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समाज पुराना अनाज पुराना

अनाज को मुनाफे की पैदावार बनाने की होड़ ने विकास के दावों के आगे तो जरूर कई शून्य जोड़ दिए पर इस कारण दुनियाभर में लोगों को सेहत के बड़े नुकसान से भी जूझना पड़ा है। गनीमत है कि अब फिर से अनाज के मोटे और खुरदरे दानों का चलन लौट रहा है। जैविक उत्पाद की बढ़ी मांग के साथ पूरी दुनिया में अनाज और रिवाज की नई समझ भी बन रही है।

सांकेतिक फोटो।

क्षिप्रा माथुर

उगते और ढलते सूरज के साथ अपने जीवन की लय तय करने वाले समाज ने खानपान का कायदा जब तक बनाए रखा, तब तक जीवन की आपाधापी में अपने पांव कभी नहीं डगमगाए। शुक्र इस बात का है कि 15 जलवायु इलाकों में बंटे भारत में हरित क्रांति में एकरंग हुई खेती और तहस-नहस हुई विविधता के बावजूद देशज अन्न उपजाने की परंपराएं कायम हैं। जो कुछ पीछे छूटा उसकी तह में वो इतिहास है जिसकी बुवाई हमने बेहद बेशर्मी से बेधड़क की है। उसकानतीजा यह है कि हमारी मिट्टी, हवा, बीज सबमें घुले जहर की भारी कीमत हम आज चुका रहे हैं।

मौसम, रोग और सूखे-बाढ़ से बर्बाद होती फसलों ने पचास के दशक में ही मुल्क में अपने बूते खड़े होने और भुखमरी की खींचतान के बीच अन्न-क्रांति की भूख जगा दी थी। साठ के दशक तक आते-आते खाने की फिक्र में ठिठके हुए से देश को देशज ज्ञान की जगह अमेरिका की अर्थ संपदा से मेक्सिकों के खेतों में हो रहे मशीनी प्रयोगों से वक्तसे पहले और ज्यादा उपजी फसलें लुभा रही थीं। इन प्रयोगों के लिए डॉ नार्मन बोरलॉग को नोबेल पुरस्कार देकर दुनिया के उन देशों का बाजार तैयार करने की तैयारी पूरी हो गई, जहां बाहर की दुनिया के बीजों को पराई कोख में पनपाने की जादूगरी दिखानी थी।

हरित यथार्थ

भारत को अनाज की मदद देने में अमेरिका की आनाकानी और फिर ज्यादा उपज पैदा करने वाले बीज और तकनीक की मनमानी ने हमारी खुरदरी जमीन को समतल करना शुरू कर दिया। हरित क्रांति के परचम के नीचे पंजाब और हरियाणा के खेत लहलहाते नजर आने लगे। गेहूं और चावल की फसलें सरकार की भरपूर मदद से लगाई जाने लगीं, खरीदी जाने लगीं। धीरे-धीरे रसायन के छिड़काव के बगैर पकने में नाकाम और बेहिसाब पानी की मांग वाली ये फसलें ही बाजार पर राज करने लगीं। मगर उस वक्त दूरगामी नतीजों से बेखबर देश को ये अंदाज नहीं रहा कि कुदरत के तरीकों से टकराना टिकाव का नहीं बिखराव का रास्ता है।

सभ्यता की थाली

अपनी पूरी खासियत के साथ फलती-फूलती रही सनातन सभ्यता में रखवाली और जुताई उसी खानपान की होती रही, जो वहां के मौसम और मिजाज के माफिक हो। कहीं बाजरा, कहीं मक्का, कहीं जौ, कहीं कोदो-कुटकी, कहीं रागी सहित कई फसलें, जिन्हें बचाकर रखा तो उस वनवासी और आदिवासी समाज ने जिसे अपनी जड़ों से टूटना हमेशा नागवार गुजरा। उसने आधुनिक और यांत्रिक जीवन से दूरी बनाकर विकास के नए पैमानों पर पिछड़ने का मलाल नहीं रखा। जल-जंगल-जमीन-जानवर की रखवाली में हाशिए पर धकेले गए और परंपरागत खेती और बीजों की रखवाली वाले खेतिहर समाज के पास आज धरती के साथ तालमेल वाले खाद्यान्न का इतना लेखा-जोखा है कि शहरों की प्रयोगशालाओं में आज इनकी पैकेजिंग की जा रही है।

दरकार और अनाज

घर-घर सहज मुहैया होने वाला मोटा अनाज अब दुनिया की निगाह में है और भारत में भीतर-भीतर खानपान की नई धारा पनपने लगी है, जिसकी अगुवाई नए दौर के नागरिक कर रहे हैं। अब रसोई में दाखिल होने से पहले अनाज और खाने को कैलोरी, प्रोटीन, विटामिन, शर्करा, कार्बाेहाइड्रेट सहित उसकी गुणवत्ता की बारीक लिखाई को पढ़ा जा रहा है तो इसे जागरूकता का पहला पायदान मानकर आगे बढ़ाने की भरपूर कोशिश होनी चाहिए। इसके मायने ये भी हैं कि जिस जैविक और पोषण वाले खानपान की खूबियां हम पुरखों से सुनते आए हैं उसकी अहमियत आधुनिक विज्ञान ने बढ़ा दी है। सोशल मीडिया पर बाजरे और दूसरे मोटे अनाज से बनी तमाम तरह के खानपान अभिजात्य दुनिया के रंग-ढंग को रास आने लगे हैं। इसके साथ ही देसी खानपान की खूबी और रेसिपी सिखाते यूट्यूब चैनलों ने भी शोहरत में नफासत वाली रसोइयों को पीछे छोड़ दिया हैैै।

हाल ही का ये दिलासा कि सदी के सबसे मुश्किल दौर में भी खेती ने बढ़त लेकर हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ को मजबूत रखा है। लिहाजा संघर्ष और जोर अब इस बात के लिए है कि किसान अपनी देसी उपज को तमाम मानकों को पार कर पैकेज करने का हुनर खुद सीख जाएं। नहीं तो उपजाने और सहेजने वाला पिछड़ा रहेगा और बाजार में बैठे बिचौलिया हमेशा मुनाफे में। किसान उत्पाद से जुड़ीं संस्थाएं यानी एफपीओ भी इस मुहिम में कारगर हो सकती हैं, बशर्ते वो जमीनी स्तर पर कुछ ठोस कर पाएं। ऐसे तमाम संगठन और संस्थाएं भी गांव-गांव में पोषण की पहरेदारी कर सकती हैं जो ताकत वाली उपज में अपनी खास पहचान कायम कर लें। देश के कई हिस्सों में गैरसरकारी संगठन देसी उपज के हाट-बाजार सजाने लगे हैं, फूड पंचायतें हो रही हैं, देसी खानपान के उत्सव और प्रदर्शनियां भी लग रही हैं। जाहिर है कि ये रुझान आगे और बढ़ेगा और कारगर भी रहेगा।

खुरदरे दौर की वापसी

हमारे बर्ताव में बसा खुरदरापन तो हमें जरूर अखरना चाहिए लेकिन मोटे दाने और अनाज की बाहरी सूरत भले रूखी नजर आए, उसके भीतर समाई ताकत को अब हमें घर-घर का दस्तूर बनाना होगा। मोटा अनाज जिसे देहात के समाज ने अपने चूल्हों पर और स्वाद पर चढ़ा कर रखा है, इसकी जितनी खासियत बरकरार रख पाएं उतना ही ये हमारी सेहत के पक्ष में जाएगा। खुरदरा अनाज, जो धरती की कोख में खुद ब खुद उपजता है। उसकी तासीर में जीवन के लय में रहने की सारे नुस्खे समाए हैं और यही मौजूदा दौर की नई इबारत है। ल्ल

गेहूं के खिलाफ गुस्सा

‘व्हीट बैली’ किताब लिखने वाले दिल के अमेरिकी डॉक्टर विलियम डेविस कहते हैं कि दुनियाभर में मोटापे की महामारी के लिए हमारे खानपान पर कब्जा जमा चुका गेहूं जिम्मेदार है। हालांकि दुनिया के कई वैज्ञानिकों ने इस दलील को खारिज भी किया है। दूसरी तरफ दिल की बीमारियों और मधुमेह के लिए गेहूं को वजह बताने वाले कई अध्ययन भी आ चुके हैं। हरित क्रांति की धुन में इसके जीनोम में दाखिल जरूरत से ज्यादा ग्लूटन प्रोटीन से आंतों को हो रहे नुकसान की वजह से गेहूं के खिलाफ अब बगावती सुर सुनाई देने लगे हैं।

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