टीनएज में शरीर और चेहरे में तेजी से बदलाव आते हैं। यह वो समय होता है जब कई बच्चों को अपने रंग-रूप, शरीर या चेहरे में कमियां नजर आने लगती हैं। उन्हें लग सकता है कि बाकी लोग उनसे ज्यादा अच्छे दिखते हैं।

फिल्ममेकर फराह खान ने भी हाल ही में अपनी बेटियों को लेकर ऐसी ही बात साझा की। उनकी बात के बाद यह समझना जरूरी है कि आम परिवार के बच्चों के साथ-साथ सेलिब्रिटी के बच्चे भी इस तरह की परेशानी से दो-चार होते हैं। लेकिन यह समझना जरूरी है कि आखिर इस उम्र में बच्चे अपने रूप-रंग को लेकर इतने परेशान क्यों होने लगते हैं और माता-पिता उन्हें कैसे संभाल सकते हैं।

फराह खान ने बेटियों को लेकर क्या कहा?

फराह खान ने यह बात लॉक अप 2 की प्रतियोगी आकांक्षा चौधरी से बातचीत के दौरान कही। आकांक्षा ने बताया कि किशोर उम्र में वो खुद को दुनिया की सबसे बदसूरत लड़की मानती थीं। इस पर फराह खान ने अपने बच्चों का जिक्र करते हुए कहा, “फिर मेरी बेटियों से मिलिए! उन्हें भी लगता है कि वे बहुत बदसूरत हैं।”

आकांक्षा फराह की बेटियों से मिल चुकी हैं और उन्होंने उन्हें बहुत प्यारा बताया। उन्होंने यह भी बताया कि समय के साथ उनका खुद पर भरोसा बढ़ा और अब वह बिना मेकअप के भी सहज महसूस करती हैं। फराह ने भी बिना श्रृंगार के उनके रूप की तारीफ की थी।

किशोर उम्र में खुद को लेकर ऐसी सोच क्यों आती है?

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान मनोचिकित्सक सोनल खंगारोट के मुताबिक, किशोर उम्र में शरीर तेजी से बदलता है। चेहरे, वजन, लंबाई और शरीर के आकार में बदलाव आने लगते हैं। कई बार बच्चों को अपना बदला हुआ शरीर ही अजीब या असहज लगने लगता है।

वह बताती हैं कि इस उम्र में बच्चे इस बात को लेकर भी ज्यादा सजग होने लगते हैं कि दूसरे लोग उन्हें किस तरह देखते हैं। ऐसे में किसी दोस्त की टिप्पणी या किसी की कही छोटी-सी बात भी उनके मन में घर कर सकती है।

दूसरों से तुलना बढ़ा सकती है परेशानी

इस उम्र में बच्चे अपने दोस्तों और आसपास के लोगों से खुद की तुलना करने लगते हैं। सामाजिक माध्यमों पर दिखाई देने वाली तस्वीरें इस तुलना को और बढ़ा सकती हैं। वहां लोग अक्सर अपनी सबसे अच्छी तस्वीरें ही साझा करते हैं। अच्छी रोशनी, मेकअप और तस्वीरों में किए गए बदलावों की वजह से असलियत और तस्वीर में काफी अंतर हो सकता है।

लेकिन बच्चों को सिर्फ वही सजी-संवरी तस्वीर दिखाई देती है। ऐसे में उन्हें लग सकता है कि बाकी सभी लोग उनसे ज्यादा अच्छे दिखते हैं।

सोनल खंगारोट कहती हैं, किसी व्यक्ति को अपना शरीर जैसा दिखाई देता है, जरूरी नहीं कि वह उसकी असली तस्वीर हो। इसे व्यक्ति का खुद पर भरोसा, उसका ध्यान और किसी स्थिति को समझने का तरीका काफी असर डालता है। बच्चों को सामाजिक माध्यमों पर दिखाई देने वाली चीजों को समझना, खूबसूरती से जुड़े अवास्तविक मानकों पर सवाल उठाना, अपने शरीर को उसकी क्षमता के लिए महत्व देना और अपनी पहचान को केवल रूप-रंग तक सीमित न रखना सिखाया जाए, तो उनका अपने प्रति नजरिया काफी बेहतर हो सकता है।”

बच्चा कहे- ‘मैं बदसूरत हूं’, तो क्या करें?

ऐसी बात सुनकर तुरंत ‘नहीं, तुम तो बहुत सुंदर हो’ कहना स्वाभाविक है। लेकिन माता-पिता को पहले बच्चे की भावना समझने की कोशिश करनी चाहिए।

आप कह सकते हैं, ‘मुझे समझ आ रहा है कि तुम्हें अपने रूप-रंग को लेकर अभी बहुत बुरा लग रहा है।’ इसके बाद प्यार से पूछें, ‘ऐसा क्या हुआ कि तुम्हें अपने बारे में ऐसा महसूस होने लगा?’

हो सकता है किसी दोस्त ने कुछ कहा हो या सामाजिक माध्यम पर कुछ देखने के बाद उसके मन में यह बात आई हो। उसकी बात ध्यान से सुनें और तुरंत उसे गलत साबित करने की कोशिश न करें।

बच्चे को सिर्फ खूबसूरती से न आंकें

बच्चे को यह समझाना जरूरी है कि उसकी पहचान सिर्फ चेहरे या शरीर से नहीं है। उसकी पढ़ाई, हुनर, पसंद, व्यवहार और दूसरों के साथ उसका रिश्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

साथ ही बच्चों के सामने खुद या किसी दूसरे के रंग-रूप और शरीर को लेकर नकारात्मक बातें करने से बचें। ऐसे में आपको कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। अगर बच्चा लगातार अपने रूप-रंग को लेकर परेशान रहने लगे, लोगों से मिलना-जुलना कम कर दे, खाने-पीने की आदतों में बदलाव आए या पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो इसे सिर्फ उम्र का असर मानकर नजरअंदाज न करें। ऐसे में बच्चे से खुलकर बात करें और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लें।

अस्वीकरण: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और विशेषज्ञों से हुई बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी देना है। किसी भी समस्या या व्यक्तिगत स्थिति के लिए विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।