आज के समय में आम हो चुकी आइसक्रीम किसी जमाने में शान और रुतबे से जुड़ा हुआ करती थी। इसकी उपलब्धता आज जितनी आसान नहीं थी। अपने शुरुआती दौर में बर्फ से बनी आइसक्रीम और अन्य ठंडी मिठाइयां मुख्य रूप से राजघरानों, शासकों और अमीर लोगों के खान-पान और शान का हिस्सा हुआ करती थीं। उस समय बर्फ को जमा करना और लंबे समय तक सुरक्षित रखना आसान नहीं था, इसलिए ऐसी ठंडी मिठाइयां हर किसी की पहुंच में नहीं थीं। बाद में बर्फ बनाने और रेफ्रिजेरेशन की तकनीक विकसित हुई, तो आइसक्रीम धीरे-धीरे आम लोगों तक भी पहुंचने लगी।

आज हम आइसक्रीम कोन, कप और स्टिक जैसे कई रूपों में खाना पसंद करते हैं। किसी भी चीज के अस्तित्व में आने और समय के साथ उसके रूप में बदलाव होने के पीछे कई दिलचस्प किस्से छिपे होते हैं। कई बार किसी छोटी सी घटना या अचानक सामने आई जरूरत से ऐसा विचार जन्म लेता है, जो आगे चलकर दुनियाभर में लोकप्रिय हो जाता है। कुछ ऐसी ही दिलचस्प कहानी आइसक्रीम कोन के जन्म से भी जुड़ी है।

प्लेट और चम्मच वाला दौर

एक समय ऐसा था जब आइसक्रीम को प्लेट में परोसा जाता था और चम्मच से खाया जाता था। कांच की प्लेट के अलावा कप या छोटे बर्तनों में भी इसे परोसा जाता था और बर्तन को दोबारा इस्तेमाल किया जाता था। 20वीं सदी की शुरुआत तक आइस्क्रीम को चलते-फिरते खाना आसान नहीं था। लेकिन एक मेले में कुछ ऐसा हुआ कि आइसक्रीम को परोसने के पूरी कहानी ही बदल गई और जन्म हुआ कोन का।

प्लेट की कमी से कैसे बना कोन

वैसे तो आइसक्रीम के कोन को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं लेकिन सबसे प्रसिद्ध 1904 के सेंट लुइस वर्ल्ड फेयर की है। कहते हैं कि साल 1904 में अमेरिका के सेंट लुइस वर्ल्ड फेयर में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लाखों लोग पहुंचे थे। ‘स्मिथसोनियन’ के अनुसार अप्रैल से दिसंबर 1904 के बीच इस मेले में 1.97 करोड़ से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया था और इसी मेले में एक व्यक्ति की उपजी सोच ने पूरी दुनिया में कोन को लोकप्रिय बनाया।

नेशनल ज्योग्राफिक वेबसाइट के अनुसार, सबसे लोकप्रिय कहानियों में से एक मेले के एक आइसक्रीम विक्रेता के पास आइसक्रीम परोसने के लिए बर्तन कम पड़ गए थे। ठीक पास में सीरियाई मूल के दुकानदार अर्नेस्ट हैमवी पतली, वेफर जैसी मिठाई बेच रहे थे। कहानी के अनुसार, हैमवी ने अपनी वेफर जैसी पेस्ट्री को मोड़कर शंकु यानी कोन का आकार दिया और उसमें आइसक्रीम भर दी।

कोन को नाम दिया गया ‘कॉर्नुकॉपिया’

हैमवी की बनाई इस तरह की वेफर कोन को ‘कॉर्नुकॉपिया’ नाम से जाना जने लगा। उनका यह विचार लोगों को इतना पसंद आया कि मेले के दूसरे विक्रेता भी इस तरह वेफर का कोन बनाकर उसमें आइसक्रीम डालकर बेचने लगे। ‘स्मिथसोनियन’ में भी हैमवी और आइसक्रीम स्टैंड के बीच इसी तरह की कहानी के बारे में बताया गया है। इसके बाद अर्नेस्ट हैमवी आइसक्रीम के कारोबार में उतर गए। उन्होंने ‘मिसौरी कोन’ कंपनी की स्थापना भी की।

दूसरी कहानी

हालांकि, नेशनल ज्योग्राफिक एक और कहानी का जिक्र करता है। नेशनल ज्योग्राफिक के अनुसार कुछ लोग कोन का श्रेय इटली से अमेरिका आए प्रवासी इटालो मार्चियोनी को देते हैं। करीब 1903 में, मार्चियोनी ने आइसक्रीम कोन से जुड़े एक पेटेंट के लिए आवेदन किया था। उनका विचार ऐसी मशीन बनाने का था, जो आटे से खाने योग्ट छोटे कंटेनर तैयार कर सके। इनमें आइसक्रीम भरी जाती और आइसक्रीम खत्म होने के बाद उस कंटेनर को भी खाया जा सकता था। हालांकि, कंटेनर आज के आइसक्रीम कोन जैसे नहीं थे। इनका आका कोन की बजाय छोटे कप जैया था और इनके साथ छोटे-छोटे हैंडल भी लगे होते थे।

नेशनल ज्योग्राफिक वेबसाइट के अनुसार हैमवी को इस काम में मार्चियोनी से ज्यादा सफलता मिलती। दूसरी तरफ, आइसक्रीम कोन लोकप्रिय होने के बाद मार्चियोनी को अपने पेटेंट के अधिकारों की रक्षा करने के लिए कानूनी विवादों का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिल पाई। हालांकि, इन दोनों के अलावा इसकी शुरुआत से जुड़ी दूसरी कहानियों में ओहायो के दो अन्य स्टॉल संचालकों और 1904 के वर्ल्ड फेयर में मौजूद कम से कम एक अन्य विक्रेता का भी नाम मिलता है।

नेशनल ज्योग्राफिक वेबसाइट पर एक और बात सामने आती है कि, कुछ लोगों का मानना है कि आइसक्रीम कोन का आविष्कार अमेरिका में हुआ ही नहीं था। फ्रांस और जर्मनी में आइसक्रीम बेचने वाले लोग 1900 से पहले ही कागज, धातु और खाने योग्य अलग-अलग चीजों से बने कोन में आइसक्रीम परोसा करते थे।

आइसक्रीम कोन के आविष्कार के पीछे कई मत हैं, जिसके चलते इतिहासकारों के लिए यह तय करना मुश्किल है कि कोन की शुरुआत वास्तव में किसने की थी।

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