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बच्चों को शांत रखने के लिए बिल्कुल ना लें मोबाइल फोन या सोशल मीडिया का सहारा

म सभी को यह बात मालूम है कि बचपन में दिमाग का विकास होता है। इस समय बच्चों को खेलने, सोने, अपनी भावनाओं को हैंडल करे और रिश्तों को बनाने का समय चाहिए होता है। वहीं ज्यादातर समय उन्हें फोन देने या सोशल मीडिया तक पहुंच होने की वजह से इन चीजों पर उसका प्रभाव साफ दिखाई देता है।

Author नई दिल्ली | October 23, 2016 10:54 AM

आमतौर पर पैरेंट्स अपने बच्चों को चुप करवाने के लिए मोबाइल फोन पकड़ा देते हैं। इससे आपका बच्चा चुप हो जाता है और आप आराम से काम कर लेते हैं। लेकिन बच्चों को इस तरीके से चुप नहीं करवाना चाहिए। चाहे बेशक इससे घर में शांति ही क्यो नहीं बनी रहती है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पेडियाट्रिक ने हाल ही में पैरेंट्स के लिए कुछ दिशा-निर्देश जारी किए हैं। जिसके अनुसार बच्चों के गेजैट्स इस्तेमाल के बेशक कुछ फायदे होते हों लेकिन इसके बावजूद माता-पिता को बच्चों को शांत रखने के लिए इनका उपयोग नहीं करना चाहिए। अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी सीएस मोट्ट चिल्ड्रन हॉस्पिटल के जेनी रेडेस्की के अनुसार इनके इस्तेमाल की वजह से बच्चों का खुद की भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रह पाता है। वहीं डिजिटल मीडिया कई छोटे बच्चों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया है। जेरेनी ने कहा कि हमारी रिसर्च उनके विकास में आ रहे प्रभावों तक सीमित है।

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रेडेस्की ने कहा- हम सभी को यह बात मालूम है कि बचपन में दिमाग का विकास होता है। इस समय बच्चों को खेलने, सोने, अपनी भावनाओं को हैंडल करे और रिश्तों को बनाने का समय चाहिए होता है। वहीं ज्यादातर समय उन्हें फोन देने या सोशल मीडिया तक पहुंच होने की वजह से इन चीजों पर उसका प्रभाव साफ दिखाई देता है। हमारे शोध की वजह से परिवार और पेडियाट्रिक्स बच्चों के बेहतर विकास में सहायता कर सकते हैं।

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2 से 5 साल तक के बच्चों की सोशल मीडिया या फोन तक पहुंच केवल एक घंटे तक होनी चाहिए। इसके अलावा खेल-कूद जैसी एक्टिविटीज में उनकी सक्रियता बढ़ाने की कोशिशें करनी चाहिए, जिसमें कि पैरेंट्स भी सम्मिलित हों। अगर कोई पैरेंट बच्चे से दूर रहता है तो उसे भी वीडियो चैट को नजर अंदाज करना चाहिए। उनकी जिंदगी में डिजिटल मीडिया की पहुंच ज्यादा देर तक रहने की वजह से नींद, विकास, शारीरिक सेहत पर भी बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

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