किसी भी परिवार में बच्चे खुशियों का केंद्र होते हैं। उनकी इच्छाएं और छोटी-छोटी मांगें माता-पिता के जीवन में विशेष महत्त्व रखती हैं। हर माता-पिता चाहते हैं कि वे अपने बच्चे को अपनी हैसियत के हिसाब से सुविधाएं मुहैया कराएं। मगर बच्चों की हर जिद पूरी करना क्या वास्तव में उनके हित में है? दरअसल, बच्चे की हर जिद पूरी करने से उसकी जरूरत और चाहत में अंतर समझने की क्षमता खत्म हो जाती है। वह धैर्य रखने और मेहनत का मूल्यांकन करना नहीं सीख पाता। इससे बच्चे के भीतर अधिक जिद्दी एवं आक्रामक होने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है और वह भविष्य में समस्याओं एवं विफलता का सामना करने में भी कठिनाई महसूस कर सकता है।
सेल्फ कंट्रोल की सीख
यह सही है कि बच्चे अपनी इच्छाओं को ही सबसे महत्त्वपूर्ण मानते हैं। उन्हें यह समझ नहीं होती कि कौन-सी चीज उनके लिए जरूरी है और कौन गैरजरूरी। यदि माता-पिता हर बार बिना सोचे-समझे उनकी मांग पूरी कर दें, तो बच्चे में यह भावना विकसित हो सकती है कि उसकी हर इच्छा तुरंत पूरी होना उसका अधिकार है। धीरे-धीरे वह धैर्य, संयम और परिस्थितियों के अनुसार समझौता करने की क्षमता खो सकता है। ऐसा भी नहीं है कि बच्चों की हर इच्छा को ठुकरा दिया जाए। लगातार मना करने से भी बच्चे के मन में उपेक्षा और हीनभावना पैदा हो सकती है। ऐसे में आवश्यक है कि बच्चों को जरूरी और गैरजरूरी के बीच अंतर सिखाया जाए और उन्हें सेल्फ कंट्रोल सिखाया जाए।
व्यक्तित्व पर असर
माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चे की इच्छा के पीछे छिपी जरूरत और भावना को भी समझें। यदि उसकी मांग उचित, उपयोगी और उम्र तथा परिवार की आर्थिक स्थिति के अनुकूल है, तो उसे पूरा करने में कोई बुराई नहीं है। कई बार बच्चों की इच्छाएं उनकी प्रतिभा और रुचि के विकास से जुड़ी होती हैं। खेल, संगीत, पुस्तकें, शिक्षा या किसी रचनात्मक गतिविधि के लिए की गई मांग को बच्चों के भविष्य से जोड़कर देखने की जरूरत है। समस्या तब पैदा होती है, जब माता-पिता बच्चे के ज्यादा नाराज होने या जिद करने से बचने के लिए तुरंत उसकी मांग मान लेते हैं। इससे बच्चे को यह लगता है कि नाराज होकर या दबाव बनाकर वह अपनी हर बात मनवा सकता है। यह आदत आगे चलकर उसके व्यक्तित्व को भी प्रभावित कर सकती है।
बातचीत से निकालें हल
जीवन में हर इच्छा पूरी हो जाए, इसकी संभावना बहुत कम होती है। इसलिए बच्चों को शुरू से ही न सुनने और विफलता को स्वीकार करने की आदत डालना आवश्यक है। माता-पिता का बच्चों से नियमित बातचीत भी जरूरी है। किसी मांग को अस्वीकार करते समय बच्चे को केवल डांटना या चुप करा देना उचित नहीं है। उन्हें सरल भाषा में समझाना चाहिए कि वह वस्तु अभी क्यों नहीं खरीदी जा सकती या उसकी आवश्यकता क्यों नहीं है। इससे बच्चों में समझदारी एवं सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है तथा वे अपनी इच्छाओं और जरूरतों के बीच अंतर करना भी सीख पाते हैं।
