दक्षिण भारत के कई व्यंजन न सिर्फ देश बल्कि दुनिया में भी बड़े चाव से लोग खाना पसंद करते हैं। दक्षिण भारतीय व्यंजन अपने बनाने की खास शैली और कम तेल में पकने के चलते विश्वभर में मशहूर हैं। पेय पदार्थों की बात करें तो दक्षिण भारतीय फिल्टर कॉफी अपने तेज खुशबू और पारंपरिक तरीके से बनाने के लिए मशहूर है। लेकिन इन सबसे अलग कुंभकोणम डिग्री कॉफी भी है, जो अपने अनोखे स्वाद और बनाने के तरीके के लिए मशहूर है। यह कॉफी खासतौर से तमिलनाडु में आपको बड़े रेस्टोरेंट से लेकर छोटे स्टॉलों पर आसानी से मिल जाएगी। आइए जानते हैं इससे जुड़ी कुछ रोचक जानकारी के बारे में।
इस कॉफी में डिग्री नाम को सुनकर अक्सर लोग हैरान हो जाते हैं, कि ऐसा क्या खास है जिसकी वजह से यह नाम रखा गया। यह शब्द कॉफी में इस्तेमाल होने वाले दूध की शुद्धता और गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता है। पुराने समय में दूध की गुणवत्ता की जांच करने के लिए विशेष परीक्षण किए जाते थे और जो दूध पूरी तरह शुद्ध पाया जाता था उसे ‘डिग्री मिल्क’ कहा जाता था। इसी उच्च गुणवत्ता वाले दूध से तैयार होने वाली कॉफी को कुंभकोणम डिग्री कॉफी नाम दिया गया।
क्या है कुंभकोणम डिग्री कॉफी
कुंभकोणम डिग्री कॉफी पारंपरिक साउथ इंडियन फिल्टर कॉफी का एक बेहद खास और प्रीमियम रूप है। यह अपनी गाढ़ी बनावट, भरपूर झाग और कड़वाहट व मिठास के संतुलित स्वाद के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। अधिकतर जगहों पर कॉफी बनाने के लिए इंस्टेंट कॉफी पाउडर या पतले दूध का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन कुंभकोणम डिग्री कॉफी को अलग तरह से बनाया जाता है।
कुंभकोणम डिग्री कॉफी को पीतल या स्टेनलेस स्टील के डबरा-टंबलर सेट में गरमागरम परोसा जाता है। यह बर्तन कॉफी की गर्माहट बनाए रखते हैं और कॉफी को एक बर्तन से दूसरे बर्तन में ऊंचाई से डालने पर उसमें गाढ़ा और मुलायम झाग बनता है। इन बर्तनों में कॉफी परोसना पारंपरिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह स्वाद को बेहतर बनाने में मदद करता है।
कहां है कुंभकोणम
कुंभकोणम तमिलनाडु के तंजावुर जिले में स्थित एक प्रमुख शहर है। यहां सैकड़ों प्राचीन चोलकालीन मंदिर हैं, जिसके कारण इसे ‘टेंपल सिटी’ के नाम से भी जाना जाता है।
डिग्री के पीछे की कहानी
माना जाता है कि 20वीं सदी के मध्य में पंचापिकेसा अय्यर के पसुम्पाल (गाय के दूध) कॉफी क्लब ने इस कॉफी को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। उस समय दूध की गुणवत्ता जांचने के लिए लैक्टोमीटर नामक एक कांच का उपकरण इस्तेमाल किया जाता था। यह दूध की घनत्व और उसमें पानी की मिलावट को मापता था। दूध शुद्ध होने पर लैक्टोमीटर एक निश्चित डिग्री स्तर पर दर्ज होता था। ऐसे शुद्ध और बिना मिलावटी वाले दूध को लोग ‘डिग्री मिल्क’ कहने लगे। जब इस उच्च गुणवत्ता वाले दूध का इस्तेमाल फिल्टर कॉफी बनाने में किया गया तो, उसका नाम डिग्री कॉफी रखा गया।
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