ताज़ा खबर
 

प्रश्न उठाता जश्न

एक महिला सालों की चुप्पी के बाद कार्यस्थल पर अपने खिलाफ अमर्यादित सलूक पर मुंह खोलती है।

Author Updated: February 21, 2021 11:37 PM
प्रिया रमानी। फाइल फोटो।

पर न्याय के सवाल को एक किनारे खिसकाते हुए उस मानहानि के दावे को केंद्र में लाया जाता है, जिसमें मान और हानि दोनों का ही दावा वह मानसिकता कर रही है जो समाज से लेकर व्यवस्था तक एक मजबूत ढांचे की तरह है। सवाल है कि इंसाफ के दर से मानहानि के ऐसे किसी दावे से बाहर निकल आना महज एक गनीमत है या वह जीत जिसके लिए महिलाएं लंबे समय से संघर्ष कर रही हैं। ऐसे ही कई अहम सवालों को सामने ला रही हैं मृणाल वल्लरी।

भारतीय अदालत के इतना कहने के बाद प्रिया रमानी एक पूर्व केंद्रीय मंत्री की मानहानि के आरोप से मुक्त हो गर्इं। मार्क्सवाद के अगुआ दार्शनिक कहते हैं कि मैंने तो सिर्फ सिर के बल खड़े सिद्धांत को पैर के बल खड़ा किया। अदालत परिसर से जीत का निशान बनाकर निकलती हुई प्रिया रमानी की जीत भी तो अभी सिर के बल ही खड़ी है। अपनी मानसिक पीड़ा और अपने यौन उत्पीड़क का नाम सार्वजनिक करने के आरोप में वो अदालत में 97 वकीलों की फौज का सामना कर रही थीं। प्रिया रमानी के सालों पहले अपनी देह के अपमान को याद करते ही बीस महिलाएं और सामने आ गर्इं। जिसे कभी मीडिया मुगल का तमगा हासिल था और जो खोजी पत्रकारिता की तिकड़ी-चौकड़ी में शामिल था, उसके खिलाफ आवाज उठाई गई थी। अदालत में पुरुष की मानहानि की हार के बाद देश की पता नहीं कितनी औरतों ने दिल से कहा होगा कि हम जीत गर्इं, ये हमारी जीत है।

संघर्ष और सहभागिता

महिलाओं की जीत का बहुवचनी बोध बताता है कि ‘हैशटैग मीटू’ सहभागिता का मामला तो जरूर था। दुनियाभर की महिलाओं का अपने उत्पीड़क के खिलाफ बहनापे की इस अद्भुत वैश्विक मिसाल को पितृसत्ता ने महज आभासी और पहले क्यों नहीं बोला था कहकर खारिज करने की भरपूर कोशिश की। पुरुष सत्ता का पूरा जोर इसी पर था कि इतने दिनों बाद आरोप लगाने का मतलब मर्द की मानहानि की दबी-उभरी मंशा है। लेकिन इंटरनेट के हैशटैग से जुड़ी इस पीड़ा का गूगल पर जो मानचित्र दिखा, उसमें पूरी दुनिया की औरतें एक सी हो चुकी थीं क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था, देह और मन की पीड़ा से मुक्ति के सिवाय।

तारीखी लम्हा

यह आभासी मुहिम अपने जमीनी यथार्थ पर तब उतरी जब अमेरिकी फिल्म निर्माता हार्वे वेनस्टेन को अमेरिका की अदालत ने 23 साल की सजा सुनाई। औरतों की अपनी गरिमा और अस्मिता के लिए मांगी गई इंसाफ के इतिहास में वह क्षण अविस्मरणीय था, जब 90 औरतों ने एक साथ अपने उत्पीड़क को सजायाफ्ता होते देखा। यौन हिंसा के खिलाफ लब को आजाद करने की जंग की इससे बड़ी कामयाबी और क्या हो सकती है। औरतों के बहनापे की यह हैशटैग लामबंदी अपने उत्पीड़कों की सदेह निशानी करती जा रही थी। औरतें कह रही थीं कि मी-टू से टकराने वाला सवाल यह नहीं है कि पीछे क्या हुआ। यह उस आगे के लिए है जो पीछे की हिंसा और पीड़ा की कचोट से मुक्त हो सके। आने वाले कल को बेहतर बनाने के लिए बीते कल के जख्मों का इलाज जरूरी होता है।

सवालिया साहित्य

गौरतलब है कि महिलाओं पर यौन हिंसा या अन्य तरह की बदसलूकी या किसी भी तरह की असम्मानजनक बहस की शुरुआत होते ही उसमें कहीं न कहीं वो लहजा दिखने लगता है जिसके कारण यह नौबत पैदा होती है। इसका नतीजा यह है कि हम इस सवाल और इस समस्या से जूझते हुए भी कोई निर्णायक स्थिति में नहीं पहुंचते हैं। महिलाओं को लेकर हमारा पूर्वग्रह बना ही रहता है। हम दुनिया भर के साहित्य को देखते हुए हिंदी साहित्य को भी देखें तो महिलाओं के प्रति या तो एक चालाक सदाशयता दिखेगी या फिर उन्हें खारिज करने का अघोषित हठ। कलम की दुनिया में महिलाओं को अभी तक इतनी ही गनीमत हासिल है कि उन्हें प्रगतिशील सोच के किसी झरोखे से निहारते हुए दिखा दिया जाता है। आगे इसी को आलोचकीय नजरिए से ‘जेंडर जस्टिस’ की लिखावट करार देने का खेल चलता है।

हम हिंदी साहित्य के सबसे बड़े ‘आइकॉन’ प्रेमचंद के साहित्य को ही देखें तो उसमें महिला को लेकर कोई दुर्भावना तो नहीं दिखेगी लेकिन पितृसत्ता का सांस्कृतिक पूर्वग्रह काम करता जरूर दिखता है। उनकी कोई कहानी या कोई उपन्यास उठा लीजिए, नायिका अहम तो है पर कथा की केंद्रीय नियामक नहीं है। हां, नायिका के हिस्से आए संवाद और उसे दी गई भूमिका का ‘शेड’ और ‘कोलाज’ जरूर अच्छा लगता है। इसी तरह, रवींद्रनाथ ठाकुर से लेकर शरतचंद्र तक के साहित्य में भी महिलाओं के लिए उन सामंती मूल्यों को आसानी से खोजा जा सकता है जिसके खिलाफ पूरा बंगाल जागृत हुआ था। इन तमाम उदाहरणों से जो बात समझने की है वह यह कि साहित्य समाज का आईना हो या न हो, उसका हिस्सा जरूर है। साहित्य की इस हिस्सेदारी को प्रिया रमानी के मामले में साफ-साफ देखा-समझा और पढ़ा जा सकता है।

न्याय अभी बाकी

प्रिया पत्रकारिता के पेश से ताल्लुक रखती हैं जो लोकतंत्र के सबसे बड़े दायरे में आता है। प्रिया के बोलने के पहले वो संपादक शूरवीर सरीखी पत्रकारिता का पितृपुरुष सरीखा था। उसके सहचर और समकालीनों में एसपी सिंह जैसे नाम हैं। यह वो दौर था जब हिंदी पत्रकारिता भी नई तमीज देख रही थी। वह देख रही थी कि दलितों के घर जलाए जा रहे हैं तो वास्तविक स्थिति क्या है? आप उस संवेदना और पीड़ा को स्पर्श करने वाले दौर के पत्रकार हैं। संवेदना को रचने वाले पत्रकार हैं, उसका पूरा साक्ष्य आपने दिया है। लेकिन कमाल देखिए कि हम अभी भी इस बहस में नहीं जा रहे हैं कि दरअसल हुआ क्या था। उस पर अभी फैसला भी नहीं आया है।

ताजा फैसला तो मानहानि पर है। एक महिला सवाल खड़ा कर दे तो कानून के सारे उपकरण आप उसके खिलाफ उसी तरह इस्तेमाल करेंगे, जैसे राजनीति में और बाकी जगहों पर होते हैं। और मान किसका? मान पुरुष का? ये पुरुष का मान ज्यादा है या पुरुषवादी सोच का? अपनी पीड़ा कहने के जुर्म से निजात मिलने को ही तो अभी हम जीत के रूप में देख रहे हैं। अभी तो इंसाफ के असली मोर्चे पर भी नहीं पहुंची हैं महिलाएं। अभी तो एक अवरोधक को तोड़ने या उससे भिड़ जाने की सफलता भर हाथ लगी है।

हल और हालात

सवाल है कि आगे क्या ऐसे तमाम मामलों को न्यायिक हश्र तक पहुंचते देखने के लिए हम या हमारी मानसिकता तैयार है। सवाल का जवाब सबको पता है। ऐसे में वो तमाम महिलाएं जो इसी समाज में रह कर यह संघर्ष कर रही हैं उनके ऊपर भी बड़ी जिम्मेदारी है कि वे इस खेल को समझें और वे इसे बखूबी समझ भी रही होंगी। यह उनकी जीत कतई नहीं है। यह तो बाढ़ के दौरान बांटी जाने वाली राहत सामग्री की तरह है। कोई भी राहत सामग्री पुनर्वास तो कतई नहीं मानी जाएगी। वो जीवन के प्रति स्थायी सोच नहीं मानी जाएगी। यह तो आंसू के चंद कतरों को रोकने का उपकरण मात्र है। साफ है कि न्याय दूर ही नहीं, महिलाओं के लिए न्याय और संघर्ष के आगे का रास्ता ज्यादा कठिन है, खासा जटिल है।

अभी भी आपको आसपास खबरें मिल जाएंगी कि जिसने बलात्कार किया समाज चाह रहा है कि वही उससे शादी का भी उपकार कर दे। आधुनिक अदालतों में फैसले देने के पहले रामायण की चौपाइयां सुनाई जा रही हैं तो स्त्री और पुरुष के बीच सीता और लक्ष्मण जैसे रिश्ते को आदर्श बताया जा रहा है कि देवर ने भाभी का सिर्फ अंगूठा ही देखा है। लिहाजा, समाज और पुरुषवादी तंत्र के बीच महिलाओं को इंसाफ के लिए अभी सब्र और के कई मुश्किल इम्तिहानों से गुजरना बाकी है। ल्ल

Next Stories
1 चूड़ियाँ बेचने के साथ मज़दूरी भी करती थीं मां, बेटे को बनाया आईएएस- प्रेरक के साथ-साथ भावुक कर देने वाली है इस अफ़सर की संघर्ष गाथा
2 स्कूल से UPSC तक रहीं टॉपर, शादी के फैसले पर हुआ था हंगामा; 2 साल बाद ही तलाक के लिए कोर्ट पहुंची IAS टीना डाबी
3 ‘हप्पू की उलटन पलटन’ की राजेश भाभी का लाइफस्टाइल नहीं हैं किसी सुपरस्टार से कम, जानिये
ये पढ़ा क्या?
X