भारत अपनी समृद्ध विरासत और संस्कृति की वजह से दुनियाभर में अलग पहचान रखता है। यहां पर अलग-अलग धर्मों, जातियों और समुदाय के लोग एकसाथ रहते हैं। विभिन्न समुदाय के लोग, अलग-अलग भाषाएं, बोलियां, त्योहार, संगीत, नृत्य, खानपान, पहनावा और कला भारत की अनमोल विरासत मानी जाती है। हर राज्य की अपनी अलग पहचान और संस्कृति है, जिसे एक्सप्लोर करने देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, उत्तराखंड और अन्य राज्यों की पहचान किसी न किसी खास चीज से जुड़ी हुई है।
हर जगह अलग-अलग बोलचाल, खानपान और रहन सहन उस जगह की संस्कृति को दर्शाता है। इसके अलावा आपको यहां कई पारंपरिक कलाएं देखने को भी मिलेंगी, जो किसी खास जगह से जुड़ाव रखती है। भारत की हस्तकला भी इसमें शामिल है। यह भारत की परंपरा, कला और कारीगरों की अनोखी पहचान है। दरअसल आज हम जिस कला की बात कर रहे हैं उसका नाम उस्ता कला है। यह राजस्थान के बीकानेर जिले की समृद्ध विरासत का हिस्सा है। किसी और देश से आई कला आज हमारे देश की अनोखी पहचान बन चुकी है।
क्या है बीकानेर की उस्ता कला?
उस्ता कला को राजस्थान के बीकानेर जिले की पहचान कहा जा सकता है। ऊंट की खाल पर की गई मीनाकारी को ही उस्ता कला कहा जाता है। उस्ता पर्शियन शब्द है जो उस्ताद से लिया गया। इसका अर्थ मास्टर होता है। इसमें नेचर से इंस्पायर्ड खूबसूरत पैटर्न को गोल्ड यानी सोने से सजाया जाता है। फिलहाल इस कला को बनाने वाले कुछ गिने-चुने लोग ही बचे हैं। उस्ता का काम करने वाले कारीगरों को उस्ताद कहा जाता था। समय के साथ उसे पीछे का द हट गया है और यह शब्द उस्ता बन गया।
उस्ता कला का इतिहास
यह कला पर्शिया (ईरान) से भारत में मुगल शासकों द्वारा पहुंची। माना जाता है कि करीब 16वीं और 17वीं शताब्दी में यह कला खूब फली फूली। राजा राय सिंह सम्राट अकबर के दरबार में इस कला को देखकर इतने प्रभावित हुए कि वह 7 उस्ता कारीगरों को साल 1859 में बीकानेर लेकर आए। जिससे यह शहर इस कला का केंद्र बन गया। आज भी इस कला का बेहतरीन नमूना जूनागढ़ किले में देखा जा सकता है। इस किले की दीवारों पर पत्तियां, फूलों और जानवरों की आकृतिक के उभरे हुए पैटर्न को सोने के वर्क से सजाया गया है। शुरुआत में इस कला को दीवारों और छतों पर उकेरा जाता था। समय के साथ इसमें बदलाव किए गए और इसे मार्बल, गिलास, लकड़ी और ऊंट की खाल पर बनाया जाने लगा।
किस तरह की जाती है कारीगरी
सबसे पहले कागज पर एक डिजाइन बनाकर सतह पर उसे छापा जाता है। उसके बाद पुराने घड़े यानी मटके को बारीक कूट करकर छाना जाता है। इससे एक स्मूथ पेस्ट तैयार किया जाता है। अब ब्रश की मदद से इससे खूबसूरत पैटर्न बनाए जाते हैं। इस तकनीक को मनोती कहते हैं। फिर पीले रंग का पेंट किया जाता है, 24 कैरेट का सोने का वर्क पेस्ट किया जाता है। जिससे सालों साल यह आर्ट नया दिख सके। इसके बाद अंत में डिजाइन को आकर्षक बनाने के लिए अलग-अलग रंगों का इस्तेमाल किया जाता है।
ऊंट की खाल पर की जाती है कारीगरी
बीकानेर की इस पारंपरिक कला की पहचान मुख्य रूप से ऊंट की खाल पर की जाने वाली सुनहरी मीनाकारी और मनोती से है। इसके लिए सबसे पहले ऊंट की खाल को साफ करके सुखाया जाता है। इसके बाद सजावटी वस्तु से आकार दिया जाता है। खाल की सतह पर सफेद रंग या खास लेप चढाया जाता है जिससे चित्रकारी के लिए चिकनी सतह मिल सके। गेसो पेंट से चित्रों की नक्काशी उभरी हुई बनाई जाती है। इसे स्थानीय भाषा में मुनव्वत कहा जाता है। उभरे हुए डिजाइन पर सोने के पत्तों और चमकीले रंगों से सजावट की जाती है।
इन जगहों पर देख सकते हैं उस्ता कला
उस्ता कला का इस्तेमाल राजस्थान के बीकानेर जिले में महलों, धार्मिक स्थलों और कई इमारतों में किया गया है। जूनागढ़ किले में अनूप महल, फूल महल और करण महल की दीवारों और छतों पर इस कला से नक्काशी की गई है। साथ ही सोने का काम भी किया गया है। लक्ष्मीनारायण मंदिर और हवेलियों में भी इस कला का इस्तेमाल किया गया है। इसके अलावा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह और अजमेर दरगाह के कुछ हिस्सों में भी इस नक्काशी की झलक देखी जा सकती है।
