तमिल एक्ट्रेस ज्योतिका की अपनी सास के साथ बहुत अच्छी बॉन्डिंग है। साल 2017 के जस्ट फॉर विमेन अवॉर्ड्स में उन्होंने दिल छू लेने वाली स्पीच के पीछे की वजह बताई। इस दौरान एक्ट्रेस ने अपनी सास की तारीफ करते हुए और उनसे सीखी गई बातों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि 27 साल की उम्र में मेरी शादी हुई और मैं एक शानदार महिला से मिली। उनका स्वभाव बहुत अच्छा था और दिल बहुत कोमल। मेरी मां से बिल्कुल अलग जिन्होंने मुझे परंपराएं और संस्कार सिखाए। मेरी सास जो अभी यहीं बैठी हैं उन्होंने मुझे संतुलित जीवन सिखाया और मेरे उग्र स्वभाव के बावजूद उन्होंने मुझे जिंदगी में संस्कार अपनाना सिखाया। ज्योतिका ने मंच पर कहा कि मैं उन्हें रानी कहती हूं, क्योंकि सिर्फ एक रानी ही राजकुमार की परवरिश कर सकती है। जिसकी आज समाज को बहुत जरूरत है।
इंडियन एक्सप्रेस ने इस बारे में यशोदा मेडिसिटी के कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट डॉ. द्रुहिन ग्रोवर से बात की। उन्होंने बताया कि ससुराल वालों को हमेशा सख्त, भावनात्मक रूप से दूर और जिनसे आसानी से बात न हो सके, ऐसा माना जाता है। क्योंकि उनकी भूमिकाओं में संयम और कंट्रोल की जरूरत होती है। डॉ. ग्रोवर के अनुसार जब वे किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आते हैं जो स्वभाव से मिलनसार या भावनात्मक रूप से खुलकर बात करने वाला होता है, तो एक शांत बदलाव आता है। इस दौरान उनका एक ज्यादा सहज और नरम रूप सामने आता है। यह ऐसा रूप होता है जिसे परिवार के करीबी लोग शायद ही देख पाते हों।
रिश्ते को समझना है जरूरी
डॉ. ग्रोवर इंडियन एक्सप्रेस को बताते हैं कि साइकोलॉजिकली कठोरता का एहसास अक्सर भावनाओं की कमी के बजाय किसी भूमिका से जुड़ा व्यवहार होता है। मिलनसार और जिंदादिल इंसान भावनात्मक सुरक्षा का माहौल बनाते हैं। वे बिना किसी उम्मीद के सामने वाले को अपनाते हैं। इससे दूसरा व्यक्ति अपना वह पहलू भी जाहिर कर पाता है जिसे वह आमतौर पर छिपाकर रखता है।
डॉ. ग्रोवर के अनुसार बिना किसी करीबी रिश्ते के वे एक ऐसी भावनात्मक जगह बनाते हैं, जहां सामने वाले व्यक्ति को कोई खास भूमिका निभाने की जरूरत नहीं होती। इन पलों में जो सामने आता है, वह कोई नया व्यक्तित्व नहीं बल्कि एक छिपा हुआ व्यक्तित्व होता है। यह ऐसे गुण होते हैं जो असल में मौजूद होते हैं लेकिन हालात की वजह से लंबे समय तक दबे हुए रहते हैं।

साइकोलॉजिस्ट के अनुसार बहू अपनी सास के साथ सिर्फ भूमिकाओं के आधार पर नहीं बल्कि दो वयस्कों के तौर पर भी रिश्ता बना सकती है। उनके अनुसार जब सास को भावनात्मक रूप से सुरक्षित और सम्मानित महसूस होता है, तो स्वाभाविक रूप से नजदीकी बढ़ सकती है और कभी-कभी यह दोस्ती में भी बदल सकती है।
साइकोलॉजिस्ट ने बताया कि कई घरों में बेटों को अपने माता-पिता के साथ रिश्ता अक्सर भावनात्मक बातचीत के बजाय फर्ज पर ज्यादा टिका होता है। लेकिन उनका कहना है कि सास-बहू के अच्छे रिश्ते में इस बात से ज्यादा अहम भावनात्मक सुरक्षा है कि कौन किसके ज्यादा करीब है।
जिन परिवारों में भावनाओं को खुलकर जाहिर करने की स्वतंत्रता होती है, वहां रिश्ते ज्यादा फलते-फूलते हैं। जिन घरों में ऊंच-नीच के बजाय एक दूसरे को अपनाने और कंट्रोल करने के बजाय बातचीत को अहमियत दी जाती है, वहां रिश्तों को आगे बढ़ने का मौका मिलता है। डॉ. ग्रोवर कहते हैं कि भावनात्मक सुरक्षा इस बात से ज्यादा जरूरी है कि किसे किसके ज्यादा करीब होना चाहिए।
