कभी फिल्म देखने के बहाने सिनेमा हॉल, कभी लंच ब्रेक के दौरान, कभी किसी कपड़ों की दुकान के ट्रायल रूम तो कभी ऑफिस के खाली पड़े सोफे। ये सब एक दूसरे से अलग हैं, लेकिन आज की एक पीढ़ी इसे एक ही धागे में जोड़ती नजर आ रही है। आराम के लिए, रोने के लिए और कुछ मिनट सो लेने के लिए। आपको सुनने में यह इंटरनेट पर वायरल होने वाला मजाक लग सकता है कि कोई युवा कर्मचारी ऑफिस में तनाव से बचने के लिए फिल्म देखने के बहाने सिनेमा हॉल में जाकर झपकी ले रहा है या फिर लंच ब्रेक के दौरान किसी कपड़ों की दुकान के ट्रायल रूम में जाकर रो रहा है। लेकिन इसके पीछे काम करने की जगह पर बढ़ते तनाव की एक गंभीर तस्वीर छिपी हुई है।
फॉर्च्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार जेन जी और जिलेनियल (मिलेनियल और Gen Z के बीच की पढ़ी) के कुछ कर्मचारी ऑफिस के तनाव से थोड़ी देर राहत पाने के लिए रेलवे स्टेशन, पार्क, ट्रायल रूम और यहां तक कि सिनेमा हॉल जैसी शांत जगहों का सहारा ले रहे हैं। वहां कुछ समय बिताने के बाद वे फिर से काम पर लौट जाते हैं। रिपोर्ट में न्यूयॉर्क के कर्मचारी बेन सैंडरसन का उदाहरण दिया गया है। उन्होंने फिल्म देखने के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ आराम से सोने के लिए 15 डॉलर का मूवी टिकट खरीदा। उन्होंने बताया, मैंने अपनी जिंदगी की सबसे अच्छी झपकियों में से एक ली। करीब 90 मिनट तक थिएटर की आरामदायक सीट पर सोने के बाद वह ऑफिस चले गए। बेन ने अपना यह अनुभव टिकटॉक पर साझा किया, जिसके बाद कई अन्य लोगों ने भी बताया कि वे काम के तनाव से निपटने के लिए इसी तरह के तरीके अपनाते हैं। एक टिकटॉक क्रिएटर ने तो न्यूयॉर्क की उन जगहों की सूची भी साझा की, जहां लोग खुलकर रो सकते हैं। इसमें सबवे स्टेशन, विलियम्सबर्ग ब्रिज और जारा सोहो के ट्रायल रूम जैसी जगहें शामिल थीं। उसने लिखा, यह ऐसी जगहें हैं, जहां आप बिना झिझक अपनी भावनाएं बाहर निकाल सकते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, ऑफिस में काम करने वाले Gen Z के लगभग आधे कर्मचारियों ने माना कि वे कार्यस्थल के तनाव की वजह से कभी न कभी रो चुके हैं। यह ट्रेंड सिर्फ कुछ लोगों के भावुक होने की कहानी नहीं है, बल्कि आज के कार्यस्थल की बढ़ती चुनौतियों और तनाव को भी दिखाता है। फॉर्च्यून की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 से Gen Z पारंपरिक रूप से सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक की नौकरी को “थका देने वाली” या “जीवन का उत्साह खत्म करने वाली” बता रही है। यही वजह है कि कई युवा अब कॉर्पोरेट करियर पर दोबारा विचार कर रहे हैं।
साल 2025 में ब्रिटेन में हुए एक बड़े सर्वे में पाया गया कि करीब 40% नए युवा कर्मचारियों ने नौकरी के पहले ही साल में उसे छोड़ने के बारे में गंभीरता से सोचा। वहीं दूसरी ओर, ऑफिस से काम करने की अनिवार्यता, कार्यस्थल पर बढ़ती बदसलूकी, खराब मैनेजमेंट, एआई की वजह से शुरुआती नौकरियां खत्म होने का डर और बढ़ते आर्थिक दबाव ने कई युवाओं को मानसिक रूप से परेशान कर दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही ये घटनाएं सिर्फ दिलचस्प किस्से नहीं हैं, बल्कि यह सवाल भी उठाती हैं कि क्या ये बर्नआउट (मानसिक और शारीरिक थकावट) के संकेत हैं, तनाव से निपटने का गलत तरीका हैं या फिर काम करने की जगह (कार्यस्थल) की बड़ी समस्याओं का परिणाम हैं।
जब तनाव बर्नआउट में बदलने लगे
इस विषय पर इंडियन एक्सप्रेस की टीम ने ‘द कल्चर थिंग’ की ऑर्गेनाइजेशनल साइकोलॉजिस्ट गुरलीन बरुआह ने बात की तो उन्होंने बताया, “इस ट्रेंड की अभी काफी चर्चा हो रही है, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि यह बिल्कुल नया है। लोग पहले भी जब खुद को बहुत ज्यादा तनाव में महसूस करते थे, तब कुछ देर का ब्रेक लेते थे। फर्क सिर्फ इतना है कि Gen Z अपनी भावनाओं को छिपाने के बजाय उन्हें खुलकर स्वीकार करने में ज्यादा सहज है।” उन्होंने बताया कि तनाव होने पर थोड़ी देर टहलना, कुछ समय शांत बैठना या छोटी सी झपकी लेना दिमाग को फिर से तरोताजा करने का अच्छा तरीका हो सकता है। लेकिन चिंता तब होती है, जब पूरे दिन काम करने के लिए बार-बार ऐसे ब्रेक लेना ही एकमात्र सहारा बन जाए।
गुरलीन बरुआह के अनुसार, अगर लगातार तनाव महसूस हो, काम करने की इच्छा कम होने लगे या आराम करने के बाद भी थकान बनी रहे, तो यह सामान्य थकावट नहीं बल्कि बर्नआउट की ओर बढ़ने का संकेत हो सकता है। समस्या ब्रेक लेने में नहीं है, बल्कि इस बात में है कि ऐसा कितनी बार हो रहा है, कितनी तीव्रता से हो रहा है और इसके पीछे असली वजह क्या है।
Gen Z भावनात्मक रूप से इतने थके हुए क्यों महसूस कर रहे
गुरलीन बरुआह का कहना है कि आज की युवा पीढ़ी पहले की पीढ़ियों से बिल्कुल अलग परिस्थितियों में काम कर रही है। एआई तेजी से नौकरियों का स्वरूप बदल रहा है, महंगाई लगातार बढ़ रही है, जलवायु परिवर्तन की चिंता बढ़ रही है और कई लोग नौकरी की असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। इसके साथ ही, मोबाइल और इंटरनेट की वजह से लोग हर समय काम से जुड़े रहते हैं। ऐसे में काम और निजी जीवन के बीच की दूरी लगभग खत्म होती जा रही है, जिससे दिमाग को आराम करने का समय नहीं मिल पाता। जब इतनी सारी चुनौतियां एक साथ सामने आती हैं, तो मानसिक दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। ऐसे में अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय उन्हें स्वीकार करना सबसे पहला कदम है। भरोसेमंद दोस्तों या सहकर्मियों से बात करना, जरूरत पड़ने पर थेरेपी लेना, कुछ समय सोशल मीडिया से दूर रहना, प्रकृति के बीच समय बिताना और कभी-कभी बिना किसी काम के शांत बैठना भी मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है।
गुरलीन बरुआह कहती हैं कि, हमें हमेशा दिमाग को किसी न किसी चीज में व्यस्त रखने की जरूरत नहीं होती। कई बार सिर्फ थोड़ा सुकून, सोचने का समय और खुद के साथ समय बिताना ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है।
कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य का कैसे ध्यान रखें… आइए इसे क्वीज से समझते हैं
सवाल: इनमें से कौन-सा संकेत बताता है कि कार्यस्थल का तनाव अब बर्नआउट में बदल सकता है?
- 1- व्यस्त दिन के दौरान तरोताजा होने के लिए थोड़ी देर टहलना या छोटी सी झपकी लेना।
- 2- हर समय नकारात्मक महसूस करना, भावनात्मक रूप से अलग-थलग पड़ जाना, नींद या ध्यान लगाने में परेशानी होना और रोज ऑफिस जाने से डर लगना।
- 3- किसी महत्वपूर्ण मीटिंग से पहले कभी-कभी तनाव महसूस होना।
- 4- काम के बाद डायरी लिखना या माइंडफुलनेस का अभ्यास करना।
सही जवाब: 2
गुरलीन बरुआन के अनुसार, माइंटफुलनेस, मेडिटेशन, डायरी लिखाना, थोड़ा देर टहलना, छोटी झपकी लेना या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना जैसे तरीके कार्यस्थल के तनाव को कम करने में मदद कर सकते हैं। लेकिन अगर तनाव आपकी नींद, शारीरिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास, ध्यान लगाने की क्षमता या रिश्तों पर असर डालने लगे या आप हर समय नकारात्मक सोचने लगें, भावनात्मक रूप से खुद को दूसरों से अलग महसूस करें और रोज ऑफिस जाने से डर या घबराहट होने लगे, तो ये बर्नआउट के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थित में अपने मैनेजर से काम के बोझ के बारे में खुलकर बात करें। यदि जरूरत महसूस हो, तो किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेने में भी संकोच न करें।
डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और विशेषज्ञों से हुई बातचीत पर आधारित है। किसी भी नई दिनचर्या या उपाय को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
डेटिंग की दुनिया का नया ट्रेंड है बर्डवाचिंग, जानें रोमांटिक डिनर की जगह क्या करते हैं कपल्स
बर्डवॉचिंग डेट सुनने में थोड़ा अटपटा जरूर लग सकता है, लेकिन दुनिया के कई देशों के युवाओं को यह काफी पसंद आ रहा है। इसमें कपल्स पार्क, झील या जंगल के किनारे बैठकर पक्षियों को देखना, उनकी आवाजें सुनना और प्रकृति के बीच समय बिताना है। इसके पीछे वजह सिर्फ प्रकृति से प्रेम ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे… यहां क्लिक कर पढ़ें परी खबर
