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Kartar Singh Sarabha: भगत सिंह जेब में रखते थे अपने इस हीरो की फोटो

kartar singh sarabha, The Real Hero of Bhagat Singh: हाईस्कूल पास होने के बाद वह आगे की पढ़ाई विदेश में करना चाहते थे। उच्च शिक्षा के लिए वह अमेरिका पहुंच गए। खर्चों के चलते वह पढ़ाई के साथ काम भी करने लगे। यहां उनका सामना अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे नस्लीय भेदभाव से हुआ।

Author Published on: November 16, 2019 9:11 AM
करतार सिंह सराभा (फोटो सोर्स: Twitter)

भगत सिंह, एक नाम जिससे अंग्रेज थर्राते थे और हर हिंदुस्तानी जोश से आज भी भर उठता है। पर क्या आप उस नाम को जानते हैं जिससे खुद भगत सिंह जोश से भर उठते थे? शायद बहुत कम देशवासी जानते होंगे। करतार सिंह सराभा, जिन्हें भगत सिंह (Bhagat Singh) भी अपना गुरु मानते थे। करतार सिंह ने भगत सिंह से भी कम उम्र में देश के लिए जान दे दी थी। उस वक्त वह सिर्फ 19 साल के थे। करतार सिंह को 16 नवंबर 1915 को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी।

अमेरिका से शुरू की थी अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति

करतार सिंह सराभा का जन्म 24 मई 1896 को पंजाब के लुधियाना जिले में स्थित सराभा गांव में हुआ था। करतार सिंह के पिता का नाम सरदार मंगल सिंह और माता साबिह कौर थीं। लेकिन उनके सिर पर ज्यादा समय तक पिता का साया नहीं रह पाया। इसके बाद वह दादा सरदार बदन सिंह की छांव तले रहने लगे। लुधियाना में ही करतार सिंह की शुरुआती शिक्षा हुई। यहां से कक्षा नौ उत्तीर्ण करने के बाद वह उड़ीसा चले गए अपने चाचा के पास। उड़ीसा से ही उन्होंने हाईस्कूल पास किया।

हाईस्कूल पास होने के बाद वह आगे की पढ़ाई विदेश में करना चाहते थे। उच्च शिक्षा के लिए वह अमेरिका पहुंच गए। खर्चों के चलते वह पढ़ाई के साथ काम भी करने लगे। यहां उनका सामना अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे नस्लीय भेदभाव से हुआ। जो अंग्रेजों के खिलाफ नफरत का पहला और सबसे बड़ा कारण था। यहीं करतार सिंह की मुलाकात लाला हरदयाल से हुई। वह वहां पहले से ही अमेरिका में रहकर ही भारत की आजादी दिलाने की कोशिशों में लगे हुए थे।

भारत की आजादी के लिए 25 मार्च 1913 को ऑरेगन राज्य में हिंदुस्तानियों की बैठक हुई। यहां लाला हरदयाल सिंह ने लोगों से कहा कि, मुझे भारत को आजादी दिलाने के लिए प्राण न्योछावर करने वाले युवाओं की जरूरत है। इतना सुनते ही करतार सिंह उठ खड़े हुए। कम उम्र के करतार सिंह का यह जज्बा देख हरदयाल सिंह ने उन्हें गले लगा लिया। इसके बाद इसी साल 21 अप्रैल को अमेरिका में ही गदर पार्टी का गठन किया गया। इसी नाम से एक वीकली अखबार निकाला गया। इस अखबार की कमान करतार सिंह को ही सौंप दी गई।

भारत को गुलामी से आजादी दिलाने के लिए करतार सिंह ने योजनाएं बनानी शुरू कीं। करतार सिंह ने शचीन्द्रनाथ सान्याल, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, रासबिहारी बोस, आदि बड़े क्रांतिकारियों से मिलना शुरू किया। करतार सिंह ने जालंधर में एक पार्टी का आयोजन किया। इसमें सभी क्रांतिकारियों ने हिस्सा लिया। यहां के सुझाव पर रास बिहारी बोस पंजाब आकर क्रांतिकारियों के संगठन के अगुआ बन गए। इसके बाद अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह छेड़ने की तारीख तय की। तारीख तय हुई 21 फरवरी 1915 की। लेकिन इस तारीख और प्लान का राज एक गद्दार किरपाल सिंह ने अंग्रेजों को बता दिया। इसकी भनक क्रांतिकारियों को लगी तो 19 फरवरी की तारीख पर सहमति बनी।

हालांकि, 19 नवंबर के बारे में भी अंग्रेजों को पता चल गया। जिसके बाद सभी क्रांतिकारियों के खिलाफ कार्यवाई शुरू की गई। जिसके चलते करतार सिंह अपने एक करीबी के घर रुक गए। लेकिन वह भी गद्दार निकला। करतार सिंह की सूचना अंग्रेजों को देकर उन्हें गिरफ्तार करवा दिया। करतार सिंह सराभा और उनके साथ के 24 क्रांतिकारियों के खिलाफ राजद्रोह, डकैती और कत्ल का मुकदमा चलाया गया। कोर्ट ने करतार सिंह समेत सभी क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई। करतार सिंह और 6 क्रांतिकारियों को 16 नवंबर 1915 को फांसी दी गई। जिस वक्त करतार सिंह को फांसी दी गई, उस वक्त वह महज 19 साल के थे।

करतार सिंह सराबा को भगत सिंह अपना हीरो मानते थे। जिसका जिक्र खुद भगत सिंह की मां विद्यावती ने किया था। उन्होंने बताया था कि, जब भगत सिंह को गिरफ्तार किया गया था, उस वक्त उनके जेब से शहीद करतार सिंह की तस्वीर निकली थी। भगत सिंह ने करतार सिंह की फोटो अपनी मां को दिखाते हुए कहा था कि, यह मेरे हीरो हैं।

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