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Engineers Day 2019: नाबालिग उम्र में शादी और 18 की उम्र में विधवा, संघर्ष भरी है भारत की पहली महिला इंजीनियर की कहानी

Engineers Day 2019: देश की पहली महिला इंजीनियर थीं तमिलनाड़ु की रहने वाली ललिता। जो कि एक मिडिल क्लास फैमिली से ताल्लुक रखती थीं। वह उस दौर में इंजीनियर बनीं थी जब महिलाओं को सिर्फ बेसिक शिक्षा दी जाती थी लेकिन ललिता ने कठिन मेहनत की और अपने मुकाम को हासिल किया। आइए जानते हैं ललिता से संघर्ष की कहानी।

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Engineers Day 2019, Quotes, Wishes, SMS, True Story: भारत में हर साल 15 सितंबर को इंजीनियर्स डे मनाया जाता है। इसी दिन भारत के महान अभियन्ता एवं भारतरत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्मदिन है। एम विश्वेश्वरैया भारत के महान इंजीनियरों में से एक थे, जिन्होंने आधुनिक भारत की रचना की और तकनीकी को नया रूप दिया था। उन्होंने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अपना असाधारण योगदान दिया। इसीलिए उनके जन्मदिवस के दिन इंजीनियर्स डे  मनाया जाता है। बहरहाल, यहां हम आपको भारत की पहली महिला इंजीनियर से रू-ब-रू करा रहे हैं। देश की पहली महिला इंजीनियर थीं तमिलनाडु की रहने वाली ललिता। जो कि एक मिडिल क्लास फैमिली से ताल्लुक रखती थीं। वह उस दौर में इंजीनियर बनीं थी जब महिलाओं को सिर्फ बेसिक शिक्षा दी जाती थी लेकिन ललिता ने कठिन मेहनत की और अपने मुकाम को हासिल किया। आइए जानते हैं ललिता के संघर्ष की कहानी।

समाज से अलग रहकर की बेटी की देखभाल और संजोए सपने (Engineers Day 2019 Inspirational Story, Quotes)

ललिता अपने सात भाई-बहनों में पांचवीं संतान थीं। जब 15 साल की थीं तब उन्हें सात फेरों के बंधन में बांध दिया गया था और 18 साल की उम्र में वह एक बेटी श्यामला चेनुलु की मां बन चुकी थीं। बेटी के जन्म के 4 माह बाद ही ललिता के पति दुनिया छोड़ गए थे। ऐसे में एक विधवा मां पर ही अपने नन्ही बेटी के लालन-पालन की पूरी जिम्मेदारी थी। ललिता के दौर में भी विधवाओं को समाज से अलग रहकर कठिनाइयों भरा जीवन जीना पड़ता था, लेकिन वह अपने इन्हीं संघर्षों की वजह से लक्ष्य की ओर अग्रसर हुई थीं। बेटी की देखभाल के साथ-साथ ललिता ने आगे अध्ययन करने की ठानी और इंजीनियर बनने के सपने संजोए। उस वक्त पेरेंट्स अपने बेटों को इंजीनियर बनाने का ख्वाब देखते थे और लड़कियों को 8वीं और 10वीं की बेसिक शिक्षा तक सीमित रखते थे।

सास ने भी किया कम उम्र की विधवा को परेशान

27 अगस्त 1919 में जन्मीं ललिता के लक्ष्म में न ही एक विधवा की इमेज और न ही उनकी नन्ही बेटी आड़े आई। ललिता की बेटी श्यामला ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि वह अपने मां के संघर्ष की कहानी को हमेशा याद करती हैं जो भारत की करोड़ों महिलाओं की प्रेरणा बनीं थीं। श्यामला का कहना है कि उनकी मां के साथ उनकी सास का भी काफी बुरा बर्ताव था, जो अपने 16वें बच्ची की मौत का गुस्सा एक कम उम्र की विधवा पर निकालती थीं। ललिता ने जब इंजीनियर बनने का सपना देखा था तब महिलाओं के बीच मेडिकल की पढ़ाई का क्रेज ज्यादा था। इस प्रोफेशन में 24 घंटे आपको प्रजेंट रहना अनिवार्य है लिहाजा ललिता ऐसी जॉब नहीं कर सकती थीं क्योंकि उन्हें अपनी बेटी की देखभाल भी करनी पड़ती थी। इसीलिए वह 9 से 5 वाली जॉब करना चाहती थी ताकि अपनी बेटी का लालन-पालन कर सकें।

कॉलेज में एकलौती युवती थीं ललिता

ललिता के इंजीनियर बनने में उनके पिता पप्पू सुब्बा राव ने उनका पूरा सहयोग किया। पिता राव ने जेलेकट्रोमोनियम (एक तरह का विद्युत संगीत वाद्ययंत्र) और इलेक्ट्रिक फ्लेम प्रोड्यूसर व धुआं रहित चूल्हे का आविष्कार किया था। ललिता ने पिता को भी उनके काम में सहयोग किया था। पिता की वर्कशॉप में 9 माह काम करने के बाद ही ललिता आगे बढ़ने के अन्य रास्ते तलाशने लगी थीं और बाद में कोलकाता के एसोसिएटेड इलेक्ट्रिकल इंडस्ट्रीज में काम करने लगीं। बेटी के कहने पर उन्होंने 1943 में मद्रास विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग कॉलेज के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में दाखिला कराया। कॉलेज के प्रिंसपल केसी चाको ने ललिता का पूरा साथ दिया। चूंकि ललिता कॉलेज में एकलौती लड़की थीं इसलिए उनके लिए अलग से हॉस्टल की व्यवस्था की गई। लक्ष्य को हासिल करने के लिए ललिता ने बेटी को अंकल के पास रखा और सप्ताह में वह श्यामला से मिलने जाती थीं।

1964 में बनी थीं पहली भारतीय महिला इंजीनियर
हॉस्टल में ललिता को सभी लड़के काफी सहयोग करते थे। उन्हें किसी बात की कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन फिर भी एक दिन उन्होंने हॉस्टल के प्रवंधन से शिकायत की कि अब उन्हें बोरियत सी होती है। तब उनके पिता ने दो अन्य गर्ल्स को कॉलेज में एडमिशन लेने के लिए प्रेरित किया। 1944 में सेकेंड वर्ल्ड वार चरम पर था इसीलिए सभी इंजीनियर्स स्टूडेंट्स को कुछ माह पहले ही अपने कोर्स को पूरा करने का संकल्प लिया। ग्रेजुएशन के बाद ललिलात ने कुछ वक्त तक शिमला के सेंट्रल स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइजेशन में काम किया। उन्होंने कुछ वक्त तक पिता के साथ चेन्नई में भी काम किया था। साल 1964 में ललिता को न्यूयॉर्क में आयोजित ICWES (The International Conference of Women Engineers and Scientists) कार्यक्रम में इनवाइट किया गया। तभी ललिता को अपने प्रोफेशन का पहली बार पता चला और वह देश की पहली महिला इंजीनियर बनीं।

धैर्य और बोलने की बजाए करने में विश्वास करती थीं ललिता
ललिता की बेटी श्यामला का कहना है कि उनकी मां ने अपने हर कर्तव्य का पालन पूरी ईमानदारी से किया। उन्होंने बजाए दूसरी शादी करने के अपने लक्ष्य को चुना और महिलाओं के लिए एक नई दिशा बनीं। अपने पूरे करिअर में ललिला ने धैर्य और बोलने की बजाए करने पर ज्यादा जोर दिया।

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