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मैक-डी की तरह दुनिया भर में लिट्टी चोखा की दुकानें खोलना चाहते थे अखिलेश, मुलायम के एक फोन से बदल गई थी जिंदगी

खुद अखिलेश भी सिडनी में अपनी पढ़ाई के दौरान मैकडोनाल्ड की तरह लिट्टी चोखा की एक चेन खोलना चाहते थे और भारत लौटने पर इस पर काम करने का मन बनाया था। ये वो दौर था जब...

mualayam singh yadav, akhilesh yadavअखिलेश यादव पिता मुलायम सिंह यादव के साथ। (फोटो-इंडियन एक्सप्रेस)

दिसंबर 1999 की उस सर्द दोपहर अखिलेश यादव अपनी पत्नी डिंपल के साथ देहरादून के एक शॉपिंग मॉल में खरीदारी कर रहे थे। चंद दिन पहले ही (24 नवंबर 1999) को दोनों की शादी हुई थी और नवविवाहित जोड़ा देहरादून में छुट्टियां मना रहा था और क्रिसमस के दौरान हनीमून के लिए सिडनी या लंदन जाने की प्लानिंग कर रहे थे। शॉपिंग के दौरान ही अखिलेश यादव का फोन बजा। दूसरी तरफ नेता जी यानी उनके पिता मुलायम सिंह यादव थे। चंद औपचारिकताओं के बाद उधर से आवाज आई, ‘तुम्हें चुनाव लड़ना है…’। अखिलेश कुछ समझ पाते इससे पहले नेता जी ने फोन काट दिया।

मुलायम नहीं चाहते थे अखिलेश राजनीति में आएं: साल भर पहले ही ऑस्ट्रेलिया से अपनी पढ़ाई पूरी कर लौटे अखिलेश यादव की राजनीति में आने की कोई तमन्ना नहीं थी और मुलायम भी नहीं चाहते थे कि ‘टीपू’ सियासत ज्वाइन करें। अखिलेश यादव की जीवनी ‘विंड्स ऑफ चेंज’ में वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन लिखती हैं, तब समाजवादी पार्टी के महासचिव रहे अमर सिंह ने उन्हें बताया था कि अखिलेश के सियासी भविष्य को लेकर जब मुलायम से चर्चा होती तो वे कहते थे, ‘उसे राजनीति से दूर रहने देते हैं। अच्छा होगा कि वह कोई और नौकरी तलाश ले।’

खुद अखिलेश भी सिडनी में अपनी पढ़ाई के दौरान मैकडोनाल्ड की तरह लिट्टी चोखा की एक चेन खोलना चाहते थे और भारत लौटने पर इस पर काम करने का मन बनाया था। ये वो दौर था जब मैक-डी जैसे रेस्टोरेंट्स दुनिया भर में अपने पैर पसार रहे थे और यह आइडिया युवा अखिलेश को जंच गया था।

कैसे बदला मुलायम का मन? : दरअसल, साल 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के कन्नौज और संभल, दो सीटों से चुनावी अखाड़े में उतरे और दोनों पर ही जीत हासिल की। अपने चुनावी प्रचार के दौरान उन्होंने दोनों क्षेत्रों की जनता से वादा किया था कि जिस सीट से वे ज्यादा मार्जिन से चुनाव जीतेंगे, उस सीट को अपने पास रखेंगे।

संभल सीट पर उन्हें कन्नौज के मुकाबले अधिक वोट मिला। इस तरह अपने वादे और संवैधानिक नियमों के मुताबिक उन्हें कन्नौज सीट छोड़नी पड़ी। हालांकि कन्नौज से मुलायम सिंह का इमोशनल लगाव था, क्योंकि इस सीट की नुमाइंदगी कभी उनके राजनीतिक गुरु डॉ. राम मनोहर लोहिया कर चुके थे।

‘छोटे लोहिया’ ने दी अखिलेश को लड़ाने की सलाह: 1999 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश ने कन्नौज में पिता मुलायम सिंह के लिए प्रचार भी किया था और लोग उन्हें काफी पसंद भी करते थे। जब मुलायम ने कन्नौज सीट खाली की तो चौतरफा उप-चुनाव में अखिलेश को यहां से लड़ाने की मांग उठी। इसके बाद समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता रहे और ‘छोटे लोहिया’ के नाम से चर्चित जनेश्वर मिश्रा ने इस बारे में मुलायम से बात करने का फैसला लिया और मौका देखकर उनसे कहा, ‘सब जब कह रहे हैं तो अखिलेश को क्यों नहीं लड़ाते हो?’

अखिलेश यादव की जीवनी में सुनीता एरॉन लिखती हैं, ‘इस तरह शादी के करीब 60 दिनों के अंदर अखिलेश यादव सांसद बन गए और इसके बाद फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा’। सुनीता एरॉन ने बाद में जब डिंपल यादव से पूछा कि क्या चुनाव के बाद दोनों हनीमून मनाने कहीं गए थे, तो डिंपल ने हंसते हुए जवाब दिया कि चुनाव के बाद हनीमून का प्लान अधूरा रह गया। अखिलेश यादव सार्वजनिक जीवन में व्यस्त हो गए।

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