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सवाल, संसद और भंवरी

संसद के दोनों सदन के लिए बगैर नतीजे तक पहुंचे यह एक तरह से इतिहास का हवाला हो गया है कि तैंतीस फीसद आरक्षण मिलना चाहिए।

Author Updated: February 22, 2021 8:12 AM
Bhavri deviभंवरी देवी। फाइल फोटो।

देश में हुए सबसे बड़े सत्ता परिवर्तन के बाद भी इस मसले पर कहीं किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है। मी-टू की मुहिम भी संघर्ष का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं खोल रहा था जिसमें महिलाओं को इंसाफ मिल सके। यह सिर्फ एक कदम और आगे बढ़ने की बात थी कि आपको इस घिनौनी पुरुष मानसिकता के बारे में खुल कर बात करनी पड़ी। इसके बाद ही अगला चरण शुरू हुआ।

महिलाओं के हिस्से में निश्चित तौर पर यह बात जाती है कि इस घिनौनेपन को उन्होंने सार्वजनिक कर दिया है। महिलाओं को उम्मीद थी कि अब पुरुष कुछ तो सावधानी बरतेंगे, उनके साथ दैहिक और मानसिक दुर्व्यव्हार को लेकर। लेकिन हुआ इसका उलटा कि संदेश दिया गया कि कार्यक्षेत्र में महिलाओं की भर्ती ही कम कर दो। और पत्रकारिता जैसे सबसे प्रबुद्ध क्षेत्र में भी महिलाएं कहीं इंसाफ की जिद तक आगे बढ़ सकीं तो सीसीटीवी या स्क्रीन शॉट के जरिए। याद करें बिना सीसीटीवी के तरुण तेजपाल किस तरह इंसाफ के दायरे में आते? मी टू की लड़ाई अभी बहुत चरणबद्ध और लंबी है।

कहानी निश्चित तौर पर आगे बढ़ी है। प्रिया रमानी और उन जैसी तमाम हिम्मत की हरकारियों को अभी बहुत सब्र रखना पड़ेगा और उनकी हिमायत में खड़े लोगों को इतनी समझ रखनी पड़ेगी कि कितना आगे जाकर यह लड़ाई पूरी होने जैसी शक्ल अखित्यार करेगी। शायद कई पीढ़ियों को अपना योगदान करना पड़ेगा। क्योंकि अभी भी स्त्री विमर्श में पितृसत्ता आमूलचूल बदलाव को रोक कर रफूगीरी से ही काम चला लेना चाहता है। हाल ही में आॅनलाइन कारोबार करने वाली कंपनी मिन्त्रा को अपना कारोबारी प्रतीक निशान बदलना पड़ा। अदालत में याचिका दी गई कि यह निशान महिलाओं के खास अंग को निशाना बनाता है जो स्त्री अस्मिता के खिलाफ जाता है।

अदालत में दी गई दलीलों के आधार पर फैसला मिन्त्रा के खिलाफ गया। अदालत ने उन दलीलों को उचित समझा और कंपनी ने भी उसे माना। लेकिन इस फैसले के सार्वजनिक होते ही आपके नारीवाद में नमक ज्यादा का है जुमला उठने लगा। मी-टू से लेकर ऐसे किसी भी फैसले को एसी रूम वाला या शहरी नारीवाद कह कर मजाक उड़ाया जाने लगता है। भई, ऐसा नारीवाद तो जहर है जो किसी कंपनी के निशान पर नजर रखता है। इन औरतों की नजर गंदी है, हमने तो कभी उस निशान को वैसे नहीं देखा।

इसके साथ ही यह शहरी नारीवाद झूठा है कह कर उन्हें गांवों की ओर देखने की वकालत करने लगते हैं। वैसे लोग अगर गांव और शहर की कड़ी को जोड़ना चाहते हैं तो उन्हें यह देखना चाहिए कि आज शहरी महिलाओं को कार्यस्थलों में यौन सुरक्षा का जो हथियार मिला है वो उस भंवरी देवी की देन है जो गांव की सामंती पितृसत्ता की शिकार हुई थी। जिस भंवरी देवी को अपने यौन उत्पीड़न के खिलाफ आज तक इंसाफ नहीं मिल पाया है उसके खड़े होने के कारण ही आज महिलाएं कार्यस्थल पर गैरबराबरी के खिलाफ आवाज उठा रही हैं।

यह दुनिया जितनी बड़ी है उतना ही बड़ा है नाइंसाफियों का दायरा। एक साथ ढेरों मोर्चों पर लड़ाई लड़ी जा सकती है और किसी खास की लड़ाई को झूठा नहीं कहा जा सकता है। भंवरी देवी को बलात्कार के खिलाफ इंसाफ नहीं मिल सका लेकिन आज अगर कोई महिला किसी कारोबारी निशान को महिलाओं के प्रति असंवेदनशील मान रही है और अदालत उसके हक में फैसला देती है तो इसमें नारीवाद की पुरखिन भंवरी देवी के योगदान को आसानी से आंका जा सकता है।

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