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Hindi Diwas 2018 Speech: हिंदी दिवस देने जा रहे भाषण, यूं बनिए प्रभावशाली वक्ता

Hindi Diwas 2018 Speech, Bhasan, Poem, Kavita, Slogans, Quotes in Hindi: भारत के संविधान का अनुच्छेद 343 हिंदी को राजभाषा घोषित करता है। 14 सितंबर 1949 को हिंदी को संविधान में आधिकारिक राजभाषा के तौर पर मंजूर कर लिया गया था।

Hindi Diwas Speech: इस चित्र का प्रयोग प्रतीक के तौर पर किया गया है।

Hindi Diwas 2018 Speech, Bhasan, Poem, Kavita, Slogans, Quotes in Hindi: प्रभावशाली भाषण देना भी एक कला है, जिसके लिए अभ्‍यास और कौशल की जरूरत पड़ती है। साथ ही कुछ अन्‍य पहलुओं का भी खयाल रखना होता है, ताकि हिंदी भाषा में अपनी बात रखते वक्‍त आप प्रभाव छोड़ सकें। हिन्दी दिवस पर धार और रफ्तार से भरे एक भाषण को देने के लिए आपको कुछ अभ्यास की जरूरत होगी। कुछ शब्द तलाशिए और कुछ शिल्पकारी करिए। फिर जो लेख तैयार होगा वो धारदार होगा। भारत के संविधान का अनुच्छेद 343 हिंदी को राजभाषा घोषित करता है। 14 सितंबर 1949 को हिंदी को संविधान में आधिकारिक राजभाषा के तौर पर मंजूर कर लिया गया था। इसीलिए 14 सितंबर को हर साल हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन हिंदी का इस्तेमाल बढ़ाने को लेकर जनजागरूकता के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थानों में भी 15 दिनों के हिंदी पखवाड़े का आयोजन किया जाता है। इसमें भाषण, निबंध तथा कविता प्रतियोगिता जैसे कार्यक्रम सम्मिलित होते हैं। अगर आपने भी इस हिंदी दिवस पर भाषण प्रतियोगिता में हिस्सा लिया है तो आज हम आपके लिए एक छोटा सा लेकिन प्रभावी भाषण लेकर आए हैं। हिंदी दिवस पर भाषण तैयार करने में यह आपकी काफी मदद करेगा। साथ ही हर तरफ आपकी चर्चा भी होगी। अच्‍छे भाषण के जरिये आप दोस्‍तों के साथ अध्‍यापकों, सहयोगियों और अन्‍य लोगों भी प्रभावित कर सकते हैं। हिंदी भाषा के ज्ञान और शब्‍दों के चयन के बिना भाषण को प्रभावी नहीं बनाया जा सकता है।

हिंदी दिवस पर भाषण – आज 14 सितंबर है। भारत में 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिंदी भारत की राजभाषा है और इसी दिन इसे आधिकारिक रूप से भारत की राजभाषा घोषित किया गया था। इसलिए हर साल इस दिन देश भर में हिंदी के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। 200 सालों की गुलामी से आजादी पाने के बाद जब देश के संविधान निर्माताओं के सामने समूचे देश की संपर्क भाषा का सवाल आया तो उन्हें हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा लगी जो सारे देश को एक सूत्र में जोड़ सकती है। उनका मानना था कि हिंदी में ही वो ताकत है जिसकी मदद से जम्मू कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक संवाद स्थापित किया जा सकता है। इसीलिए, देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी देश की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित की गई।

हिंदी को समूचे देश की राजभाषा के रूप में मान्यता दिला पाना इतना आसान नहीं था। बहुत से लोगों ने इसका विरोध किया। खासकर, दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के लोगों को हिंदी अपनी भाषा नहीं लगी। हालांकि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिन्दी पूरे देश में विरोध का स्वर बनी।  इसलिए, संविधान लेखकों नें हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी को भी राजभाषा के रूप में संविधान में शामिल कर लिया। अंग्रेजी को राजभाषा के रूप में इस्तेमाल किए जाने की अवधि निर्धारित की गई और कहा गया कि 15 साल बाद हिंदी पूरी तरह से अंग्रेजी की जगह ले लेगी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के साथ-साथ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी यह मंजूर नहीं था कि जिन अंग्रेजों ने हमें 200 सालों तक गुलाम बनाए रखा उनकी भाषा हमारे देश की आधिकारिक भाषा ज्यादा वक्त तक रहे। लेकिन आजादी के 15 साल बाद जब हिंदी को पूर्णतः राजभाषा के रूप में स्थापित करने का वक्त आया तब हिंदी के खिलाफ उसकी बहनों ने ही बगावत कर दिया। उन्होंने एक परायी भाषा “अंग्रेजी” के पक्ष में खड़ा होकर अपनी सहोदर भाषा का विरोध किया। जबकि उनका भय पूरी तरह निराधार था। हिन्दी किसी भी दूसरी भाषा की कीमत पर राष्ट्रभाषा नहीं बनना चाहती। देश की सभी राज्य सरकारें अपनी-अपनी राजभाषाओं में काम करने के लिए स्वतंत्र थीं। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का विचार परस्पर सह-अस्तित्व पर आधारित था, न कि एक भाषा की दूसरी भाषा की अधीनता पर।

देशव्यापकता के लिहाज से हिंदी के अलावा कोई भी देसी भाषा राष्ट्रभाषा बनने की स्थिति में नहीं है। हिंदी में भी थोड़ी बहुत कमियां हैं। इन कमियों को दूर किए बिना हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने में अड़चनें आ सकती हैं। अंग्रेजी, चीनी, अरबी, स्पैनिश, फ्रेंच इत्यादि के साथ ही हिन्दी दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में एक है। लेकिन इसकी तुलना अगर अन्य भाषाओं से करें तो ये कई मामलों में पिछड़ी नजर आती है और इसके लिए जिम्मेदार है कुछ हिन्दी प्रेमियों का संकीर्ण नजरिया। हिन्दी के विकास में सबसे बड़ी बाधा वो शुद्धतावादी हैं जो इसमें से फारसी, अरबी, तुर्की और अंग्रेजी इत्यादि भाषाओं से आए शब्दों को निकाल देना चाहते हैं। ऐसे लोग संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दों के बोझ तले कराहती हिन्दी को “सच्ची हिन्दी” मानते हैं। लेकिन यहाँ मशहूर भाषाविद प्रोफेसर गणेश देवी को याद करने की जरूरत है जो कहते हैं भाषा जितनी भ्रष्ट होती है उतनी विकसित होती है।

कोई भी भाषा केवल अनुपम साहित्य होने की दलील देकर राष्ट्रभाषा नहीं बन सकती। इसे रोजगार, ज्ञान-विज्ञान और संचार की भाषा भी बननी होगी। यही हिंदी की दूसरी सबसे बड़ी दिक्कत है जो इसके राष्ट्रभाषा बनने में बाधक है। इसके लिए हिंदी को अपने शुद्धतावादी चरित्र से बाहर आना होगा। इसे विज्ञान की भाषा बनना होगा। व्यापार की भाषा बनना होगा। इसके विकास के लिए यह अपरिहार्य जरूरतें हैं। गैर-साहित्यिक क्षेत्रों में हिन्दी में उच्च गुणवत्ता के चिंतन और पठन सामग्री के अभाव से हिन्दी बौद्धिक रूप से विकलांग प्रतीत होती है। आज जरूरत है कि विज्ञान और समाज विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में हिन्दुस्तानी को बढ़ावा दिया जाए। तभी सही मायनो में हिन्दी देश की राष्ट्रभाषा बन सकेगी। अगर इन दो बातों पर पर्याप्त ध्यान दिया जाए तो हिन्दी को वैश्विक स्तर पर पहचान और प्रतिष्ठा पाने से कोई नहीं रोक सकेगा। हिंदी दिवस ऐसे ही संकल्पों का दिवस है, जिस दिन हमें हिंदी के कमजोर पक्षों की समीक्षा कर उसे सुधारने की कवायद करनी चाहिए। हिंदी के प्रति संकीर्ण नजरिये को बदलने के लिए जनजागरूकता अभियान को गति देनी चाहिए। जन-जन तक हिंदी को पहुंचाने के लिए उसे जितना हो सके उतना सरल बनाकर उसके प्रचार-प्रसार की दिशा में कोशिश करनी चाहिए। भाषाएं और माताएं अपने पुत्रों से ही नाम पाती हैं। ऐसे में हिंदी के पुत्र होने के नाते हमारा दायित्व है कि भारत देश की राष्ट्रभाषा के तौर पर उसे प्रतिष्ठित करने की दिशा में हम अपना योगदान दें।

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