कई बार हमारा दिमाग साधारण स्थितियों को भी जटिल बना देता है। जैसे किसी का मैसेज न आना हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि शायद सामने वाला नाराज है या हमें इग्नोर कर रहा है। लेकिन एक्सपर्ट्स के अनुसार ओवरथिंकिंग कोई स्थायी व्यक्तित्व गुण नहीं है, बल्कि यह एक सीखा हुआ मानसिक पैटर्न है। न्यूयॉर्क स्थित ‘थेरेपिस्ट ऑफ न्यूयॉर्क’ के क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. जेफ्री गोल्ड बताते हैं कि ओवरथिंकिंग अक्सर ‘प्रॉब्लम सॉल्विंग’ जैसा महसूस होता है, जबकि असल में यह कई बार भावनाओं से बचने का तरीका होता है।
सोच और हकीकत के बीच फर्क समझना क्यों जरूरी है
ओवरथिंकिंग का सबसे बड़ा कारण है- फैक्ट्स और हमारी कल्पनाओं के बीच अंतर न कर पाना। उदाहरण के तौर पर ‘उन्होंने मैसेज नहीं किया’ एक तथ्य है, लेकिन ‘वे मुझसे नाराज हैं’ एक कहानी है जिसे हमारा दिमाग खुद बना लेता है। डॉ. गोल्ड के अनुसार, जब हम रुककर खुद से पूछते हैं कि हमें वास्तव में क्या पता है और हम क्या मान रहे हैं, तो यह मानसिक चक्र टूटने लगता है। यह छोटा-सा अभ्यास दिमाग को फिर से वास्तविकता से जोड़ता है और अनावश्यक चिंता कम करता है।
‘सोचते रहना’ नहीं, ‘सीमित समय तक सोचना’ है समाधान
मैककिनी, टेक्सास स्थित ‘कॉन्शियस कनेक्शन थेरेपी सर्विस’ की फाउंडर और थेरेपिस्ट क्रिस्टा नॉरिस सलाह देती हैं कि सोचने को पूरी तरह रोकने की बजाय उसे एक तय समय तक सीमित करना ज्यादा प्रभावी है। वह कहती हैं कि अपने डर और चिंताओं को सिर्फ 10 मिनट तक लिखने या सोचने के लिए समय दें और फिर उसे रोक दें। उनके अनुसार, जब दिमाग को यह संकेत मिलता है कि उसे सुना जा रहा है, तो वह धीरे-धीरे शांत होने लगता है।
‘क्या होगा अगर…’ की जगह ‘अब मैं क्या कर सकता हं’ पर ध्यान
ओवरथिंकिंग अक्सर भविष्य के डर से जुड़ा होता है, जैसे ‘अगर मैंने गलत फैसला ले लिया तो?’ लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि यह सवाल हमें सिर्फ उलझाता है। क्रिस्टा नॉरिस सुझाव देती हैं कि इसके बजाय खुद से पूछें, ‘अभी मैं क्या छोटा और उपयोगी कदम उठा सकता हूं?’। यह तरीका दिमाग को अनिश्चितता से निकालकर एक्शन मोड में लाता है, जिससे मानसिक जकड़न टूटती है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
हर डिस्ट्रैक्शन मदद नहीं करता, सही विकल्प चुनना जरूरी
डॉ. गोल्ड बताते हैं कि हर तरह की डिस्ट्रैक्शन (ध्यान भटकाना) उपयोगी नहीं होती। अगर कोई गतिविधि उसी चिंता को और बढ़ा दे, जैसे सोशल मीडिया बार-बार चेक करना या ईमेल रिफ्रेश करना, तो यह उल्टा असर डाल सकती है। इसके बजाय ऐसी गतिविधियां बेहतर हैं जो शरीर और इंद्रियों को सक्रिय करें, जैसे टहलना, खाना बनाना या ठंडे पानी से चेहरा धोना। इससे दिमाग को प्राकृतिक रूप से रीसेट होने में मदद मिलती है।
‘परफेक्ट नहीं, बस ठीक-ठाक’ फैसलों की आदत डालना
ओवरथिंकिंग अक्सर इस डर से जुड़ी होती है कि कहीं हम गलत फैसला न ले लें। लेकिन दोनों एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ‘परफेक्शन’ की तलाश ही असली समस्या है। क्रिस्टा नॉरिस के अनुसार, हमें खुद को यह अनुमति देनी चाहिए कि कोई भी निर्णय 100% सही होना जरूरी नहीं है, 70% सही भी काफी है। धीरे-धीरे यह सोच आत्मविश्वास बढ़ाती है और हर छोटी बात पर सोचने की आदत कम करती है।
अनिश्चितता के साथ जीने की आदत कैसे बनती है
डॉ. गोल्ड के अनुसार, जो लोग कम ओवरथिंक करते हैं, वे अनिश्चितता और अनकंफरटेबल इमोशन्स को सीधे स्वीकार करना सीख चुके होते हैं। इसके लिए वह ‘माइक्रो एक्सपोजर’ तकनीक की सलाह देते हैं, जिसमें धीरे-धीरे छोटे-छोटे अनिश्चित हालातों को सहने की आदत डाली जाती है। जैसे किसी मैसेज का तुरंत जवाब न देना या किसी रिजल्ट के लिए बार-बार चेक न करना। इससे दिमाग को यह सीख मिलती है कि असहजता खतरा नहीं है, बल्कि एक सामान्य भावना है जो अपने आप कम हो जाती है।
(डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी विभिन्न एक्सपर्ट्स के विचारों और उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सा, साइकोलॉजिकल या प्रोफेशनल सलाह का विकल्प नहीं है। यदि आपको मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित गंभीर समस्या है, तो कृपया किसी योग्य मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक या चिकित्सक से सलाह अवश्य लें।)
