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स्मृतिः शुचिता का शास्त्री

महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री के जन्म की तारीख एक ही है। पर यह संयोग तब तारीखी हर्फ में बदल जाता है जब हम देखते हैं कि महात्मा का आदर्श एक साधारण घर के लाल को संघर्ष की राह पर न सिर्फ आजीवन आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है बल्कि नैतिक पुरुषार्थ का अक्षर सुलेख लिखने का नैतिक साहस भी देता है।

शास्त्री के जीवन पर महात्मा गांधी की सादगी का काफी असर था।

प्रेम प्रकाश

असहयोग आंदोलन से भारत छोड़ो आंदोलन के बीच देशभर में बड़ी संख्या में युवा राष्ट्रप्रेम की शपथ के साथ सार्वजनिक जीवन में आए। इन युवाओं ने स्वाधीनता के बाद भी देश की सेवा की और सार्वजनिक जीवन की शुचिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को अटूट बनाए रखा। ऐसे ही युवाओं में एक थे लाल बहादुर शास्त्री, जो स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधानमंत्री भी बने। उनके प्रधानमंत्रित्व काल में देश में नई स्फूर्ति के साथ राष्ट्रीय भावना का संचार हुआ। ‘जय जवान- जय किसान’ का नारा देकर उन्होंने देश में नई चेतना का संचार किया। दरअसल, साधारण जीवन को असाधारण ऊंचाई तक कैसे पहुंचाया जा सकता है, इसकी मिसाल शास्त्री के जीवन संघर्ष में देखने को मिलती है। स्वाभिमान और दृढ़ निश्चय जैसे गुण तो उनमें बचपन से ही दिखने लग गए थे। आगे चलकर ये सारे गुण जैसे पूरे देश के लिए प्रेरणा का एक वटवृक्ष ही बन गया।

अभाव, बचपन और महात्मा
शास्त्री के पिता एक स्कूल शिक्षक थे, जिनकी मृत्यु उसी समय हो गई थी जब शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे। बचपन में वे अक्सर कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर विद्यालय जाते थे। यहां तक कि भीषण गर्मी में जब सड़कें तप जाती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था।

वे जब थोड़े बड़े हुए तो उन्हें लगने लगा कि भारत को विदेशी दासता से मुक्ति मिलनी ही चाहिए। जब महात्मा गांधी ने भारत में रहने वाले उन राजाओं की निंदा की, जो कि भारत में ब्रितानी हुकूमत का समर्थन कर रहे थे, तो शास्त्री उनसे काफी प्रभावित हुए और महज 11 साल की उम्र में ही उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ करने का मन बना लिया। जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए देशवासियों का आह्वान किया, तो महज 16 साल की उम्र में अपनी पढ़ाई छोड़ कर जोर-शोर से सड़कों पर उतरने का क्रांतिकारी जज्बा उन्होंने दिखाया।

संवैधानिक मर्यादा
शास्त्री जितना दृढ़ निश्चयी थे, उतना ही संवेदनशील भी थे। इससे संबंधित एक घटना का जिक्र अक्सर किया जाता है। बात तब की है जब वे रेल मंत्री थे। तब एक ट्रेन दुर्घटना हुई। उस घटना से शास्त्री इतने आहत हुए कि उन्होंने यह कहकर अपने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया कि- मेरे रेल मंत्री रहते हुए रेल से संबंधित होने वाली किसी भी घटना के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस घटना पर संसद में लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी एवं उच्च आदर्शों की काफी तारीफ की। नेहरू ने कहा कि लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा उन्होंने इसलिए नहीं स्वीकार किया कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं, बल्कि इसलिए स्वीकार किया है क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी। रेल दुर्घटना पर संसद में चली लंबी बहस का जवाब देते हुए शास्त्री ने कहा, ‘शायद मेरे लंबाई में छोटे होने एवं नम्र होने के कारण लोगों को लगता है कि मैं बहुत दृढ़ नहीं हो पा रहा हूं। यद्यपि शारीरिक रूप से मैं मजबूत नहीं हूं लेकिन मुझे लगता है कि मैं आंतरिक रूप से इतना कमजोर भी नहीं हूं।’

निजी इस्तेमाल पर किया भुगतान
शास्त्री जब 1964 में प्रधानमंत्री बने, तब उन्हें सरकारी आवास के साथ ही इंपाला शेवरले कार मिली, जिसका इस्तेमाल वे न के बराबर ही किया करते थे। वह गाड़ी किसी राजकीय अतिथि के आने पर ही निकाली जाती थी। एक बार उनके पुत्र सुनील शास्त्री किसी निजी काम के लिए इंपाला कार ले गए और वापस लाकर चुपचाप खड़ी कर दी। शास्त्री को जब पता चला तो उन्होंने ड्राइवर को बुलाकर पूछा- कल कितने किलोमीटर गाड़ी चलाई गई? जब ड्राइवर ने बताया कि चौदह किलोमीटर, तो उन्होंने निर्देश दिया- ‘लिख दो, चौदह किलोमीटर प्राइवेट यूज।’

शास्त्री यहीं नहीं रुके, उन्होंने अपनी पत्नी को बुलाकर निर्देश दिया कि उनके निजी सचिव से कह कर वह सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में पैसे जमा करवा दें। दरअसल, शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बनने वाले ऐसे सरल और साधारण व्यक्ति थे जिनके जीवन का आदर्श प्रधानमंत्री बनने के बाद भी पहले की तरह ही रहा। भारतीय राजनीतिक जीवन में ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं कि समाज के बेहद साधारण वर्ग से अपना जीवन सफर शुरू कर कोई व्यक्ति शीर्ष संवैधानिक पदों तक पहुंचा हो।

कर्ज लेकर खरीदी कार
शास्त्री का जीवन संघर्षमय जरूर रहा पर इस कारण उन्होंने सार्वजनिक जीवन की शुचिता कभी मैली नहीं होने दी। इस सिलसिले में उनके जीवन से जुड़ी कार से ही संबंधित एक और दिलचस्प घटना का जिक्र जरूरी है। प्रधानमंत्री बनने तक उनका अपना घर तो क्या एक कार तक नहीं थी। एक बार उनके बच्चों ने उन्हें उलाहना दिया, ‘अब आप भारत के प्रधानमंत्री हैं। कम से कम अब आपके पास अपनी एक कार तो होनी ही चाहिए।’

उस जमाने में फिएट कार 12 हजार रुपए में आती थी। उन्होंने अपने सचिव से कहा, ‘जरा देखें, मेरे बैंक खाते में कितने रुपए हैं?’ सचिव ने बताया कि उनका बैंक बैलेंस मात्र 7,000 रुपए है। जब बच्चों को पता चला कि उनके पिता के पास कार खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं तो उन्होंने कहा कि कार मत खरीदिए। लेकिन शास्त्री ने कहा कि बाकी के पैसे बैंक से लोन लेकर जुटा लेंगे। इस तरह उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से कार खरीदने के लिए 5,000 रुपए का लोन लिया। हालांकि एक साल बाद लोन चुकाने से पहले ही उनका निधन हो गया, जिसे बाद में उनकी पत्नी ने चार साल बाद तक अपनी पेंशन से चुकाया। यह कार आज भी दिल्ली के लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल में रखी हुई है और दूर-दूर से लोग इसे देखने आते हैं।

नैतिक दुर्बलताओं पर विजय
शास्त्री के जीवन पर महात्मा गांधी की सादगी का काफी असर था। मितव्ययी होना और उपलब्धि या हैसियत बढ़ जाने के बाद नैतिक स्फीतियों में फंसने जैसी दुर्बलताओं पर वे हमेशा विजय पाते रहे। यही कारण है कि ढूंढने पर भी ऐसी मिसाल नहीं मिलती कि प्रधानमंत्री हो जाने के कारण उनके स्वभाव या सादगी में कोई फर्क आया हो। कमाल तो यह कि यह सीख उन्होंने अपने तक ही नहीं रखी बल्कि बच्चों को भी दी।

बात साल 1964 की है, जब वे प्रधानमंत्री बने तो उनके बेटे अनिल शास्त्री दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल में पढ़ रहे थे। शास्त्री ने तय किया कि एक अभिभावक की तरह वे भी अपने बेटे का रिपोर्ट कार्ड लेने स्वयं उनके स्कूल जाएंगे। स्कूल पहुंचने पर वे स्कूल के गेट पर ही उतर गए। हालांकि सिक्योरिटी गार्ड ने कहा कि वे कार को स्कूल के परिसर में ले आएं, लेकिन उन्होंने मना कर दिया।

शास्त्री जब बेटे की कक्षा में गए तो शिक्षक रेवेरेंड टाइनन उन्हें वहां देखकर हतप्रभ रह गए और बोले- सर, आपको रिपोर्ट कार्ड लेने यहां आने की जरूरत नहीं थी। आप किसी को भी भेज देते। शास्त्री का जवाब था- मैं वही कर रहा हूं जो मैं पिछले कई सालों से करता आया हूं और आगे भी करता रहूंगा। टाइनन ने कहा- लेकिन अब आप भारत के प्रधानमंत्री हैं। शास्त्री मुस्कराते हुए बोले- ब्रदर टाइनन, मैं प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नहीं बदला, लेकिन लगता है आप बदल गए हैं।

देश के लाल की ललकार
जिस समय लाल बहादुर शास्त्री ने प्रधानमंत्री के तौर पर देश की बागडोर संभाली, उस समय मुल्क में अनेक चुनौतियां थीं, जिनका समाधान उन्होंने बड़ी सूझ-बूझ के साथ निकाला। इसी दौरान 1965 में पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। पर शास्त्री रत्ती भर भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने सेना को पाकिस्तान के आक्रमण का मुंहतोड़ जवाब देने का आदेश दिया। शास्त्री ने ओजस्वी स्वर में कहा, ‘इस बार युद्ध भारत की धरती पर नहीं बल्कि पाकिस्तान की धरती पर होगा।’

इस युद्ध में भारतीय जवानों ने पाकिस्तानी सेना को पूरा सबक सिखाया। पाकिस्तान इस युद्ध में बुरी तरह पराजित हुआ। इस दौरान रूस के प्रधानमंत्री कोसिगिन की पहल पर भारत-पाकिस्तान के बीच शांति समझौता के लिए ताशकंद में वार्ता आयोजित हुई। जहां दोनों देशों के बीच अहम मुद्दों पर तारीखी सहमति बनी, जिसे ‘ताशकंद समझौते’ के तौर पर हम जानते हैं। पर यहीं से भारत को 11 जनवरी, 1966 को अपने प्रिय नेता को खो देने की दुखद खबर भी मिली।

 

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