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नवजात शिशुओं के लिए मां के दूध से बेहतर और कुछ नहीं : विशेषज्ञ

यह फूड एलर्जी शुरूआती छह माह में अपनी जड़ें जमा लेती है और इससे प्रभावित ज्यादातर बच्चों में शरीर के एक या अधिक अंगों में एक या अधिक लक्षण पाए जाते हैं। इन अंगों में पाचन नलिका और/अथवा त्वचा शामिल हैं।

Author Published on: August 6, 2017 6:06 PM
भारत में पिछले दशक में स्तनपान की दिशा में सकारात्मक चलन देखा गया है। (संकेतात्मक तस्वीर)

विशेषज्ञों का कहना है कि नवजात शिशुओं के लिए मां के दूध से बेहतर और कोई आहार नहीं है क्योंकि मां के दूध में पर्याप्त पोषक तत्व पाए जाते हैं, और यह धारणा गलत है कि गाय का दूध नवजात शिशुओं के लिए मां के दूध का विकल्प हो सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो अगर नवजात शिशुओं को गाय का दूध दिया जाए तो उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कई जटिलताएं हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि कई घरों में, खास कर शहरी इलाकों में मां कई कारणों से बच्चों को स्तनपान नहीं करा पाती। इन कारणों में जागरूकता का अभाव, काम का दबाव और स्तनपान कराने के लिए सुविधा का अभाव आदि प्रमुख हैं। भारत में पिछले दशक में स्तनपान की दिशा में सकारात्मक चलन देखा गया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे – चतुर्थ के अनुसार, 55 फीसदी नवजात शिशुओं को शुरूआती छह माह के दौरान स्तनपान कराया गया।

नीदरलैंड के यूट्रेक्ट स्थित न्यूट्रीशिया रिसर्च में ह्यूमन मिल्क रिसर्च में आर एंड डी के निदेशक डॉ बेर्न्ड स्टैल ने बताया कि नवजात शिशुओं के मस्तिष्क एवं बोध विकास तथा संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व मां के दूध में पाए जाते हैं। मां का दूध नवजात शिशुओं को संक्रमण से तथा अतिसार, एलर्जी एवं अस्थमा जैसी बीमारियों से भी बचाता है। डॉ स्टैल ने बताया ‘‘स्तनपान का मां पर भी सकारात्मक असर होता है। स्तनपान कराने वाली महिलाओं को अंडाशय का और स्तन का कैंसर होने तथा चयापचय संबंधी एवं कार्डियोवैस्कुलर संबंधी बीमारियां होने का खतरा कम होता है। इससे रजोनिवृत्ति के बाद की समस्याओं से भी बचाव होता है।

फोर्टिस ल फाम स्थित नियोनैटोलॉजी के निदेशक डॉ रघुराम मलैया ने बताया कि नवजात शिशुओं को गाय का दूध देने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा ‘‘लोग सोचते हैं कि गाय का दूध मां के दूध का विकल्प हो सकता है। यह सच नहीं है। गाय के दूध में कैसीन नामक तत्व पाया जाता है जिसमें प्रोटीन की उच्च मात्रा होती है। बच्चे के लिए इसे पचाना मुश्किल होता है और उनके गुर्दों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।’’

डॉ मलैया ने बताया, ‘‘पास्चुरीकरण के बाद गाय के दूध से लौह, जिंक और आयोडिन जैसे माइक्रो न्यूट्रिएन्ट खत्म हो जाते हैं।’’ उन्होंने कहा कि बच्चों को गाय का दूध तब देना चाहिए तब वह एक साल के हो चुके हों। एम्स में शिशु रोग विभाग के प्रमुख डॉ वी के पॉल ने बताया कि कुछ परिवारों में यह गलत धारणा होती है कि मां का दूध नवजात शिशुओं को पर्याप्त पोषण नहीं दे सकता और इसीलिए वह लोग शिशुओं को गाय का दूध देने लगते हैं।

उन्होंने बताया, ‘‘मां के दूध में नवजात शिशुओं के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व होते हैं। नवजात शिशुओं की आंतें ऐसी नहीं होतीं कि गाय के दूध को पूरी तरह पचा सकें। इसकी वजह से नवजात शिशुओं को अतिसार, एलर्जी, आंतों से रक्तस्राव, कुपोषण और मोटापा जैसी समस्याएं हो सकती हैं।’’ डोनोन इंडिया में पोषक विज्ञान एवं चिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ नंदन जोशी ने बताया कि गाय के दूध से होने वाली एलर्जी छोटे बच्चों में होने वाली एक आम फूड एलर्जी का मुख्य कारण है।

यह फूड एलर्जी शुरूआती छह माह में अपनी जड़ें जमा लेती है और इससे प्रभावित ज्यादातर बच्चों में शरीर के एक या अधिक अंगों में एक या अधिक लक्षण पाए जाते हैं। इन अंगों में पाचन नलिका और/अथवा त्वचा शामिल हैं। डॉ जोशी ने बताया कि गाय के दूध की वजह से होने वाली एलर्जी समय के साथ बढ़ती जाती है और बच्चों को इससे कई तरह की फूड एलर्जी, अस्थमा या एर्लिजक राइनीटिस होने का खतरा बना रहता है।

जोशी ने कहा कि गाय के दूध में पाए जाने वाले प्रोटीन से किसी भी तरह से बचाव ही एकमात्र उपलब्ध इलाज है। स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए सरकार हरसंभव कोशिश कर रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में हर साल करीब एक लाख बच्चे उन बीमारियों की वजह से मौत के मुंह में चले जाते हैं जिन्हें स्तनपान के जरिये रोका जा सकता है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्याप्त स्तनपान न कराने की वजह से होने वाली मौत और अन्य नुकसाान की वजह से देश की अर्थव्यवस्था पर करीब 14 अरब डॉलर का बोझ पड़ सकता है।

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