जय प्रकाश नारायण के घर अचानक पहुंच गया था चंबल का इनामी डकैत, अड़ गया था एक जिद पर

सरेंडर करने की अर्जी लेकर इनामी डाकू पटना स्थित जयप्रकाश नारायण के घर पहुंच गया था। इसके बाद जेपी ने एक मूवमेंट की शुरुआत की थी जिसके बाद 400 डाकुओं का आत्मसमर्पण करवाया गया था।

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जयप्रकाश नारायण (फोटो- एक्सप्रेस आर्काइव)

जय प्रकाश नारायण की आज (8 अक्टूबर) को 42वीं पुण्यतिथि है। अपने प्रशंसकों के बीच लोकनायक के नाम से चर्चित जेपी की लोकप्रियता का आलम यह था कि क्या पक्ष, क्या विपक्ष, हर तरफ उनकी स्वीकार्यता थी। इसका एक उदाहरण तब देखने को मिला था जब चंबल का एक इनामी डकैत उनके घर पहुंचा और आत्मसमर्पण करवाने की जिद करने करने लगा। इसे देखकर जेपी खुद हैरान रह गए थे। इसके बाद उन्होंने 400 से ज्यादा इनामी डकैतों का आत्मसमर्पण करवाया था।

400 डकैतों ने किया था आत्मसमर्पण: जयप्रकाश नारायण की जीवनी ‘The Dream Of Revolution’ में बिमल प्रसाद और सुजाता प्रसाद लिखते हैं, ‘मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के बॉर्डर से सटी चंबल घाटी उन दिनों डाकुओं और बागियों के लिए जानी जाती थी। लेकिन अप्रैल 1972 में जेपी के कहने पर चंबल के 400 डकैतों ने एक साथ आत्मसमर्पण कर दिया था। लेकिन इसकी कहानी अक्टूबर 1971 से शुरू होती है जब एक लंबी-चौड़ी कद काठी वाला बलवान व्यक्ति जयप्रकाश के पटना स्थित घर पर पहुंचा था।

यहां उसने जेपी से गुजारिश की थी कि वह उनके समर्पण की आवाज को सरकार तक पहुंचाएं। जयप्रकाश ने शुरुआत में उसे टालने की कोशिश की, लेकिन वो उनके मुंह से नहीं सुनने के पक्ष में बिल्कुल नहीं था। थोड़ी बातचीत के बाद उस व्यक्ति ने अपनी पहचान जेपी के आगे उजागर की। वह कोई और नहीं बल्कि एक लाख का इनामी डकैत माधो सिंह था। विचार-विमर्श के बाद आखिरकार जेपी ऐसा करने के लिए तैयार हुए और उन्होंने तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को इसको लेकर एक पत्र भी लिखा।

जेपी की तबीयत भी उस दौरान काफी खराब थी और वह दिल की बीमारी से जूझ रहे थे। उनके डॉक्टर भी ये सुनकर चकित रह गए थे कि इतनी खराब हालत के बावजूद उन्होंने अचानक चंबल की घाटियों में जाने का फैसला किया था। जेपी ने इसके पीछे तर्क दिया था कि बागियों को करने के लिए उन्हें खुद चंबल जाना होगा। इसके बाद उनकी टीम ने बुंदेलखंड के इलाकों में काम करना शुरू कर दिया था। ये काम ‘चंबल घाटी शांति मिशन’ के तहत शुरू किया था, जिसकी स्थापना अक्टूबर 1971 में की गई थी। इसका उद्देश्य देशभर के बागी गैंग से संपर्क कर उन्हें आत्मसमर्पण के लिए तैयार करना था।

बागियों पर क्या बोले थे जेपी: मार्च 1972 तक, कल्याण सिंह, मक्खन सिंह, हरविलास, मोहर सिंह, सरूप सिंह, तिलक सिंह, पंचल सिंह और काली चरण गैंग सरेंडर करने के लिए तैयार हो गए थे। बाद में एक मैग्जीन को दिए इंटरव्यू में जयप्रकाश ने कहा था, ‘जो लोग मेरे इस फैसले की निंदा करते हैं उन्हें पहले ये जानना होगा कि सरेंडर करने वाले 75 प्रतिशत बागियों के परिवार पर किसी न किसी तरीके से अत्याचार किया गया था और ये अत्याचार किसी और ने नहीं बल्कि पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों ने ही किया था।’

जेपी ने आगे कहा था, ‘गर्म स्वभाव के होने के कारण वे लोग ये सब बर्दाश्त नहीं कर सके और हिंसा का रास्ता अपना लिया था। इसके लिए सिर्फ कानून एवं व्यवस्था ही अकेले जिम्मेदार नहीं है, काफी हद तक सामाजिक-आर्थिक भेदभाव भी जिम्मेदार होता है। समाज में अपना सम्मान और स्थान वापस पाने के लिए चुनिंदा लोग हथियार उठा लेते हैं। यही वजह है कि इनमें से ज्यादातर या तो ठाकुर होते हैं या गुज्जर। ज्यादातर मामलों में जमीनी विवाद के बाद बागी बनने की कहानी भी सामने आती है।’

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