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विशेष: बंद दौर में खुले किवाड़

अपने शुरुआती दिनों में ही कोविड-19 एक ऐसा अनुभव लेकर आया जिसने जिंदगी के प्रति मोह को नए सिरे से परिभाषित किया। साथ ही इस दौरान सृजन और अभिव्यक्ति की वह दुनिया भी फिर से परिभाषित हुई जिसमें कहने-समझने और सीखने का एक नया तजुर्बा संवाद के हामीदारों के हिस्से आया। तकनीक ने इस तजुर्बे का जिस तरह साथ दिया वह भी मौजूदा देशकाल के खाते में दर्ज नया और अनूठा अनुभव है।

symbolicसांकेतिक फोटो।

आनंद भारती

मोहम्मद अल्वी का यह सवेरा रात के अंधियारे के बाद मानो उम्मीद का संकेत है। ऐसी उम्मीद, जो ‘कल हो न हो’ की सलीब पर लटकी हुई थी और जिसका हम जागते हुए बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। आज के संदर्भ में यह एक और अर्थ देता है। हालांकि इसमें असमंजस की उपस्थिति है, इसके बावजूद अंधेरे से आजाद होने की छटपटाहट है। आदमी जब किसी एक कथा-समय से उबरने की कोशिश करता है तो उसके अंदर चाहे न चाहे प्रतिरोध का साहस आ ही जाता है। वह मौके की ताक में रहता है कि कितनी ताकत के साथ अपने हाथ लहरा सके और खामोश सदा में गूंज भर सके। यही हुआ कोरोनाकाल में।

कोरोना से उपजे तनाव और डर के खिलाफ एक आवाज का आगाज हुआ कि अब तक जो हुआ, सो हुआ। जो आने वाला कल है, उसे देखो। लेकिन मुश्किल है कि ‘नए’ के प्रति भरोसा जगाने और उसे स्वीकार करने में वक्त लगता है। यह भी उतना ही सच है कि अतीत कभी आसानी से पीछा नहीं छोड़ता है। हम खुद उसे अपने जीवन से कभी अलग भी नहीं कर पाते हैं। वह एक ऐसा मोह है जो नागफाश की तरह जकड़े रहता है।

साल, सवाल और किवाड़

इसलिए मानकर चलना होगा कि कोरोनाकाल का संत्रास भी भूख, गरीबी, असहिष्णुता, कट्टरता, जातिवाद और मनोरोग की तरह अब साथ ही चलेगा। संक्रमण से टीकाकरण तक पहुंचे इस दौर ने यह बता दिया कि न अभी संकट खत्म हुआ है, न चुनौती समाप्त हुई है। एक जाएगा तो दूसरा आ जाएगा। समस्याएं हमेशा रूप बदल कर आती हैं और हम उसे पहचानने में चूक कर जाते हैं। इसी भुलावे में हम पहले भी मारे जाते रहे हैं और शायद आगे भी मारे जाते रहेंगे।

इस मायने में कोरोना अब तक की सबसे ताकतवर महामारी बन गया जिसने दुनिया भर के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र की परिभाषा को अस्वाभाविक तौर पर उलट कर रख दिया। यही वजह है कि कोरोनाकाल में जो कुछ सवाल तेजी से उभरे हैं उनके जवाब हमें ढूंढने होंगे।

बहरहाल, 2020 को कोरोना की कामयाबी और उसकी उपलब्धियों का साल कहें या हम अपनी विफलताओं का? ये सारे सवाल आज अंधेरे में भटक रहे हैं। हम हैं कि जवाब ढूंढने के बजाए अंधियारे को ही उस देहरी पर बिठाने की अनहद कोशिश में हैं, जहां रात में दीया जलता है और सुबह-सुबह सूरज उसी रास्ते से रोशनी को संभाले घर के अंदर आता है।

यह साल भी उसी रास्ते से किवाड़ को धकियाता हुआ आगे निकल रहा है। यह किवाड़ और कुछ नहीं, हमारा मन है। यह रात-दिन जागता रहता है। फिर भी हम उस पर दस्तक का इंतजार करते रहते हैं कि कोई आएगा और ‘मंगलमय’ का लिफाफा हाथ में थमा देगा। यह खुलने का इंतजार एक भ्रम है। किसी ने सही लिखा है, ‘मैं रोज लगाती हूं/ एक सांकल अपने ख्वाबों की दुनिया पर/ फिर भी जाने कैसे/ किवाड़ खुले मिलते हैं।’

संवाद की नई दुनिया

गाजियाबाद में रहने वाली एक महिला फेसबुक पर जब आगे बढ़कर यह कहती है कि वह डेढ़ दशक पहले बिहार से बाहर निकली तो थी माइक्रोबाइलॉजी जैसे नए विषय की पढ़ाई करने और इसी क्षेत्र में अपना करियर बनाने पर गृहस्थी के चाक पर घूमते-घूमते एक सामान्य शहरी घरेलू औरत भर बनकर रह गई। कमाल है कोरोना के इस दौर का जिसने उसके अंदर की अभिव्यक्ति और जीवन की बची-खुची रचनात्मकता को जिंदा किया और आज उसकी कहानी और कविता के दो ई-बुक लोग खरीदकर पढ़ रहे हैं।

इसी तरह पेशेवर पत्रकारिता की राह छोड़ने का मन बना चुकी एक महिला पत्रकार इस दौरान अपने एक दोस्त की मदद से अभिव्यक्ति और सोच की नई दुनिया से अवगत हुई। उस दौर में जब लोग घरों में बंद थे तब तकरीबन वो 20 ऐसे वेबिनार या आॅनलाइन समूह चर्चा में शामिल हुईं जहां जीवन और अध्यात्म को लेकर नई समझ और अनुभव के दुनियाभर के लोग जुड़े थे। ‘सोल कनेक्ट’, ‘हीलिंग रिलेशनशिप ब्लूज’, ‘डेथ सर्किल’ और ‘फेदर आॅफ फेद’ जैसे नामों से होेने वाले इन आयोजनों के बारे में बाद में सोशल मीडिया पर काफी कुछ लिखा भी गया।

इसी तरह उत्तर प्रदेश के एक संस्कृतिकर्मी इस दौरान कोरोना अनुभव को लेकर दो ऐसी किताबें लेकर आए है, जिसमें भारत सहित कई दूसरे मुल्क के लेखकों के इस दौरान के अनुभव दर्ज हैं। जयपुर की संस्था ‘पेन : मीडिया लिटरेसी’ ने इस दौरान बच्चों के बीच कई किस्तों में दो-दो दिनों की आॅनलाइन कार्यशाला आयोजित की। आयोजन का हासिल यह रहा कि संवाद की नई समझ और तमीज के साथ बच्चों के पास जाने से बेहतर है कि उन्हें गौर से सुना जाए और फिर अपनी समझ और अभिव्यक्ति को नया परिष्कार दिया जाए। ऐसे न जाने कितने रचनात्मक तजुर्बे कोरोनाकाल ने लोगों को उस दौरान दिए जब सड़कों पर सन्नाटा पसरा था और कामधाम की कई गतिविधियां एक साथ स्थगित चल रही थीं।

पूंजीवाद का उपसंहार

कोरोना ने कोई फर्क नहीं किया कि कौन अमीर है और कौन गरीब। कौन विद्वान है और कौन बे-पढ़ा। कौन रात-दिन अंग्रेजी बोलता है और कौन टुकुर-टुकुर देखता रहता है। कौन ताकतवर है और कौन झोपड़पट्टी में रहने वाला है। उसने तो एक पल में ही सबको जीवन का सच बता दिया। लेखिका क्षमा शर्मा ने कहा भी है, ‘कोरोना ने हमें बताया है कि पूंजीवाद ने अब तक जीने के जो मानक दिए थे, गाड़ियां, घर और दिखावे के जीवन का सबसे बड़ा मूल्य बना दिया था, आज एक झटके में वह खत्म हो चला है। …और हां, जिस परिवार को सबसे बड़ा शोषण का कारक बताया जा रहा था, वह इन महामारी के दिनों में सबसे बड़ा संबल को लेकर आया है…। एक तरह से पूंजीवाद ने जिसे विकास कहकर मनुष्य के ऊपर लादा था, वह विकास विनाश की गाथा कह रहा है।’

तर्क और निष्कर्ष

फिलहाल तो इस समय का एक ही निष्कर्ष है कि कोरोना ने भले घर के दरवाजे, सड़कों की आवाजाही, कारखानों के उत्पादन, अखबारों के प्रकाशन बंद करा दिए लेकिन खेती-किसानी पर कोई लगाम नहीं लगाई। उसने अभिव्यक्ति को भी अपनी बात कहने के लिए नए-नए दरवाजे दिखाए। और ये दरवाजे साहित्य की पुरानी लीक से कई मामलों में अलग रहे, अनूठे रहे। मेधा का ऐसा विस्फोट शायद ही कभी हुआ होगा। बंद कमरे में पूरी सृष्टि समाने को आतुर हो गई। जिसे देखो, वही सृजनरत है। एक तरफ साहित्यिक-सामाजिक मंचों का आॅनलाइन अवतार सामने आया, जहां कविता और कहानी पाठ की ठाट बनी रही तो वहीं दूसरी तरफ समय और समाज को नए सिरे से पढ़ने की कवायद में वे लोग भी जुटे जिनकी इससे पहले लेखक-आलोचक जैसी शिनाख्त दूर-दूर तक नहीं थी।

अभिव्यक्ति का कमरा

आदमी गूंगा न हो जाए, इसके लिए  इस पूरे दौर में ट्विटर-फेसबुक को बोलने का पूरा अधिकार सौंप दिया गया। इतना बोला गया कि हर दिन एक नया विवाद पैदा होता रहा। एक छोटे से कमरे से भी दुनिया रची जा सकती है और मानसिक आजादी को महसूस किया जा सकता है, यह आभास दुनिया को पहली बार हुआ। साथ ही इस समझ को लेकर भी नया विमर्श खड़ा हुआ कि सोशल मीडिया का अपना संजाल भी पूरी तरह निरपेक्ष नहीं है। इसे लेकर यूट्यूब से लेकर नेटफ्लिक्स तक कई फिल्में भी आईं, जिसमें यह दिखाया गया कि अभिव्यक्ति की सार्वभौमिकता को तकनीक की ताकत ही नहीं मिली है, उसकी चुनौती भी मिली है।

अभिव्यक्ति की दुनिया की गनीमत यह है कि अब लोगों ने यह समझना शुरू कर दिया है कि अपनी आवाज को कभी अकेलेपन मत पड़ने दो, उसे समूहों से जोड़ो। साफ है कि एक ऐसे दौर में जब लोग अकेलेपन के दलदल में धंसते जा रहे थे, अभिव्यक्ति ने मनुष्य के जीवन के प्रति प्रेम को नए सिरे परिभाषित किया।

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