दिग्विजय सिंह ने गुजरात के राजघराने में की है बेटी की शादी, घोषणा के बावजूद दामाद को नहीं मिला था कांग्रेस का टिकट

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह के दामाद और संतरामपुर के राजकुमार परंजयादित्य सिंह परमार के नाम की घोषणा हो गई थी, लेकिन पार्टी ने ऐन मौके पर अपना फैसला बदल लिया था।

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कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह (फाइल फोटो)

कांग्रेस के दिग्गज नेता और मध्य प्रदेश के राघौगढ़ राजघराने से ताल्लुक रखने वाले दिग्विजय सिंह अक्सर अपने बयानों के चलते चर्चा में रहते हैं। वह मध्य प्रदेश की राघौगढ़ सीट से लंबे समय तक चुनाव जीतते रहे हैं। यहां के लोग उन्हें ‘राजा साहब’ के नाम से भी पुकारते हैं। दिग्विजय की पहली शादी 11 दिसंबर 1969 को हिमाचल प्रदेश के रहने वाले डॉ. जगदेव सिंह की बेटी आशा कुमारी से हुई थी।

आशा का साल 2013 में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। आशा और दिग्विजय के 4 बच्चे, 3 बेटियां और एक बेटा है। इनमें से एक बेटी का निधन हो चुका है। दिग्विजय ने अपनी एक बेटी मंदाकिनी की शादी गुजरात के संतरामपुर की रॉयल फैमिली में की है। वो कई बार अपने पति और महाराज परंजयादित्य सिंह परमार के साथ राघौगढ़ अपने मायके आती रहती हैं।

ऐन मौके पर कट गया था दामाद टिकट: साल 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने गुजरात की पंचमहल सीट से दिग्विजय के दामाद परंजयादित्य सिंह को टिकट देने का फैसला किया था। इसकी घोषणा भी हो गई थी, लेकिन कांग्रेस प्रत्याशियों की तीसरी सूची जारी किए जाने के कुछ घंटों बाद तत्कालीन पार्टी महासचिव मधुसूदन मिस्त्री ने न्यूज़ एजेंसी ‘पीटीआई’ को बताया था कि उनका टिकट अभी स्थगित रखा गया है। जबकि पहले परमार के नाम पर मुहर लगा दी गई थी।

लाइमलाइट से दूर रहती हैं मंदाकिनी: आमतौर पर मंदाकिनी राजनीति और मीडिया से दूर परिवार के साथ समय बिताना पसंद करती हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने राजपरिवार के शौक और खानपान पर विस्तार से बाचीत की थी। तब उन्होंने बताया था कि राजघरानों में कभी भी पनीर को खास पसंद नहीं किया गया। राजघरानों में मौसम को देखकर खानपान में बदलाव किया जाता है। महल में पनीर की जगह बेसन का इस्तेमाल किया जाता है, चाहे आम कढ़ी बनानी हो या शाही डूंगरी।

दिग्विजय सिंह के बेटे भी सियासत में: दिग्विजय सिंह की ही तरह उनके इकलौते बेटे जयवर्धन सिंह भी राजनीति में हैं। वह राघोगढ़ से विधायक हैं। उनके पिता दिग्विजय भी इसी सीट से साल 1977 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीते थे। कांग्रेस इस सीट पर कभी चुनाव नहीं हारी है। आमतौर पर इस सीट पर दिग्विजय या उनके परिवार के करीबी लोगों का ही कब्जा रहा है। साल 2018 के विधानसभा चुनाव में जयवर्धन ने इस पर ऐतिहासिक जीत हासिल की थी।

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