बहुत ज्यादा एंग्जायटी (बेचैनी या घबराहट) केवल मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका असर शारीरिक सेहत, रिश्तों, काम और रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ सकता है। इसके बावजूद कई लोग यह समझ नहीं पाते कि आखिर कब उन्हें प्रोफेशनल मदद लेने की जरूरत है। हाल ही में नेहा धूपिया और अंगद बेदी के चैट शो ‘डबल डेट’ में प्रिंस नरूला ने अपनी जिंदगी के सबसे कठिन दौर के बारे में खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा भी था जब एंग्जायटी ने उनकी सेहत के साथ-साथ युविका चौधरी के साथ उनके रिश्ते को भी प्रभावित किया था।

“मैं रोज 18 गोलियां लेता था”

उस मुश्किल दौर को याद करते हुए प्रिंस नरूला ने कहा, “एक समय ऐसा था जब मैं रोज 18 गोलियां लेता था। मुझे घबराहट, रात में डर लगना, वजन बढ़ना और कई तरह की मेडिकल परेशानियां थीं। यह मेरी जिंदगी का सबसे मुश्किल दौर था। म्यूजिक ने मेरी बहुत मदद की। जब मैं मुश्किल दौर से गुजर रहा था, तो म्यूजिक से मुझे सुकून मिलता था।”

उन्होंने अपनी पत्नी युविका चौधरी के सहयोग का जिक्र करते हुए कहा, “जब हालात बहुत मुश्किल थे, तब वह मेरे साथ खड़ी रहीं।”

रिश्ते पर भी पड़ा मानसिक तनाव का असर

प्रिंस ने स्वीकार किया कि उस समय मानसिक तनाव का असर उनके रिश्ते पर भी पड़ा था। उन्होंने कहा, “न तो युविका गलत थी और न ही मैं। हम दोनों ही सही मानसिक स्थिति में नहीं थे।”

हालांकि, उन्होंने बताया कि बेटी के जन्म के बाद उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया। “बच्चा होने के बाद ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई है। अब हम एक-दूसरे से लड़ते भी नहीं हैं। और अगर लड़ते भी हैं, तो अपनी बेटी को देखकर ही मामला सुलझ जाता है।”

अलग रहने की अफवाहों पर भी दी सफाई

प्रिंस नरूला ने अपनी शादी को लेकर फैली अफवाहों पर भी बात की। उन्होंने कहा, “जब मैंने वह ब्लॉग पोस्ट किया था, तो लोगों ने मेरी बात का गलत मतलब निकाल लिया। वह एक ऐसा दौर था जब मैं बहुत दबाव में था।”

उन्होंने बताया कि युविका की प्रेग्नेंसी के दौरान वे घर बनवाने, काम और दूसरी जिम्मेदारियों को एक साथ संभाल रहे थे। उनका उद्देश्य था कि बच्चा नए घर में आए। इसी वजह से उन्होंने युविका को धूल से होने वाली एलर्जी से बचाने के लिए कुछ समय अपनी मां के घर रहने के लिए कहा था।

प्रिंस ने स्पष्ट किया, “उस समय, मैंने एक व्लॉग में कहा था कि ‘हम अब साथ नहीं रहते।’ मेरा मतलब था कि वह अपने घर पर रह रही थीं और मैं अपने घर पर। लोगों को लगा कि हम अब साथ नहीं हैं, लेकिन हम सिर्फ दूरी की वजह से अलग-अलग जगहों पर थे।”

कब समझें कि एंग्जायटी के लिए प्रोफेशनल मदद की जरूरत है?

इस विषय पर ‘द आंसर रूम’ की लाइसेंस्ड रिहैबिलिटेशन काउंसलर और साइकोथेरेपिस्ट सोनल खंगारोत ने Indian Express से बातचीत में बताया कि गंभीर एंग्जायटी सामान्य तनाव से अलग होती है।

उनके अनुसार, “जहां तनाव मुश्किल हालात के प्रति एक सामान्य प्रतिक्रिया है और आमतौर पर हालात ठीक होने पर कम हो जाता है, वहीं एंग्जायटी डिसऑर्डर में लगातार, बहुत ज्यादा चिंता या डर बना रहता है जिसे कंट्रोल करना मुश्किल होता है। यह रोजमर्रा की जिंदगी में रुकावट डालने लगता है।”

उन्होंने बताया कि इसके सामान्य लक्षणों में दिल की धड़कन तेज होना, नींद में परेशानी, बेचैनी, ध्यान लगाने में कठिनाई, मांसपेशियों में तनाव, भूख या वजन में बदलाव और डर की वजह से कुछ परिस्थितियों से बचना शामिल हो सकता है।

इन संकेतों को नजरअंदाज न करें

सोनल खंगारोत के मुताबिक, यदि एंग्जायटी कई हफ्तों या महीनों तक बनी रहे, बार-बार पैनिक अटैक आएं, काम या रिश्तों पर असर पड़ने लगे, लगातार नींद की समस्या हो, शराब या नशीले पदार्थों का सहारा लेना पड़े या मेडिकल जांच के बावजूद शारीरिक लक्षण बने रहें, तो प्रोफेशनल मदद लेनी चाहिए।

उन्होंने कहा, “सबसे जरूरी बात यह है कि खुद को नुकसान पहुंचाने, निराशा या आत्महत्या के विचारों के मामले में तुरंत प्रोफेशनल मदद की जरूरत होती है। किसी क्वालिफाइड मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल से शुरुआती जांच कराने से असल वजह का पता लगाने और सही इलाज शुरू करने में मदद मिल सकती है।”

रिश्तों पर एंग्जायटी का क्या असर पड़ता है?

सोनल खंगारोत बताती हैं कि एंग्जायटी व्यक्ति के सोचने और रिश्तों को देखने के तरीके को बदल सकती है। लगातार चिंता की वजह से सामान्य बातचीत भी तनावपूर्ण लग सकती है। कई बार व्यक्ति जवाब मिलने में हुई थोड़ी-सी देरी को लेकर जरूरत से ज्यादा सोचने लगता है, अपनी भावनाएं खुलकर व्यक्त नहीं कर पाता, बार-बार भरोसा चाहता है या फिर खुद को सबसे अलग कर लेता है।

इसका असर समय के साथ बातचीत, विवाद सुलझाने की क्षमता और भावनात्मक जुड़ाव पर पड़ सकता है।

एंग्जायटी से उबरने और रिश्तों को बेहतर बनाने के तरीके

एक्सपर्ट के मुताबिक, एंग्जायटी को मैनेज करने और रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए कुछ कदम मददगार हो सकते हैं।

थेरेपी: CBT, ACT और माइंडफुलनेस आधारित थेरेपी एंग्जायटी को समझने और उसे बेहतर तरीके से संभालने में मदद कर सकती हैं।

हेल्दी लाइफस्टाइल: नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, संतुलित भोजन और कैफीन या शराब का सीमित सेवन मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है।

क्रिएटिव एक्टिविटीज: संगीत, कला, जर्नलिंग या अन्य रचनात्मक गतिविधियां तनाव कम करने और भावनाओं को व्यक्त करने में मदद कर सकती हैं।

सोशल सपोर्ट: परिवार, दोस्तों या सपोर्ट ग्रुप से खुलकर बात करना भावनात्मक सहारा देता है।

रिलेशनशिप सपोर्ट: ईमानदार बातचीत, सहानुभूति, मिलकर समस्याओं का समाधान और जरूरत पड़ने पर कपल थेरेपी रिश्तों को मजबूत बनाने में मदद कर सकती है।

DISCLAIMER: यह लेख पब्लिक डोमेन में मौजूद जानकारी और विशेषज्ञों से मिली जानकारी पर आधारित है।