. देवी प्रसाद द्विवेदी, प्रो. पुष्पेश पंत और वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेद प्रताप वैदिक का नाम दर्ज है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि डॉ. वैदिक का किताब से कोई साबका ही नहीं है। यह बात खुद उन्होंने ही स्वीकार की है।

‘ऐसे ही छाप दिया मेरा नाम’: किताब के संपादक मंडल में शामिल डॉ. वेदप्रताप वैदिक का कहना है कि उन्हें नहीं मालूम कि इसी नाम से अटल बिहारी वाजपेयी की कोई किताब पूर्व में प्रकाशित हो चुकी है। ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक वैदिक का कहना है कि संपादक के तौर पर उनका नाम यूं ही दे दिया गया। यहां तक कि उन्होंने किताब देखी भी नहीं है और विमोचन में भी नहीं गए थे।

उधर, प्रो. पुष्पेश पंत भी वाजपेयी की किताब के बारे में जानकारी से इनकार करते हैं। वे कहते हैं कि उन्हें किताब के कुछ अंश भेजे गए थे, जिसका उन्होंने संपादन किया है। प्रो. पंत के मुताबिक संपादन के लिए उनसे प्रो. रामगोपाल ने नहीं, बल्कि उनके कुछ करीबियों ने संपर्क किया था।

मुलायम ने दिया था कुमार विश्वास को ऑफर: इस पुस्तक विमोचन के दौरान राजनीति से इतर गपशप दिखी थी। कार्यक्रम का संचालन करते हुए लोकप्रिय कवि कुमार विश्वास ने कहा था, ‘राजनीति के उस पार’ का मतलब सभी विचारों के लोगों का एक साथ बैठना। हां…एक कमी जरूर दिखी कि भाजपा नेता कार्यक्रम में नहीं दिखे। दिखते दो यही राजनीति की खूबसूरती होती’।

वहीं, कार्यक्रम के दौरान कवि उदय प्रताप सिंह मंच पर मौजूद मुलायम सिंह यादव की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि, ‘कुमार विश्वास बड़े कवि के रूप में नज़र आते हैं… नेताजी हमारे कान में कह रहे हैं कि अगर ये कहीं नहीं हैं तो इन्हें समाजवादी पार्टी में ही क्यों नहीं ले आते हैं?’ इस पर सब ठहाका लगाकर हंस पड़ते हैं। मुलायम भी मुस्कुराने लगते हैं।

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