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Happy Teacher’s Day 2020: डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर ही क्यों मनाते हैं शिक्षक दिवस? जानिए रोचक बातें

Happy Teacher's Day 2020: 40 वर्षों तक शिक्षक के रूप में विभिन्न पदों पर रहे डॉ. राधाकृष्णन कई विषयों के विद्वान थे। जब उनके सहयोगियों और शिष्यों नें उनसे उनका जन्मदिवस मनाने के बारे में पूछा तो उन्होंने इच्छा जाहिर की कि “मेरे जन्मदिन को मनाने की जगह यदि इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए, तो मुझे ज्यादा खुशी होगी।"

Teacher’s Day 2020: देश के पूर्व राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन की जयंती पर शिक्षक दिवस का आयोजन होता है।

Happy Teacher’s Day 2020: हर व्यक्ति को शिक्षक की जरूरत होती है और जिंदगी को सफल बनाने और दिशा देने में एक शिक्षक का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है। भारत में प्राचीन काल से ही गुरुकुल परंपरा रही है। हमारे यहां गुरु को माता-पिता से भी ऊपर रखा जाता है। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए हम अपने शिक्षकों को सम्मानित करने और आभार व्यक्त करने के लिए 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाते हैं।

5 सितम्बर को ही क्यों मनाते हैं शिक्षक दिवस?: देश के पहले उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन के अवसर पर हल साल शिक्षक दिवस मनाया जाता है। 40 वर्षों तक शिक्षक के रूप में विभिन्न पदों पर रहे डॉ. राधाकृष्णन कई विषयों के विद्वान थे। जब उनके सहयोगियों और शिष्यों नें उनसे उनका जन्मदिवस मनाने के बारे में पूछा तो उन्होंने इच्छा जाहिर की कि “मेरे जन्मदिन को मनाने की जगह यदि इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए, तो मुझे ज्यादा खुशी होगी।” इसके बाद से राधाकृष्णन का जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। देश में 5 सितम्बर के दिन शिक्षक दिवस मनाने की शुरूआत 1962 में हुई थी। इस वर्ष देश में 58वां शिक्षक दिवस मनाया जाएगा।

कौन थे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन?: भारत के दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुतनी गांव के एक गरीब परिवार में हुआ था। वे बड़े विद्वान, शिक्षक, राजनयिक के साथ ही भारतीय संस्कृति के संवाहक और एक महान दार्शनिक और प्रख्यात शिक्षाविद थे। बचपन में इनकी शिक्षा तिरूवल्लुर के गौड़ी स्कूल और तिरुपति मिशन स्कूल में हुई थी। इसके बाद मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से 1916 में उन्होंने दर्शन शास्त्र में एम.ए. किया और मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में इसी विषय के सहायक प्राध्यापक का पद संभाला।

वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भी प्राध्यापक रहे। साथ ही कोलकाता विश्वविद्यालय (जार्ज पंचम कॉलेज) में प्रोफेसर के रूप में काम किया। साथ ही वे आंध्र प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। भारत की स्वतंत्रता के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनसे राजदूत के रूप में सोवियत संघ में राजनयिक कार्यों की जिम्मेदारी निर्वहन करने का आग्रह किया। वे 1952 तक इस पद पर रहे और उसके बाद उन्हें उप-राष्ट्रपति नियुक्त किया गया। फिर साल 1962 में उन्हें भारत का दूसरा राष्ट्रपति बनाया गया। वे भारत रत्न पाने वाले पहले भारतीय बने। 17 अप्रैल 1975 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया था।

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