Gujiya History: भारत में होली का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्योहार एकता का प्रतीक है। इस दौरान लोग अपने गिले शिकवे दूर कर एक दूसरे को रंग लगाते हैं। होली का इतिहास काफी पुराना है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि इस रंगों के त्योहार की शुरुआत मथुरा के बरसाना में भगवान कृष्ण और राधा के प्रेमपूर्ण रंग खेलने से हुई। दुनियाभर में मथुरा की होली काफी प्रसिद्ध है। मथुरा की लठमार, फूलों से लेकर रंग की होली दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करती है। होली के समय फिजाओं में न सिर्फ रंगों की महक घुलती है बल्कि कई खास व्यंजन अपनी मिठास से प्रेम की मधुरता को घोलते हैं। इन्हीं में से एक गुझिया भी है। यह भी कह सकते हैं कि होली का पर्व गुझिया के बिना अधूरा है।

होली के मौके पर जब लोग शाम को एक दूसरे के घर मिलने के लिए जाते हैं तो उस दौरान खाने के लिए गुझिया भी जरूर दिया जाता है। उत्तर भारत में बिना गुझिया के लोग होली की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। अगर घर में नहीं बना पाए तो बाजार से गुझिया ले जाते हैं। आइए जानते हैं आज मशहूर भारतीय व्यंजनों में अपनी अलग पहचान बनाने वाली गुझिया की भारत में शुरुआत कैसे हुई और सबसे पहली पर कहां बनी थी।

ब्रज में गुझिया का खास महत्व
भगवान श्रीकृष्ण की भूमि ब्रज में गुझिया का बेहद ही खास महत्व है। खासकर 1500 के दशक में गुझिया ने मथुरा और वृंदावन के आसपास के इलाके में विशेष पहचान बना ली। यहां गुझिया में इलायची मिलाकर भगवान श्रीकृष्ण को प्रसाद के रूप में अर्पित किया जाने लगा। पिछले करीब 500 वर्षों से गुझिया और चंद्रकला मिठाई का वृंदावन के राधा रमण मंदिर में भोग लगाया जाता आ रहा है। कहा जाता है कि सबसे पहले होली के दिन इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण को आटे की लोई में चाशनी भरकर गुझिया का भोग लगाया गया था। इसी के बाद से होली के मौके पर गुझिया के बनाने का चलन शुरू हुआ।

गुझिया का तुर्की कनेक्शन
कई इतिहासकार गुझिया का एक कनेक्शन तुर्की से भी मानते हैं। दरअसल, मुगल जब भारत आए तो वह अपने साथ कई व्यंजन भी ले जाए। आज कई ऐसे फूड्स हैं जो मुगलों की देन हैं। इतिहासकारों की मानें तो गुझिया की बनावट काफी हद तक तुर्की की प्रसिद्ध मिठाई बकलावा से मिलती-जुलती है। दरअसल, समरकंद से जब मुगल भारत आए तो वहां की चीजें भी वह अपने साथ ले आएं। मुगलों की रसोई से निकली मिडिल ईस्ट के व्यंजनों का स्वाद धीरे-धीरे भारतीयों को जुबान पर चढ़ने लगा। इतिहासकारों का मानना है कि गुझिया के साथ भी ऐसा ही हुआ। धीरे-धीरे तुर्की का ‘बकलावा’ भारतीय घरों में गुझिया का रूप लेने लगा।

कैसे बनती है तुर्की की बकलावा
तुर्की की मशहूर मिठाइयों में से एक बकलावा है जो वहां के किसी भी पेस्ट्री की दुकान पर आसानी से मिल जाएगी। बकलावा में मैदे की कई परतें होती हैं और बीच में ड्राई फ्रूट्स, चीनी और शहद की फिलिंग भरकर बनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि शुरुआत में यह तुर्की के सिर्फ शाही परिवारों में बनाया जाता था। भारत की बात करें तो देश में गुझिया अधिकतर मैदा, खोया, सूजी, ड्राई फ्रूट्स और अन्य कई चीजों को भरकर बनाई जाती है।
धूप में सुखाकर बनाने की कहानी
वहीं, कई इतिहासकार बताते हैं कि इसका सबसे पहले जिक्र 13वीं शताब्दी में मिलती है। उस दौरान गुझियाको गेहूं के आटे से बनाया जाता है। इसके अंदर गुड़ और शहद का मिश्रण होता है। उस समय गुझिया छानने के बजाय लोग धूप में पहले सुखकर और फिर खाते थे।

प्राचीन भारत की मिठाई
वहीं, कुछ विद्वानों का मानना है कि गुझिया की जड़ें प्राचीन भारत से जुड़ी हुई हैं। इसका संस्कृत ग्रंथों में ‘करणिका’ नाम की एक मिठाई का उल्लेख मिलता है, जिसमें सूखे मेवे भरे जाते है और मीठा करने के लिए शहद का इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद समय और जगह के अनुसार इसमें कई प्रयोग किए गे।
बुंदेलखंड से गुझिया को मिली असली पहचान
गुझिया को लेकर यह भी कहा जाता है कि इसकी उत्पत्ति 16-17 वीं सदी के बीच में उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में हुई थी। इसका स्वाद जब लोगों की जुबान पर चढ़ा तो यह धीरे-धीरे राजस्थान, बिहार और मध्य प्रदेश होते हुए पूरे देश में प्रसिद्ध हो गई। उस दौरान गुझिया को मैदे और खोए से बनाया गया।
कई नामों से जानी जाती है गुझिया
तुर्की की बकलावा तो यूपी-दिल्ली में मशहूर गुझिया को कई और नामों से जाना जाता है। महाराष्ट्र में इसे करंजी कहते हैं तो गुजारी घरों में इसे घुघरा नाम मिला। बिहार में कई जगहों पर इसे पेड़किया कहते हैं। हालांकि, सबसे प्रसिद्ध इसका नाम गुझिया ही है।

गुझिया चाहे तुर्की से आई हो या फिर बुंदेलखंड की धरती पर पहली बार बनीं हो। लेकिन वर्तमान समय में ये होली के मौके पर लोगों के बीच प्रेम का मिठास घोलती है। होली के त्योहार के मौके पर गुझिया ने अपनी ऐसी जगह बनाई है कि आज बिना इसके रंगों का त्योहार अधूरा सा लगता है।
डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित है। इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है।
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