आज के समय में बच्चों को मोबाइल फोन, लैपटॉप और टीवी जैसी चीजों से दूर नहीं रखा जा सकता है। वर्तमान समय में ऑनलाइन क्लास से लेकर गेमिंग, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले टूल्स तक, बच्चे ऐसी दुनिया में बड़े हो रहे हैं, जहां इंटरनेट उनकी जिंदगी का एक सामान्य हिस्सा बन चुका है। इंटरनेट बच्चों को सीखने, कुछ नया करने और दूसरों से जुड़ने के कई मौके देता है। लेकिन इसके साथ साइबर बुलिंग, ऑनलाइन ठगी, गलत जानकारी, अनुचित कंटेंट और निजी जानकारी के गलत इस्तेमाल जैसे खतरे भी जुड़े हैं। ऐसे में आप इन 10 तरीकों की मदद से आप अपने बच्चे को डिजिटल दुनिया में सुरक्षित रख सकते हैं।
इंडियन एक्सप्रेस ने COP (चाइल्ड ऑनलाइन प्रोटेक्शन) ऐप के संस्थापक संदीप कुमार से डिजिटल दुनिया में बच्चों को कैसे सुरक्षित रखा जाए, इस पर बातचीत की। उनका कहना है कि बच्चों को डिजिटल दुनिया में सुरक्षित रखना अब पेरेंटिंग का एक जरूरी हिस्सा बन गया है और इसकी शुरुआत घर से ही होती है।
1- डिजीटल बातचीत को रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बनाएं
संदीप कुमार के अनुसार, “जब बच्चों की ऑनलाइन जिंदगी को लेकर बातचीत खुलकर, नियमित रूप से और बिना किसी डर या जजमेंट के होती है, तो ऑनलाइन कोई परेशानी आने पर बच्चे मदद मांगने में ज्यादा सहज महसूस करते हैं।” किसी समस्या के होने का इंतजार करने के बजाय माता-पिता को बच्चों से उनके इस्तेमाल किए जाने वाले ऐप्स, पसंदीदा कंटेंट और ऑनलाइन बातचीत करने वाले लोगों के बारे में सामान्य तरीके से पूछना चाहिए। जैसे आप उनसे उनके स्कूल में बीते दिन के बारे में पूछते हैं, उसी तरह उनकी ऑनलाइन गतिविधियों के बारे में भी बात करें।
उनकी इस बात से बेंगलुरू के साक्रा वर्ल्ड हॉस्पिटल की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट शिल्पी सरस्वत भी सहमत हैं। वह कहती हैं, “बच्चों से डिजिटल सुरक्षा के नियमों के बारे में बात करना जरूरी है। उन्हें समझाएं कि कभी भी अपनी निजी जानकारी किसी के साथ साझा न करें, इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए समय तय करें, अपना पासवर्ड किसी को न बताएं, अनजान लोगों से बात न करें और उन्हें अपनी फ्रेंड लिस्ट में शामिल न करें। साथ ही, बच्चों को ऑनलाइन दूसरों के साथ अच्छे और सम्मानजनक तरीके से पेश आना भी सिखाएं।”
2- शुरुआत से ही तय करें नियम
बच्चों में मोबाइल और स्क्रीन के इस्तेमाल की अच्छी आदतें एक दिन में नहीं बनतीं। स्क्रीन टाइम, परिवार के साथ बिना मोबाइल के समय, सोने से पहले डिवाइस के उपयोग और उम्र के हिसाब से कंटेंट देखने जैसे नियम पहले से तय करने से बच्चों को तकनीक का बेहतर तरीके से इस्तेमाल करना सीखने में मदद मिलती है। संदीप कुमार के अनुसार, “नियम तब ज्यादा प्रभावी होते हैं, जब बच्चों को उनका कारण समझाया जाए, उनकी सहमति ली जाए और उन्हें लगातार लागू किया जाए।” इसलिए बिना बातचीत किए बच्चों पर नियम थोपने के बजाय उन्हें नियम तय करने की प्रक्रिया में शामिल करना जरूरी है।
3- सबके सामने डिवाइस करने दें इस्तेमाल
छोटे बच्चों को बंद कमरे में बिना किसी निगरानी के मोबाइल, टैबलेट या कंप्यूटर इस्तेमाल करने की छूट देने से उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखना मुश्किल हो सकता है। संदीप कुमार कहते हैं, बच्चों को घर के सदस्यों के सामने मोबाइल, टैबलेट या कंप्यूटर का इस्तेमाल करने दें। उनके अनुसार, “इस छोटी सी आदत से बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर आसानी से नजर रखी जा सकती है। इससे पारदर्शिता बढ़ती है और बच्चों को महसूस नहीं होता कि उन पर हर समय नजर रखी जा रही है।”
4- निजी जानकारी की सुरक्षा के बारे में सिखाएं
कई बच्चों को यह पता नहीं होता कि इंटरनेट पर उनकी निजी जानकारी का गलत इस्तेमाल कितनी आसानी से किया जा सकता है। कुमार कहते हैं, “बच्चों को समझाना चाहिए कि उनकी लोकेशन, स्कूल की जानकारी, पासवर्ड, फोटो और फोन नंबर जैसी निजी जानकारी ऑनलाइन किसी के साथ भी आसानी से शेयर नहीं करनी चाहिए।” बच्चों को कम उम्र से ही इन खतरों के बारे में समझाने से वे आगे चलकर इंटरनेट पर ज्यादा सुरक्षित फैसले ले पाएंगे।
वहीं, मनोवैज्ञानिक शिल्पी सरस्वत भी कहती हैं कि “डिजिटल सुरक्षा और डिजिटल डिटॉक्स को भी रोजमर्रा की पेरेंटिंग का हिस्सा बनाना चाहिए, जैसे हम बच्चों की दूसरी तरह की सुरक्षा का ध्यान रखते हैं।”
5- इस्तेमाल होने वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म की जानकारी रखें
माता-पिता को इंटरनेट की हर नई चीज या ट्रेंड के बारे में जानना जरूरी नहीं है और न ही उन्हें टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट बनने की जरूरत है। लेकिन बच्चों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ऐप्स, गेम्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के बारे में सामान्य जानकारी रखना काफी मददगार हो सकता है। संदीप कुमार के अनुसार, “इन प्लेटफॉर्म के काम करने के तरीके को समझने से माता-पिता बच्चों से इनके फायदे, खतरों और प्राइवेसी सेटिंग्स के बारे में बेहतर तरीके से बात कर सकते हैं।”
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6- डिजिटल समझ भी दें
डिजिटल एक्सपर्ट के अनुसार, “इंटरनेट बच्चों के लिए सीखने और आगे बढ़ने के कई शानदार मौके देता है, लेकिन इसके साथ गलत जानकारी, ऑनलाइन ठगी, AI से तैयार कंटेंट और लोगों द्वारा ऑनलाइन प्रभावित किए जाने जैसे खतरे भी मौजूद हैं।” संदीप कुमार के अनुसार, बच्चों को इंटरनेट पर दिखने वाली हर जानकारी पर तुरंत भरोसा करने के बजाय उसे “सवाल करना, जांचना और सोच-समझकर फैसला करना” सिखाना चाहिए। यह बच्चों को आत्मविश्वास के साथ इंटरनेट का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने में मदद करेगा।
7- बच्चों के व्यवहार में होने वाले बदलावों पर ध्यान दें
संदीप कुमार कहते हैं कि, “अगर बच्चा अचानक बातें छिपाने लगे, उसकी नींद खराब होने लगे, मोबाइल या दूसरे डिवाइस से दूर होने पर परेशान रहने लगे, पढ़ाई में मन न या खराब प्रदर्शन होने लगे या परिवार के साथ बातचीत कम कर दे, तो यह डिजिटल आदतों या ऑनलाइन किसी नकारात्मक अनुभव का संकेत हो सकता है।” ऐसे बदलावों पर तुरंत बच्चे को सजा देने के बजाय उससे बातचीत करनी चाहिए। इन संकेतों को बच्चे से बात शुरू करने का एक मौका समझें, न कि तुरंत सजा देने का कारण।
8- टेक्नोलॉजी को विकल्प नहीं, पेरेंटिंग का सहारा बनाएं
पैरेंटल कंट्रोल टूल्स स्क्रीन टाइम को सीमित करने, गलत कंटेंट को फिल्टर करने और बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखने में मदद कर सकते हैं। लेकिन संदीप कुमार पेरेंट्स को सावधान करते हुए कहते हैं, “टेक्नोलॉजी तभी सबसे ज्यादा प्रभावी होती है, जब वह माता-पिता के भरोसे, बातचीत और उनकी सक्रिय भागीदारी में मदद करे, उनकी जगह न ले।” यानी कोई भी ऐप माता-पिता की देखभाल और बातचीत की जगह नहीं ले सकता।
9- बच्चों के सामने खुद भी अच्छी डिजिटल आदतें अपनाएं
बच्चे अक्सर वही करते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं। इसलिए माता-पिता का संतुलित तरीके से स्क्रीन इस्तेमाल करना, परिवार के साथ बिना मोबाइल के समय बिताना और अपनी डिजिटल आदतों का ध्यान रखना बच्चों पर लंबे समय तक असर डाल सकता है। कुमार के अनुसार, “बच्चे जितना बातों से सीखते हैं, उतना ही देखकर भी सीखते हैं।”
10- माहौल ऐसा हो कि बच्चे मदद मांगने से न डरें
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए सबसे जरूरी चीज हमेशा कोई टेक्नोलॉजी नहीं होती, बल्कि माता-पिता पर उनका भरोसा होता है। बच्चों को यह भरोसा होना चाहिए कि ऑनलाइन किसी असहज या परेशान करने वाले अनुभव के बारे में बताने पर उन्हें डांट या तुरंत सजा नहीं मिलेगी। संदीप कुमार बताते हैं, “जब बच्चों को पता होता है कि उनकी बात सुनी जाएगी और उन्हें मदद मिलेगी, तो वे किसी छोटी परेशानी के गंभीर समस्या बनने से पहले ही मदद मांगने की ज्यादा संभावना रखते हैं।”
मनोवैज्ञानिक शिल्पी सरस्वत का सुझाव है कि बच्चों को “भावनाओं को संभालने की तकनीकों” के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए
बच्चों की डिजिटल दुनिया लगातार बदल रही है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि लक्ष्य बच्चों को टेक्नोलॉजी से दूर रखना नहीं, बल्कि उन्हें इसका सुरक्षित और जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने के लिए तैयार करना होना चाहिए। खुलकर बातचीत, सही डिजिटल नियम, इंटरनेट की समझ और माता-पिता की सक्रिय भागीदारी से बच्चों को ऑनलाइन दुनिया का सुरक्षित और आत्मविश्वास के साथ इस्तेमाल करने में काफी मदद मिल सकती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और इंडियन एकसप्रेस द्वारा बात किए गए विशेषज्ञों से मिली जानकारी पर आधारित है।
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