हाल ही में नीता अंबानी को अमेरिका के फ्लोरिडा में प्रतिष्ठित एएपीआई ह्यूमैनिटेरियन अवार्ड (AAPI Humanitarian Award) से सम्मानित किया गया। इस खास मौके पर उन्होंने पर्पल कलर की कांजीवरम साड़ी पहनी थी। इस साड़ी और ब्लाउज को खासतौर पर मनीष मल्होत्रा ने डिजाइन किया था, जिसे हाथ से बनी तंजावुर कला से सजाया गया है।

इस साड़ी को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित मास्टर शिल्पकार श्री बी कृष्णमूर्ति ने बहुत बारीकी और पारंपरिक तकनीक से तैयार किया है। जिसे भारतीय हस्तशिल्प कौशल और देश की समृद्ध परंपरा का एक सुंदर उदाहरण भी कहा जा सकता है।

डिजाइनर मनीष मल्होत्रा ने इंस्टाग्राम पर नीता अंबानी के इस लुक की जानकारी शेयर की। उन्होंने लिखा कि रॉयल पर्पल कलर की इस सिल्क साड़ी को तंजावुर कला से प्रेरित खूबसूरत मोटिफ्स से सजाया गया है। जिसमें दक्षिण भारत की दो प्रतिष्ठित कला और परंपराओं का सुंदर संगम देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि कभी मंदिरों की दीवारों पर सजी यह कला अब भारत की सबसे बेहतरीन बुनाई में से एक कांजीवरम साड़ी के बॉर्डर पर उकेरी गई है।

साड़ी के पूरे हिस्से पर मोर का डिजाइन बार-बार बनाया गया है। इसमें मोर सुंदरता और समृद्धि का प्रतीक है और चक्र अनंत काल और ब्रह्मांडीय संतुलन को दर्शाता है। इन दोनों डिजाइनों को शुद्ध गोल्ड जरी से बहुत बारीकी से बुना गया है।

मनीष मल्होत्रा ने बताया कि इस साड़ी में पारंपरिक कोरवाई (Korvai) तकनीक का भी इस्तेमाल किया गया है। जिसमें बुनाई के दौरान ही आकर्षक गुलाबी और काले रंग के बॉर्डर को साड़ी के मुख्य हिस्से के साथ जोड़ा जाता है। यह तकनीक कांचीपुरम के सबसे कुशल बुनकरों की कारीगरी की पहचान मानी जाती है।

कांजीवरम साड़ी की खासियत

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान ब्रांड ‘बिनल पटेल’ की संस्थापक ने बताया कि कांजीवरम साड़ी की शुरुआत तमिलनाडु के कांचीपुरम शहर से हुई थी। यह मंदिरों के लिए प्रसिद्ध शहर है जो अपनी बेहतरीन सिल्क बुनाई की परंपरा के लिए भी जाना जाता है।

उन्होंने बताया कि मान्यता है कि कांजीवरम साड़ियों के बुनकर ऋषि मार्कंडेय के वंशज हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, ऋषि मार्कंडेय देवताओं के प्रमुख बुनकर माने जाते थे, जो कमल के रेशों से बहुत सुंदर कपड़े तैयार करते थे।

बिनल पटेल के अनुसार शुरुआत में कांजीवरम साड़ियां 9 गज लंबी होती थीं। लेकिन समय के साथ इनका रूप बदल गया और यह अब 6 गज लंबी होती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कांजीवरम साड़ी बुनने की कला करीब 400 साल पुरानी है। इसे मंदिर से जुड़े कारीगरों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता रहा है।

वर्ल्ड यूनिवर्सिटी ऑफ डिजाइन के स्कूल ऑफ फैशन के प्रोफेसर जॉन वर्गीज के अनुसार दक्षिण भारतीय शादियों में कांजीवरम सिल्क साड़ियों का खास महत्व होता है। ये साड़ियां पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं। उन्होंने बताया कि भरतनाट्यम डांसर भी अपनी परफॉर्मेंस के दौरान कांजीवरम साड़ी पहनना पसंद करती हैं।

वर्गीज के अनुसार कांजीवरम साड़ी का बॉर्डर, बॉडी और पल्लू को अलग-अलग जोड़कर नहीं बनाया जाता। इन तीनों हिस्सों को करघे पर एक साथ, एक ही समय में बुना जाता है। यही वजह है कि साड़ी का बॉर्डर, डिजाइन और पल्लू तीनों अलग-अलग और गहरे रंगों में बहुत शानदार दिखते हैं। जिसे कोरवाई (Korvai) और पेटनी (Petni) बुनाई तकनीकों से तैयार किया जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार कोरवाई तकनीक में इंटरलॉक्ड वेफ्ट टेपेस्ट्री तकनीक ( Interlocked Weft Tapestry Technique) का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें साड़ी के मुख्य हिस्से के साथ-साथ अलग रंग के बॉर्डर को एक साथ बुना जाता है। इसके लिए तीन शटलों का उपयोग होता है। उन्होंने बताया कि कांजीवरम साड़ी के बॉर्डर पर बने डिजाइन और मोटिफ आमतौर पर साड़ी के मुख्य हिस्से से अलग होते हैं। इनमें ज्यादातर दक्षिण भारतीय संस्कृति, पौराणिक कथाओं या प्रकृति से प्रेरित पारंपरिक मोटिफ और डिजाइन देखने को मिलते हैं।