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आखिर क्यों हो जाता है गर्भपात? इन तरीकों को अपनाकर इस खतरे को किया जा सकता है कम

गर्भपात सामान्यतः गर्भाधारण के 20वें सप्ताह में होता है। इसमें ठीक तरह से भ्रूण के विकसित न होने पर गर्भवती महिला का शरीर प्राकृतिक रूप से उसे निष्कासित कर देता है।

40 साल की उम्र में महिलाओं में गर्भपात होने का खतरा तकरीबन 20 गुना होता है।

गर्भपात सामान्यतः गर्भाधारण के 20वें सप्ताह में होता है। इसमें ठीक तरह से भ्रूण के विकसित न होने पर गर्भवती महिला का शरीर प्राकृतिक रूप से उसे निष्कासित कर देता है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ गर्भपात का खतरा बढ़ता जाता है। 40 साल की उम्र में महिलाओं में गर्भपात होने का खतरा तकरीबन 20 गुना होता है। गर्भपात हो जाने के कई कारण होते हैं लेकिन इस मामले में अक्सर महिलाएं खुद को दोषी मानने लगती हैं। ऐसे में उन्हें इसके बारे में पूरी जानकारी होना जरूरी हो जाता है। आइए, जानते हैं गर्भपात के बारे में कुछ खास जानकारियां –

क्यों होता है गर्भपात – गर्भपात के कई सारे कारण होते हैं। गर्भवती महिला को स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो तो भी गर्भपात की संभावना बनी रहती है। डायबिटीज, हाइपोथाइरॉइडिज्म या अन्य कोई एंडोक्रिनोलॉजिकल डिसऑर्डर की वजह से भी गर्भपात हो सकता है। इसके अलवा बहुत ज्यादा मात्रा में एल्कोहल, कैफीन या सिगरेट के सेवन से भी गर्भपात की संभावना बनती है। गर्भपात के बहुत से मामलों में माता-पिता में से किसी एक के गुणसूत्रों में असामान्यताएं भी वजह बनती हैं। फाइब्रॉइड, यूटेरिन पर्फोरेशन, संक्रमण, गर्भाशय की दीवारों के कमजोर हो जाने आदि वजहों से भी गर्भपात हो सकता है।

क्या होते हैं गर्भपात के लक्षण – गर्भपात में कुछ सामान्य लक्षण दिखाई देते हैं जिन्हें पहचानना जरूरी होता है। इनमें योनि से रक्त स्राव, पेट में लगातार दर्द, कमर के निचले हिस्से में दर्द, वेजिना से सेमी-सॉलिड पदार्थ का स्राव आदि शामिल हैं।

इन तरीकों से रोक सकते हैं गर्भपात –

1. तनाव बिल्कुल न लें। तनाव के कारण शरीर पर बोझ आ सकता है। ऐसे में स्ट्रेस फ्री जीवन जीना बहुत महत्वपूर्ण है। ऑफिस में बहुत अधिक काम न करें और रात में पार्टी में न जाएं। ज्यादा से ज्यादा आराम करें।

2. आयुर्वेदिक उपाय भी गर्भपात के खतरे को कम करने में आपकी मदद कर सकते हैं। त्रिफला चूर्ण एक आयुर्वेदिक औषधि है जो महिलाओं में तमाम दोषों को दूर करती है तथा असंतुलन को ठीक करती है। गर्भधारण के पहले किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श कर इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

3. गर्भावस्था के दौरान सात्विक आहार लें। ऐसा आहार लें जो आसानी से पच जाए। ऐसा आहार स्वस्थ आहार होता है। इस दौरान मसालेदार, बासी खाना तथा तैलीय खाद्य पदार्थों से परहेज करें।

4. श्वसन संबंधी व्यायाम, समय से सोना और मेडिटेशन (ध्यान करना) इस दौरान बहुत महत्वपूर्ण हैं। इससे स्वास्थ्य अच्छा रहता है और गर्भावस्था में सहायता मिलती है।

5. गर्भावस्था के दौरान हल्का-फुल्का व्यायाम भी लाभदायक होता है। गर्भावस्था के दौरान शरीर को लचीला बनाये रखने के लिए वॉक और योगा करना फायदेमंद है।

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