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सरकार हथियाना चाहता है का नीतीशवा?-जब तमतमा कर बोले थे लालू, छिप कर रैली में पहुंचे थे नीतीश

पोस्टर-बैनर से चेहरा गायब करने के बावजूद नीतीश रैली में जाने से खुद को रोक नहीं सके। वह अपने एक दोस्त के साथ चोरी-छिपे वहां पहुंचे।

लालू यादव और नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

90 के दशक की शुरुआत होते-होते लालू यादव और नीतीश के रिश्ते तल्ख होते गए। जेपी आंदोलन के दौरान साथ काम कर चुके दोनों नेताओं के बीच साल 1992 की शुरुआत तक बातचीत भी बंद हो गई। दोनों के बीच दरार की कई वजहें थीं। लेकिन सबसे बड़ी वजह लालू के तमाम वादे थे। दरअसल, 1990 में जब लालू बिहार के मुख्यमंत्री बने तब नीतीश अक्सर उन्हें उनके तमाम वादों की याद दिलाने लगे, मसलन- भ्रष्टाचार पर लगाम, कानून का राज और जेपी- कर्पूरी ठाकुर के सपनों का बिहार बनाने की बात। शुरुआत में तो सबकुछ ठीक रहा, लेकिन धीरे-धीरे लालू को नीतीश की बातें चुभने लगीं।

सरकार हथियाना चाहता है का नीतीशवा? वरिष्ठ पत्रकार और लेखक संकर्षण ठाकुर अपनी किताब ‘अकेला आदमी: कहानी नीतीश कुमार’ में लिखते हैं कि इसी दौरान एक दिन लालू ने गुस्से में तमतमाते हुए नीतीश कुमार से कह दिया ‘सरकार हथियाना चाहता है का नीतीशवा?।’ ऐसी ही एक और शाम लालू ने नीतीश को नसीहत देते हुए दो टूक कह दिया, ‘तुम हमको राजपाट सिखाओगे? गवर्नेंस और पावर मिलता है वोट बैंक… पावर मिलता है लोगों से… क्या गवर्नेंस-गवर्नेंस रटते रहते हो?

दोस्त उकसाते थे लालू को: इसी दौर में लालू के दोस्तों की एक अंतरंग मंडली बन गई थी। इस मंडली में लालू के साले साधु और सुभाष यादव भी शामिल थे। इसके अलावा शिक्षक की नौकरी छोड़ राजनेता बने रंजन यादव, हरियाणा के व्यापारी प्रेम गुप्ता और अनवर अहमद जैसे लोग शामिल थे। बकौल ठाकुर, यही लोग लालू को नीतीश के उकसाते रहते थे, उनका कान भरते रहते थे।

लालू और नीतीश के रिश्ते में तो तल्खी आ ही गई थी, लेकिन लालू चाहते थे कि नीतीश को यह बात साफ-साफ पता भी चल जाए। इसी दौरान 1993 की गर्मियों में पटना के गांधी मैदान में ‘गरीब रैली’ का आयोजन किया गया। ना तो नीतीश से इस रैली के बारे में कोई सलाह मशविरा ली गई और ना ही पोस्टर-बैनर में उनकी तस्वीर छापी गई। इसका संकेत साफ था।

चोरी-छिपे लालू की रैली में पहुंचे नीतीश: संकर्षण ठाकुर लिखते हैं कि तिरस्कार और पोस्टर-बैनर से चेहरा गायब करने के बावजूद नीतीश रैली में जाने से खुद को रोक नहीं सके। वह अपने एक दोस्त के साथ चोरी-छिपे वहां पहुंचे। नीतीश के करीबी मित्र ज्ञानेंद्र सिंह अपनी मारुति कार से नीतीश को गांधी मैदान तक ले गए।उस दिन तेज धूप और तीखी गर्मी थी।

दोनों ने गांधी मैदान के एक कोने में अपनी कार लगा दी। नीतीश कुमार सीट पर बैठे-बैठे स्टेज की तरफ देखते रहे और लालू को सुनते रहे। रैली खत्म होने के बाद नीतीश और खोए-खोए से नजर आने लगे। उन्होंने दिल्ली लौट कर बतौर सांसद जिम्मेदारियों का निर्वहन करना ही उचित समझा।

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