कभी आप जंगल में सफारी के लिए जाएं और अचानक झाड़ियों के बीच से बाघ की एक झलक दिख जाए। इस पल को शायद ही आप कभी भूल पाएंगे। जो भी जंगल सफारी जाता है वो इस नजारे को देखना चाहता है। लेकिन क्या बाघ को देखना सिर्फ किस्मत की बात है? तो इसका जवाब है नहीं। जंगल को करीब से समझने वाले नेचुरलिस्ट कई ऐसे संकेत पढ़ लेते हैं, जिनसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आसपास बाघ हो सकता है।

मानसून का मौसम खत्म होने के साथ ही भारत के कई मशहूर वाइल्डलाइफ डेस्टिनेशन सफारी के लिए फिर से खुलने लगते हैं। राजस्थान के रणथंभौर और सरिस्का टाइगर रिजर्व से लेकर उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क तक, जंगल और बाघों को करीब से देखने के लिए पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने लगती है।

ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल होता है कि क्या जंगल में बाघ के नजर आने की जगह का पहले से अंदाजा लगाया जा सकता है? तो जवाब है—कुछ हद तक। जंगल में कुछ भी अलग-अलग नहीं होता। मिट्टी, पेड़-पौधे, कीड़े-मकौड़े, पक्षी और दूसरे जानवर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इन्हीं के व्यवहार में छिपे संकेतों को समझकर नेचुरलिस्ट बाघ की मौजूदगी का अंदाजा लगाते हैं।

जंगल में जानवरों की आवाज पर दें ध्यान

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कैनाइन बिहेवियरिस्ट और वाइल्डलाइफ एंथूजियास्ट स्वाति टंडन बताती हैं कि जब बाघ जंगल में घूमता है तो आसपास के जानवरों का व्यवहार बदलने लगता है। यही आवाजें बाघ को ट्रैक करने में मदद करती हैं। जैसे पहले लंगूर जोर-जोर से आवाज कर सकते हैं और उसके बाद सांभर या चीतल की अलार्म कॉल सुनाई दे सकती है। मोर, गिलहरी और दूसरे पक्षी भी किसी शिकारी की मौजूदगी पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं। इसलिए जंगल में सिर्फ आंखों से बाघ को ढूंढना ही जरूरी नहीं है। आसपास की आवाजों को ध्यान से सुनना भी उतना ही अहम है।

सांभर की अलार्म कॉल क्यों होती है खास?

बाघ को ट्रैक करते समय नेचुरलिस्ट अलग-अलग जानवरों की अलार्म कॉल को पहचानने की कोशिश करते हैं। हर आवाज का मतलब एक जैसा नहीं होता।

Pugdundee Safaris के डायरेक्टर मानव खंडूजा के मुताबिक, सांभर की अलार्म कॉल और लगातार आती आवाजें इस बात का संकेत हो सकती हैं कि आसपास बाघ होने की संभावना है। नेचुरलिस्ट यह भी समझने की कोशिश करते हैं कि बाघ एक जगह रुका हुआ है या आगे बढ़ रहा है।

यानी जंगल में किसी जानवर की आवाज सुनकर तुरंत यह मान लेना सही नहीं कि बाघ वहीं मौजूद है। अनुभवी नेचुरलिस्ट आवाज की दिशा, उसकी लगातार होने वाली प्रतिक्रिया और आसपास के दूसरे संकेतों को भी देखते हैं।

पंजों के निशान भी देते हैं बाघ की जानकारी

जंगल में जानवरों के पैरों के निशान यानी पगमार्क भी अहम संकेत होते हैं। किसी रास्ते पर मिले ताजा निशान से नेचुरलिस्ट को अंदाजा लगाने में मदद मिल सकती है कि वहां से कोई बड़ा जानवर हाल में गुजरा है।

इसके साथ ही जंगल की पगडंडियों पर जानवरों की आवाजाही और आसपास के रास्तों को भी देखा जाता है। इन संकेतों को आसपास मौजूद पानी के स्रोतों से जोड़कर भी बाघ की संभावित मौजूदगी को समझने की कोशिश की जाती है।

पानी के आसपास भी नजर रखते हैं नेचुरलिस्ट

जंगल में पानी हर जानवर के लिए जरूरी है। इसलिए तालाब, झील या दूसरे जलस्रोत भी सफारी के दौरान अहम जगह होते हैं।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि पानी के पास पहुंचते ही बाघ दिखाई देगा। बाघ अपने व्यवहार और आसपास की परिस्थितियों के हिसाब से अपनी जगह बदल सकता है। इसलिए नेचुरलिस्ट पानी के स्रोत के साथ-साथ आसपास के जंगल और जानवरों की गतिविधियों पर भी नजर रखते हैं।

बाघ की तलाश में जल्दबाजी नहीं की जाती

अगर किसी जगह बाघ की मौजूदगी के संकेत मिलें तो इसका मतलब यह नहीं कि सफारी वाहन को तुरंत उसी दिशा में दौड़ा दिया जाए।

स्वाति टंडन कहती हैं कि जंगल के उस हिस्से में पहुंचने के बाद सबसे जरूरी है—शांत रहना, देखना, सुनना और जंगल का सम्मान करना।

कई बार बाघ वाहन की आवाज सुनकर छिप जाता है। वह वहीं आराम करने का फैसला कर सकता है या अपनी सामान्य गतिविधि का तरीका बदल सकता है।

इसलिए अनुभवी नेचुरलिस्ट यह समझने की कोशिश करते हैं कि किसी जगह पर इंतजार करना सही होगा या आगे बढ़ जाना बेहतर है।

बाघ दिखे, यह जरूरी नहीं; जंगल को समझना भी सफारी का हिस्सा है

बाघ को देखने की चाह हर सफारी पर जाने वाले व्यक्ति की होती है, लेकिन जंगल में बाघ हमेशा आपके सामने आए, ऐसा जरूरी नहीं है। कई बार बाघ आपको देख चुका होता है और आप उसे देख भी नहीं पाते।

स्वाति के मुताबिक, जंगल में सिर्फ बाघ को खोजने के इरादे से नहीं जाना चाहिए। जंगल की आवाजें सुनना, जानवरों का व्यवहार देखना और प्रकृति को समझना भी सफारी के अनुभव का हिस्सा है।