ताज़ा खबर
 

लेक्चरर बनने से लेकर राजनीति का सफ़र; जानिए किसके कहने पर उपेन्द्र ने लगाना शुरू किया अपने नाम में ‘कुशवाहा’

बिहार के कई नेताओं की तरह उपेन्द्र कुशवाहा भी जेपी आंदोलन की उपज हैं। राजनीति में उपेन्द्र कुशवाहा की नीतीश कुमार से कई बार नजदीकियां बढ़ी और कई बार दोनों अलग हुए।

upendra kushwaha, bihar election 2020, bihar politicsउपेन्द्र कुशवाहा इस बिहार चुनाव में ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं

वैशाली के जन्दाहा में एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे उपेन्द्र कुशवाहा बिहार के शीर्ष नेताओं में से एक हैं। जिस तरह से नीतीश कुमार, राम विलास पासवान, लालू यादव की राजनीतिक शुरुआत जेपी आंदोलन से हुई उसी तरह उपेन्द्र कुशवाहा की भी राजनीतिक पाठशाला वहीं से शुरू हुई। उपेन्द्र कुशवाहा ने पटना के साइंस कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरी की उसके बाद मुजफ्फरपुर के बी. आर. अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय से राजनीति में एम. ए. किया। राजनीति में पढ़ाई पुरी करने के बाद उपेन्द्र कुशवाहा ने जन्दाहा कॉलेज में लेक्चरर के पद पर भी काम किया।

1985 में उपेन्द्र कुशवाहा ने राजनीति में कदम रखा और लोक दल के यूथ विंग से जुड़ गए। नीतीश कुमार उनके सीनियर थे और कहा जाता है कि उपेन्द्र कुशवाह ने उन्हीं से राजनीति की बारीकियां, ड्रेस सेंस, राजनीतिक विषयों पर पकड़ बनाना सीखा। उपेन्द्र कुशवाहा पर नीतीश का बड़ा प्रभाव रहा और उन्हीं के कहने पर उन्होंने अपने नाम में बदलाव भी किया। उपेन्द्र पहले अपने नाम में ‘सिंह’ लगाते थे लेकिन नीतीश कुमार के कहने पर उन्होने ‘कुशवाहा’ लगाना शुरू किया। इसके पीछे मकसद यही था कि अपनी जातीय पहचान दिखाकर एक खास वर्ग के लोगों के बीच राजनीतिक पकड़ मजबूत की जाए। बिहार में कुशवाहा अथवा कोइरी जाति कुल आबादी का 7% है और बिहार की जातिगत राजनीति में उनका वोट हर राजनीतिक पार्टी के लिए अहम होता है।

उपेन्द्र कुशवाहा ने साल 2000 में जन्दाहा से पहली बार चुनाव लड़ा और जीता। इसके बाद वो नीतीश कुमार के बेहद करीब आते गए। साल 2004 में जब बिहार में जदयू और समता पार्टी ने मिलकर सबसे बड़ी अपोजिशन पार्टी बनाई तो नीतीश ने उपेन्द्र कुशवाहा को विपक्ष का नेता बना दिया। लेकिन उपेन्द्र कुशवाहा की महत्वाकांक्षाओं ने उन्हें नीतीश कुमार से दूर कर दिया। साल 2007 में वो जदयू से अलग हो गए। 2009 में उन्होंने समता पार्टी बनाई और लोकसभा चुनाव लड़ा। पार्टी जब बुरी तरह हार गई तो वो दोबारा नीतीश कुमार से मिल गए और नीतीश कुमार ने उन्हें राज्य सभा का सांसद पद दिलवाया लेकिन फिर दोनों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर मतभेद शुरू हो गए।

 

2013 में उपेन्द्र कुशवाहा ने जदयू का दामन छोड़ दिया और राज्यसभा से भी इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी नाम से एक नई पार्टी बनाई। 2014 के लोक सभा चुनावों में एनडीए में शामिल होने के बाद उनकी पार्टी ने 3 सीटों पर चुनाव लड़ा और सभी 3 सीटों पर जीत हासिल की। उपेन्द्र कुशवाहा करकट से चुने गए और उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रालय का पदभार सौंपा गया।

2019 के लोक सभा चुनावों में सीटों के बंटवारे को लेकर वो एनडीए से अलग हो गए। इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में उपेन्द्र कुशवाहा ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं जिसमें आरएलएसपी, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM और दो छोटी पार्टियां शामिल हैं।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 सुबह जल्दी जगने में होती है परेशानी? इन 5 तरीकों से करें बॉडी क्लॉक में सुधार
2 3 साल तक किया पीछा, शादी के ख़िलाफ़ था सिख परिवार; पप्पू यादव ने बताया किन मुश्किलों के बाद हुई शादी
3 बादाम से लेकर शहद तक; इन घरेलू उपायों से बनाएं बालों को मजबूत
यह पढ़ा क्या?
X