हर साल लाखों रुपए चूहे कुतर जाते थे, पर 35 साल तक पहनी एक ही टोपी- हैदराबाद के न‍िजाम की कंजूसी के क‍िस्‍से

निजाम अक्सर बिना इस्तरी की हुई कमीज और पाजामे में नजर आते थे। उनके गैराज में तमाम चमचमाती गाड़ियों की कतार लगी थी, लेकिन खुद खटारा कार से चला करते थे।

Mir Osman Ali Khan, Hyderabad, Nizam
आजादी के वक्त मीर उस्मान अली हैदराबाद रियासत के निजाम थे। फाइल फोटो (Source: Wikimedia Commons)

15 अगस्त 1947 को भारत तमाम संघर्ष के बाद आजाद तो हो गया लेकिन उस वक्त सरकार के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती थी वह 565 छोटी-बड़ी रियासतों के विलय की था। चूंकि कांग्रेस ने पहले ही ऐलान कर दिया था कि आजादी के बाद इन रियासतों का भारत में विलय कर दिया जाएगा, ऐसे में आजादी के तुरंत बाद इसकी प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई। ज्यादातर रियासतें भारत में विलय को तैयार हो गईं, लेकिन तीन रियासतें ऐसी थीं जो जिद पर अड़ गईं। इनमें कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ शामिल था।

आजादी के वक्त हैदराबाद रियासत की गद्दी पर सातवें निजाम मीर उस्मान अली बैठे थे। उन्हें साल 1911 में गद्दी मिली थी। अपने शकी, अड़ियल और जिद्दी स्वभाव के लिए चर्चित उस्मान अली दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक थे। हालांकि उनके पास जितना पैसा था, उससे कहीं ज्यादा कंजूस थे। चर्चित इतिहासकार और लेखक डॉमिनिक लापियर और लैरी कॉलिन्स अपनी किताब ‘फ्रीडम ऐट मिडनाइट’ में लिखते हैं कि 1947 में हैदराबाद के निजाम दुनिया के सबसे अमीर शख्स माने जाते थे लेकिन इससे कहीं ज्यादा उनकी कंजूसी के किस्से चर्चित थे।

मैले-कुचैले कपड़े और खटारा कार थी पहचान: निजाम अक्सर मैले-कुचैले सूती पायजामे और फटी जूतियों में देखे जाते थे। 35 सालों से वह एक ही तुर्की टोपी पहनते आए थे, जिसमें फफूंद लग गई थी और जगह-जगह सिलाई उखड़ गई थी।

इतिहासकार रामचंद्र गुहा भी इसकी तस्दीक करते हुए अपनी चर्चित किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि निजाम हद दर्जे के कंजूस थे। बहुत कम नए कपड़े पहनते थे। अक्सर बिना इस्तरी की हुई कमीज और पाजामे में नजर आते थे। यूं तो निजाम के गैराज में तमाम चमचमाती गाड़ियों की कतार लगी थी, लेकिन खुद 1918 मॉडल की एक पुरानी-खटारा कार से चला करते थे।

सोने के बर्तनों से पटा था महल: डॉमिनिक लापियर और लैरी कॉलिन्स के मुताबिक निजाम के पास इतने सोने के बर्तन थे कि वो एक साथ 200 लोगों को उन बर्तनों में खाना खिला सकता था, लेकिन खुद चटाई पर बैठकर टीन की प्लेट में खाना खाते थे। निजाम की कंजूसी का आलम यह था कि उनके घर आने वाला मेहमान जब अपनी पी हुई सिगरेट बुझा कर छोड़ जाता तो वो उसके टुकड़े जलाकर पीने लगते थे।

फर्श पर पड़े रहते थे हीरे-जवाहरात: निजाम का बेडरूम किसी गंदी झोपड़ी के कमरे जैसा था, जिसकी साल में एक बार उसके सालगिरह वाले दिन साफ-सफाई होती थी। लेकिन इस गंदे कमरें में बेशुमार दौलत छिपी थी। निजाम की टेबल पर नींबू के आकार का एक हीरा पेपर में लिपटा रखा रहता था, जो पूरे 280 कैरेट का था। निजाम इसका इस्तेमाल पेपर वेट की तरह करते थे। तहखानों में हीरे-जवाहरात फर्श पर कोयले के टुकड़े की तरह पड़े रहते थे। निजाम के बगीचे में तमाम ट्रक खड़े रहते थे, जिनमें सोने के बिस्किट भरे रहते थे।

चूहे कुतर देते थे लाखों रुपये: निजाम के पास उस वक्त 20 लाख पौंड से ज्यादा की नकद रकम थी। इस रकम को पुराने अखबार में लपेट करता तहखानों और दुछत्तियों में ढेर लगा कर रखा गया था। हर साल कई हजार पाउंड के नोट चूहे कुतर जाते थे।

खाना चखने वाला लेकर चलते थे साथ: निजाम मीर उस्मान अली शकी किस्म के इंसान थे। उन्हें हमेशा यह डर लगा रहता था कि कोई दरबारी उन्हें जहर देकर गद्दी हथिया लेगा। ऐसे में वह जहां भी जाते थे, एक खाना चखने वाला शख़्स साथ ले जाते थे। उसके चखने के बाद ही खाने को हाथ लगाते थे। निजाम के खाने का लगभग बंधा रूटीन था। जिसमें मलाई, मिठाई, फल, सुपारी और रात को एक प्याली अफीम अनिवार्य तौर पर शामिल थी।

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