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Osho Art of Listening: आंख से ज्यादा चौकन्ने हैं कान, इसलिए सुनने की कला ही बनाती है सफल

Osho Quotes for love : आंख का कंट्रोल तुम्हारे हाथ में है लेकिन कान परमात्मा के हाथ में...तुम्हारी गहरी नींद में भी कान खुला है लेकिन आंख बंद है..मूर्छित हो आंख बंद है लेकिन कान तब भी खुला है...नींद में पड़े आदमी के पास जागा आदमी खड़ा हो जाए तो शायद वह नहीं देख पाएगा लेकिन अगर वह उसे आवाज दे तो वह जाग जाएगा।

Author Published on: July 4, 2019 6:12 AM
ओशो के अनुसार महावीर कहते हैं कि दर्शनशास्त्र एकांगी है जबकि श्रवणशास्त्र बहुअंगी है…इसीलिए अगर ध्यान में जाना है तो सुनकर जल्दी जा सकोगे।

Osho Art of Listening: आधा सत्य खतरनाक है, क्योंकि इसमें थोड़ी सी झलक है, स्वांस अभी चलती है, शरीर अभी मरा नहीं है..आधा सत्य असत्य से बदतर है। इसीलिए महावीर स्वामी का सारा संघर्ष आधे सत्य के खिलाफ है न कि असत्य के। ओशो कहते हैं कि असत्य से छुटकारा संभव है लेकिन आधे सत्य से छुटकारा पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है। जो आदमी कहता है कि मैं जन्म तो लिया हूं, लेकिन मरना नहीं चाहता। वह आदमी आधे को पकड़कर बैठा है। ऐसा व्यक्ति दुख पाएगा, अज्ञान में जीएगा। क्योंकि वह कुछ भी करे, मौत तो आएगी ही, क्योंकि आधे को काटा नहीं जा सकता है। जन्म को स्वीकार किया है तो मौत उसका आधा हिस्सा है, वह साथ ही जुड़ा है। सत्य को सुनना ही ज्ञान का प्राप्ति है, पूरा सत्य सुनने वाले ही सदमार्ग पर जाते हैं और आगे जाकर परमहंस बनते हैं।

महावीर स्वामी कहते हैं असत्य तो सुनकर ही समझ आता है लेकिन आधा सच बेहद भरमाता है। कान की खूबी है ये आंख से ज्यादा समग्र है, जब तुम सुनते हो तो चारों दिशाओं से सुनते हो..कान ऐसे हैं जैसे दिया जले सब ओर प्रकाश पड़े। आंख ऐसी है जैसे टार्च, एक दिशा में एकांगी। महावीर कहते हैं कि दर्शनशास्त्र एकांगी है जबकि श्रवणशास्त्र बहुअंगी है…इसीलिए अगर ध्यान में जाना है तो सुनकर जल्दी जा सकोगे..समस्त ध्यान की प्रक्रियाएं कहती हैं कि आंख बंद कर लो…यह थोड़ा समझने जैसा है कि परमात्मा ने आंख को ऐसा बनाया कि चाहो तो बंद कर लो…चाहो तो खोल लो लेकिन कान को ऐसा नहीं बनाया। आंख का कंट्रोल तुम्हारे हाथ में है लेकिन कान परमात्मा के हाथ में…तुम्हारी गहरी नींद में भी कान खुला है लेकिन आंख बंद है..मूर्छित हो आंख बंद है लेकिन कान तब भी खुला है…नींद में पड़े आदमी के पास जागा आदमी खड़ा हो जाए तो शायद वह नहीं देख पाएगा लेकिन अगर वह उसे आवाज दे तो वह जाग जाएगा।

आंख के बस में नहीं है पूरा सचः हम सोए हैं तो श्रवण से रास्ता मिलेगा..आंख तो हमारी बंद ही है और खुली भी हो तो अधूरा सत्य देख सकती है, पूरा सत्य आंख के बस में नहीं है…आंख इतनी कमजोर है कि तम्हारे हाथ में एक छोटा से कंकड़ को भी पूरी तरह से नहीं देख सकती…तो पूरे परमात्मा और पूरे सत्य को कैसे देख सकेगी? इसलिए जिन्होंने देखने पर जोर दिया है उन्होंने अधूरे दर्शनशास्त्र जगत को दिए हैं….ओशो कहते हैं कि महावीर का दर्शनशास्त्र परिपूर्ण है समग्र है..जो बड़ा भिन्न है..उन्होंने कहा सुनो..सत्य को देखना नहीं…सत्य कोई वस्तु थोड़ी है कि तुम उसे देख लोगो…सत्य तो किसी व्यक्ति का अनुभव है…वो कहेगा तो तुम उसे सुन लोगे..महावीर खड़े रहे तुम्हारे समक्ष फिर भी तुम उन्हें नहीं देख सकते हो…कइयों ने उन्हें देखने की कोशिश की लेकिन देख सके..खदेड़े गए। महावीर को आर सुन सकते हैं इसलिए सुनने की कला को सीख लेना धर्म के जगत में पहला कदम है।

क्या है सच सुनने की विधिः जब सुनो तो सोचना मत, क्योंकि अगर सोचा तो तुम वह नहीं सुन पाओगे जो कहा गया..कुछ और सुनोगे। सुनते समय पूर्व धारणाओं को लेकर मत चलना वरना ये पर्दे का काम करेंगी…रंग घोल देंगी जो कहा गया है उसमें। तुमने कभी सोचा कि रात में तुम 4 बजे अलार्म लगाकर सो गए कि सुबह जाना है, सुबह हुई अलार्म बजा…तब तुम एक सपना देखते हो कि मंदिर की घंटिया बज रही हैं…अब घड़ी अलार्म बजाती रहे क्या करेगी..तुमने एक तरकीब निकाल ली..तुमने कुछ और सुन लिया…सुबह हैरान हो गए अलार्म भरा था अलार्म बजा भी..मैं चूक क्यों गया? क्योंकि तम्हारे पास एक धारणा थी अपना एक सपना था..तब तुमने कुछ और सुना तो पक्षपात हो गया। अगर कोई धारणा है अगर पहले से कोई पक्षपात है तो तुम कुछ का कुछ सुन लोगे…तुम सत्य को अपने हिसाब से ढाल लोगो। ऐसे ही लोग चूके महावीर को, बुद्ध को, कृष्ण को, जीसस के सच को सुनने में। उन्होंने जो कहा था कुछ और लेकिन लोगों ने सुना कुछ और। सुनने वाले के पास अपना मजबूत मन था…उसने मन के माध्यम से सुना इसलिए मन को हटाकर सुनो..मन को किनारे रखकर सुनो। ओशो कहते हैं कि एक बार जूते भी मंदिर में ले आओ तो इतना अपवित्र नहीं होगा लेकिन मन को मत लाना..वरना कभी मंदिर में आ ही न सकोगे..श्रृवण की कला आते ही तुम दूध और पानी को अलग करने में कुशल हो जाते है.. तुम हंस हो जाते हो..इसलिए तुम परमहंस कहलाते हो। परमहंस का अर्थ है उनकी दृष्टि उनकी भावदशा बेहद निर्मल है…जो जैसे है वे वैसा ही देखते है उसमें कुछ जोड़ते नहीं..फिर कोई भ्रांति खड़ी नहीं होती। इसलिए सत्य को सुनने की आदत डाले..आधा सच नहीं।

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