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शारीरिक सौष्ठव: महिला और मांसपेशी के बीच मानसिकता की जंग

फिल्मों से लेकर फैशन शो के मंचों तक सुंदरता और शारीरिक सौष्ठव में भारतीय महिलाओं का जलवा वैश्विक स्तर पर है।

Author September 27, 2018 6:54 AM
भार उठाकर शरीर के कटाव को सौष्ठव देना और मांसपेशियों वाले शरीर का प्रदर्शन करने वाली फिगर एथलीट विदेशों में ही दिखती थीं।

फिल्मों से लेकर फैशन शो के मंचों तक सुंदरता और शारीरिक सौष्ठव में भारतीय महिलाओं का जलवा वैश्विक स्तर पर है। लेकिन इसके उलट भार उठाकर शरीर के कटाव को सौष्ठव देना और मांसपेशियों वाले शरीर का प्रदर्शन करने वाली फिगर एथलीट विदेशों में ही दिखती थीं। अब इस क्षेत्र में भी भारतीय महिलाओं ने अपनी दस्तक देनी शुरू कर दी है। मांसपेशियां मजबूत कर शरीर को तराशने के किस्से भारतीय महिलाओं के लिए दुर्लभ थे। कुछ महिलाओं ने इस क्षेत्र में दमखम दिखाया है।

फिगर एथलीट मधु झा कहती हैं, हमारे देश की मानसिकता अब भी अपनी महिलाओं को मर्दों के बरक्स अपने मसल्स का प्रदर्शन करते नहीं देखना चाहती है। हमारा समाज बॉडी बिल्डिंग करने वाली महिलाओं को देखने का अभ्यस्त नहीं। वो कहती हैं कि भारतीय पुरुष महिलाओं को कमजोर, कमसिन ही देखना चाहते हैं, जिसकी वजह से वो मजबूत और सुगठित शरीर वाली महिलाओं को बर्दाश्त नहीं कर पाते। मधु का मानना है कि इसके पीछे पुरुषों का महिलाओं पर अधिकार कायम रखने की मानसिकता है। जो यह नहीं चाहता कि महिलाएं शारीरिक रूप से मजबूत बनें।

वो कहतीं हैं कि वो यदि मजबूत होंगी तो संभव हो उनकी गलत और सही बात पर अपनी बात रख सकेंगी। वे सख्ती से ना भी कह सकेंगी। 29 साल की मधु झा का कहना है कि शारीरिक शौष्ठव का यह क्षेत्र महिलाओं का बेसब्री से इंतजार कर रहा है। यहां भारत के पास वो महिलाएं ही नहीं जो विदेशी महिलाओं की बॉडी बिल्डिंग की चुनौती को स्वीकार कर सकें। मधु बतातीं हैं कि उनकी स्कूली शिक्षा पटना में हुई। इसके बाद उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी में कोलकाता से पढ़ाई की। उनका सपना कुछ और था। लेकिन वजन कम करने के लक्ष्य और उस लक्ष्य को पाने के बाद अगले लक्ष्य ने उन्हें फिगर एथलीट बना दिया। दिल्ली के मालवीय नगर में रहने वाली मधु जेडी इंस्टीच्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी में डिजायनिंग शिक्षिका के तौर पर काम करती हैं। उन्हें लगता है, भारतीय परिवार को अपनी मानसिकता में अभी और बदलाव की जरूरत है।

बिंदिया ने 2017 में लंदन के लासवेगास से भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए पहला डब्लूबीएसएफ (वर्ल्ड ब्यूटी फिटनेस एंड फैशन) का प्रो कार्ड जीता। वह कहती हैं कि हमारे देश से पहले इस क्षेत्र में कोई नहीं आता था। इसलिए यहां इसे खत्म ही कर दिया गया था। लेकिन समय में बदलाव आया और महिलाओं ने इस ओर रुख करना शुरू किया है। बिंदिया कहती हैं कि आज भी महिलाएं प्रोटीन खाने और जिम में भार उठाने से डरती हैं, अब भी लड़कियां कार्डियो कर दुबली होने को ही जिम आती हैं। बॉडी बिल्डिंग से महिलाओं की मांसपेशियां बनती हैं, उनके महिला होने पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। हां पुरुषों की मानसिकता जरूर प्रभावित होती है।

बिंदिया बताती हैं कि साल 2017 में उन्हें जब पहली बार इस प्रतियोगिता के लिए चुना गया तो पूरे 130 करोड़ के देश से केवल 35 महिलाओं ने ही भाग लेने के लिए फार्म भरे थे। आज इसमें इजाफा हुआ है। इस साल यह संख्या बढ़कर 45 हुई है। बिंदिया कहती हैं कि भारतीय समाज महिलाओं को बिकनी में देखने का अभ्यस्त नहीं है। भारत की लड़कियों के मन में भी ऐसी चीजें डाली जाती हैं जिससे उन्हें बिकनी पहन कर स्टेज पर आने में और मर्दों के बीच अपने शरीर का प्रदर्शन करने में परेशानी होती है। लेकिन धीरे-धीरे माहौल बदल रहा है।

महिला होने के नाते बॉडी बनाने का सफर काफी संघर्ष वाला है। नौकरी के साथ अपने खाने-पीने की आदतों में बदलाव करना होता है, अपनी सामाजिक जिंदगी छोड़नी होती है। शादी भी करूंगी लेकिन अभी मैं अपने करिअर को लेकर गंभीर हूं। मेरे सामने बॉडी बिल्डिंग में एक अच्छा करिअर इंतजार कर रहा है। मेरे लिए जर्मनी में जाकर एमबीपीयूआइ का प्रो कार्ड जीतने वाली पहली महिला बनना गर्व की बात है। -मधु झा

मैं 35 साल की उम्र में पहली बार लंदन में स्टेज पर मर्दों के सामने बिकनी में उतरी, मुझे भी काफी शर्म आ रही थी। एक पल के लिए मुझे लगा ये नहीं होगा। लेकिन मुझे पता था कि मेरे पास सिर्फ एक मिनट है जो मेरी तकदीर तय करेगा। इसके बाद मैंने शर्म को भूल कर अपना सर्वोत्तम दिया और मैंने डब्लूबीएसएफ का प्रो-कार्ड जीता। उस वक्त मैं चौदह और चार साल की दो बेटियों की मां थी। – बिंदिया शर्मा

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