सनातन धर्म में जनन्नाथ रथ यात्रा का बेहद ही खास महत्व है। ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर दर्शन करने के लिए हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। लेकिन सबसे अधिक भीड़ रथ यात्रा के समय होती है। इस वक्त वहां का वातावरण पूरी तरह से भक्तिमय होता है। श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ की एक झलक पाने के लिए दूर-दूर से सफर करके आते हैं। रथयात्रा के दौरान हर व्यक्ति हर आदमी का परिचय सिर्फ इतना रह जाता है कि वह जगन्नाथजी की शरण में आया है। किसी का पद और कद कोई मायने नहीं रखता।

रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ को जिस रथ पर बैठाकर श्रद्धालु खिंचते हैं, वह दिखने में भले ही आपको साधारण लगे। लेकिन उसके निर्माण की पूरी विधि और प्रक्रिया है। साल में एक बार मनाए जाने वाले इस त्योहार की तैयारी पूरे साल चलती रहती है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण दिन अक्षय तृतीया का होता है। इस दिन विधिवत पूजा के साथ यात्रा की तैयारी शुरू होती है और रथ निर्माण का काम वसंत पंचमी के दिन से शुरू होता है।

जगन्नाथ रथ यात्रा में तीन रथ का इस्तेमाल किया जाता है। पहला रथ भगवान बालभद्र का होता है, दूसरा माता सुभद्रा का होता है और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ होता है। हर रथ की ऊंचाई, लंबाई, चौड़ाई और रंग अलग-अलग होता है। साथ ही तीनों रथों के नाम भी अलग होते हैं।

जगन्नाथ जी के रथ का नाम

भगवान जगन्नाथ जी का रथ सबसे बड़ा होता है, जिसका नाम नंदीघोष है, जिसे बनाने में 832 लकड़ी के टुकड़ों का प्रयोग किया जाता है। इसमें 16 पहिए लगे होते हैं। रथ की ऊंचाई 45 फीट होती है और लंबाई 34 फीट होती है। रथ के सारथी का नाम दारूक, रक्षक गरुड़, रथ की रस्सी शंखचूर्ण नागुची और रथ पर त्रैलोक्य मोहिनी पताका पहराती हैं।

सुभद्रा के रथ का नाम

जगन्नाथ जी की बहन सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन है जिसमें कुल काष्ठ खंडों की संख्या 593 होती है और 12 चक्कों पर खड़ा यह रथ 31 फीट लंबा और 43 फीट ऊंचा होता है। इसके सारथी अर्जुन हैं और रक्षिका जयदुर्गा देवी हैं। रस्से का नाम स्वर्णचूड़ नागुची है और पताका नादाम्बिका हैं।

बालभद्र के रथ का नाम

बालभद्र के रथ का नाम तालध्वज है, जो 763 लकड़ी के टुकड़ों से बनाया जाता है। इसमें कुल 14 चक्के होते हैं, इसकी ऊंचाई 44 फीट और लंबाई 33 फीट होती है। सारथी मातली, रक्षक वासुदेव, रस्से का नाम वासुकि और पताका उन्नानी है।

कौन बनाता है रथ

भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए इन तीनों रथों को बनाना इतना आसान नहीं है। इसकी पूरी एक प्रक्रिया है। लकड़ी खोजने से लेकर कटाई और निर्माण तक और सभी कार्य एक अनुष्ठान की तरह किए जाते हैं। इसमें सबसे अहम भूमिका महाराणा निभाते हैं, जो एक बढ़ई हैं। रथ बनाने की परंपरा महाराणी कारीगर सदियों से निभाते आ रहे हैं। इनके बिना रथ का निर्माण अधूरा माना जा सकता है। क्योंकि, महाराणा (बढ़ई सेवक) लोगों का काम होता है लकड़ी खोजकर लाना और उन्हें रथशाला में रखना। इसके बाद गुणकार लोग रथ के आकार के मुताबिक लकड़ियों का आकार तय करते हैं। फिर उन्हें उसी आकार और लंबाई-चौड़ाई में काटा जाता है। इसके बाद पहि महाराणा आते हैं जो रथ के पहियों का बनाना होता है। रथ निर्माण में लगभग 200 से अधिक सेवक और कारीगर शामिल होते हैं। प्रत्येक समूह का कार्य पहले से निर्धारित होता है।

इन कारीगरों के बिना रथ का निर्माण अधूरा

वहीं, चंदाकार लोगों का काम रथों के अलग-अलग बन रहे हिस्सों को आपस में जोड़ने और सजाने का होता है। इसके बाद रूपकार और मूर्तिकार आते हैं, जो रथ पर लगने वाली लकड़ियों को काटते हैं और उन्हें तराशते हैं। इसके बाद चित्रकारों का काम रथ पर रंग लगाने और चित्रकारी का होता है। फिर दरजी सेवक रथ की सजावट के लिए कपड़े सिलते हैं। इनके सहायक और मजदूर भी होते हैं, जिन्हें रथ भोई (सहायक श्रमिक) कहते हैं। बिना इनके रथ निर्माण की कल्पना नहीं की जा सकती है। यह काम सदियों से इन्हीं के पीढ़ी के लोग करते आ रहे हैं। इसे वह अपनी नौकरी नहीं बल्कि भगवान की सेवा मानते हैं। इसके लिए कहीं से ट्रेनिंग नहीं ली जाती है, बल्कि उनके बच्चे बचपन से ही अपने बुजुर्गों को रथ का काम करते हुए देखते हैं और सीखते हैं। वहीं, इन लकड़ियों को काटने से पहले उनकी पूजा की जाती है और लकड़ी काटने से लेकर इसे चुनने तक के कई नियम है।

सोने के कुल्हाड़ी से लगता है लकड़ियों पर कट

रथ बनाने का निर्माण काम अक्षय तृतीया से शुरू हो जाता है। जंगल से लकड़ियां लाने से पहले मंदिर समिति के लोग वन विभाग के अधिकारियों को सूचना भेजते हैं और इसके बाद मंदिर के पुजारी जंगल जाकर उन पेड़ों की पूजा करते हैं, जिनकी लकड़ियों का इस्तेमाल रथ बनाने में होता है। पूजा के बाद उन पेड़ों पर सोने की कुल्हाड़ी से कट लाया जाता है। लकड़ी में सोने की कुल्हाड़ी से कट लगाने का काम महाराणा कारीगरों द्वारा किया जाता है। लकड़ियों पर कट लगाने से पहले इस कुल्हाड़ी को भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा को स्पर्श कराया जाता है।

कितनी पुरानी है यह परंपरा

जगन्नाथ रथ यात्रा को भारत की सबसे प्राचीन और सबसे विशाल धार्मिक यात्राओं में से एक मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसकी परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है और इसका उल्लेख ब्रह्म पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। ऐतिहासिक दृष्टि पर नजर डालें तो पुरी की रथ यात्रा का आयोजन 12वीं शताब्दी में अनंतवर्मन चोडगंग देव द्वारा जगन्नाथ मंदिर के निर्माण के बाद नियमित रूप से शुरू हुआ। इस आधार पर यह परंपरा लगभग 800 से 900 वर्ष पुरानी मानी जाती है। रथ को बनाने वाले कारीगरों को लेकर भी कहा जाता है कि, ये भी शुरुआत से ही रथ के निर्माण का कार्य करते आ रहे हैं। यानी यह परंपरा वंशानुगत है जिसका अर्थ हुआ कि जिस परिवार के पूर्वज रथ बनाते थे, आज भी उसी परिवार की अगली पीढ़ियां यह जिम्मेदारी निभाती हैं।

Also Read
तीर्थ यात्रा: अमरनाथ यात्रा से जुड़ी मान्यताओं से लेकर रुकने-खाने की सुविधा तक, पढ़ें पूरी ट्रैवल गाइड