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नक्सल पीड़ित बस्तर में है भारत का इकलौता ‘संविधान का मंदिर’, यहां पूजन-मंथन करते हैं आदिवासी, जानें क्या है इतिहास

रिपोर्ट्स के मुताबिक यह देश का ऐसा इकलौता गांव है, जहां संविधान का मंदिर है। यहां एक आधारशिला रखी गई थी, जिस पर पांचवीं अनुसूची के प्रावधान लिखे गए हैं। इसकी स्थापना 6 अक्टूबर 1992 को रखी गई थी।

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नक्सल समस्या से जूझने वाले छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में एक ऐसी जगह भी है जहां बाकायदा संविधान का मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर में संविधान की पूजा भी की जाती है। 26 नवंबर को भारत में ‘संविधान दिवस’ (Constitution Day) मनाया जाता है। आज ही के दिन 1949 में संविधान सभा ने भारत के संविधान (Constitution of India) को अंगीकार किया था।

1992 में हुई थी स्थापनाः बस्तर संभाग के जगदलपुर में जिला मुख्यालय से करीब 35 किमी दूर बुरुंगपाल गांव में यह मंदिर है। इसका निर्माण स्थानीय आदिवासियों ने करवाया था। स्थानीय भाषा में लोग इसे ‘गुड़ी’ कहते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह देश का ऐसा इकलौता गांव है, जहां संविधान का मंदिर है। यहां एक आधारशिला रखी गई थी, जिस पर पांचवीं अनुसूची के प्रावधान लिखे गए हैं। इसकी स्थापना 6 अक्टूबर 1992 को रखी गई थी।

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क्यों हुई थी स्थापना?: 1992 में यहां मावलीभाटा क्षेत्र में एसएम डायकेम स्टील प्लांट का शिलान्यास हुआ था। इसकी स्थापना के खिलाफ स्थानीय आदिवासियों ने आंदोलन कर हाईकोर्ट तक लड़ाई लड़ी थी। आखिर में ग्रामीणों को जीत भी मिली थी। इसी जीत की खुशी में ये आदिवासी लोग ‘विजय उत्सव’ मनाते हैं। बस्तर अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र है और यहां पांचवीं अनुसूची लागू है। यह अनुसूची भारत सरकार अधिनियम 1935 के आर्टिकल 91 और 92 के मूल आधार पर बनी है।

मंदिर वाली जगह से ही चला था आंदोलनः स्टील प्लांट के विरोध में जब आदिवासी एकजुट हुए थे तो उनका नेतृत्व वहां के कलेक्टर रह चुके डॉक्टर बीडी शर्मा ने ही किया था। वह आंदोलन इसी मंदिर के यहां से संचालित होता था। यहां करीब 50 गांवों के आदिवासी, अनुसूचित जाति-जनजाति और ओबीसी समुदाय के लोग संविधान पर चर्चा करते हैं।

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