नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के बाद घर की बत्ती बंद करके बैठते थे लाल बहादुर शास्त्री, जेब से भरते थे बिजली का बिल

लाल बहादुर शास्त्री ने साल 1963 में नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद वह घर में कम बत्तियां जलाया करते थे। क्योंकि वह जेब से बिजली का बिल भरा करते थे।

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री (Express Archive Photo)

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद कांग्रेस में हलचल तेज हो गई थी। मोरारजी देसाई पीएम पद के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहे थे। लाल बहादुर शास्त्री का नाम भी आगे आ रहा था, लेकिन वह इसको लेकर उत्साहित नहीं थे और सबसे अंत में नज़र आ रहे थे। कांग्रेसी नेताओं ने देसाई की जगह लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर मुहर लगा दी थी। 9 जून 1964 को वो देश के प्रधानमंत्री बने थे।

घर की बत्ती बंद करके बैठते थे: लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ। दूसरी तरफ, अमेरिका लगातार भारत को धमकियां दे रहा था। इन सब चुनौतियों को लाल बहादुर शास्त्री ने बहुत आसानी से पार कर लिया था। लाल बहादुर शास्त्री इससे पहले रेल और गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाल चुके थे। दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैयर ने ‘बीबीसी’ से बातचीत में शास्त्री से जुड़ा एक किस्सा सुनाया था जब शास्त्री बिजली के बिल के कारण घर की बत्ती बंद करके बैठा करते थे।

कुलदीप नैयर ने बताया था, ‘कामराज योजना के तहत लाल बहादुर शास्त्री को नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था। तब वो देश के गृह मंत्री हुआ करते थे। ये बात साल 1963 की है। उस शाम मैं शास्त्री जी के घर पर गया था। पूरे घर में अंधेरा छाया हुआ था। सिर्फ ड्राइंग रूम की लाइट जल रही थी। शास्त्री वहां अकेले बैठकर अखबार पढ़ रहे थे। मैंने उनसे पूछा कि बाहर की बत्ती क्यों नहीं जल रही हैं? उन्होंने कहा, अब मुझे इस घर का बिजली का बिल जेब से देना पड़ेगा। इसलिए मैं हर जगह बत्ती जलाना बर्दाश्त नहीं कर सकता।’

अखबार में लिखा करते थे लेख: बकौल कुलदीप नैयर, शास्त्री को उस समय 500 रुपए सासंद की तनख्वाह मिला करती थी। ऐसे में उनके लिए अपने परिवार का पालन-पोषण तक करना कई बार मुश्किल हो जाता था। मैंने शास्त्री के लिए कुछ अखबारों में लिखने की व्यवस्था भी करवा दी थी। यहां से वह करीब 2000 रुपए अतिरिक्त कमा लिया करते थे। उनका पहला लेख पंडित जवाहर लाल नेहरू पर था और दूसरा लेख लाला लाजपत राय पर।

कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा में लिखा, मैं एक बार शास्त्री जी के साथ कार से वापस आ रहा था। वह गृह मंत्री हुआ करते थे। कार अचानक फाटक पर रुकी तो गन्ने के जूस वाले पर हम दोनों की नजर गई। उन्होंने कहा- कुलदीप, चलो थोड़ा गन्ने का रस ही पी लिया जाए। इससे पहले मैं कुछ प्रतिक्रिया देता। वो उतरे और गन्ने का जूस कार तक ले आए। ये सब मेरे लिए चौंकाने वाला था कि एक गृह मंत्री खुद ऐसा कर रहा था।

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