हरिद्वार जिला उपभोक्ता आयोग ने एक निजी बैंक को सेवा में कमी (Deficiency in Service) का दोषी ठहराया है। आयोग ने उस व्यक्ति को 45000 रुपये लौटाने का आदेश दिया है जिसका पैसा गलती से दूसरे खाते में ट्रांसफर हो गया था और समय पर सूचना देने के बावजूद बैंक उसे वापस नहीं दिला सका।

आयोग की बेंच में अध्यक्ष गगन कुमार गुप्ता और सदस्य अमरेश रावत तथा रंजना गोयल शामिल थे। बेंच ने बैंक को मानसिक पीड़ा के लिए 10000 रुपये और मुकदमे के खर्च के रूप में 10000 रुपये अतिरिक्त देने का भी निर्देश दिया।

उपभोक्ता आयोग ने 21 जुलाई के अपने आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता ने पर्याप्त जानकारी के साथ बैंक को तुरंत सूचना दे दी थी कि 45000 रुपये गलती से किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में चले गए हैं।

बैंक ने क्या था शिकायतकर्ता को आश्वासन

आयोग के अनुसार, बैंक ने शिकायतकर्ता को आश्वासन दिया था कि दो से चार दिनों के भीतर संबंधित खाते से राशि वापस लेकर उसे जानकारी दी जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा कई बार संपर्क करने के बावजूद बैंक सिर्फ आश्वासन देता रहा और रकम वापस नहीं कराई गई।

आयोग ने कहा कि राशि वापस न दिला पाना बैंक की सेवा में स्पष्ट कमी (Deficiency in Service) को दिखाता है। इसलिए बैंक को शिकायतकर्ता को पूरी राशि लौटाने के साथ-साथ मुआवजा और मुकदमे का खर्च भी देना होगा।

आयोग ने अपने आदेश में यह भी कहा कि इस मामले में यह बताना जरूरी है कि विपक्षी पक्षों (बैंक) को कई बार मौका दिए जाने के बावजूद उन्होंने किसी भी स्टेज पर अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं किया। इसके चलते आयोग ने उनके खिलाफ शिकायत की सुनवाई एकपक्षीय (Ex Parte) रूप से आगे बढ़ाई।

आयोग ने कहा, ”ऐसी स्थिति में शिकायतकर्ता की शिकायत, पेश किए गए दस्तावेज और शपथपत्र का रिकॉर्ड पर कोई खंडन नहीं हुआ। उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि विपक्षी पक्षों द्वारा शिकायकर्ता के खाते में संबंधित राशि वापस ना करना उपभोक्ता सेवा में कमी (Deficiency in Consumer Service) का स्पष्ट मामला है।”

गलत अकाउंट में चले गए 45000 रुपये

शिकायतकर्ता रुड़की के सिविल लाइंस स्थित निजी बैंक की शाखा का ग्राहक था। 10 जनवरी 2019 को उसने मोबाइल नेट बैंकिंग के जरिए अपने एक परिचित के खाते में 45000 रुपये ट्रांसफर करने की कोशिश की। लेकिन कथित तौर पर एक गलती के कारण यह रकम किसी अन्य व्यक्ति के बैंक खाते में चली गई।

शिकायतकर्ता का कहना था कि उसने गलत ट्रांसफर की जानकारी तुरंत बैंक को दे दी थी। बैंक ने भरोसा दिलाया कि कुछ दिनों के भीतर संबंधित खाते से रकम वापस दिला दी जाएगी। लेकिन बार-बार आश्वासन देने के बावजूद पैसा वापस नहीं मिला।

उसने आरोप लगाया कि बैंक ने यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए कि जिस व्यक्ति के खाते में गलती से पैसे पहुंचे हैं, वह उन्हें निकाल न सके।

जब बैंक ने समस्या का समाधान नहीं किया तो शिकायतकर्ता ने 19 मार्च 2019 को बैंक को कानूनी नोटिस भेजा। इसके बाद उसने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दायर कर 45000 रुपये वापस करने और 15000 रुपये मुकदमे के खर्च व अन्य राहत की मांग की।

बैंक ने आयोग में शिकायत का कोई जवाब या पक्ष पेश नहीं किया जिसके बाद मामले की सुनवाई एकपक्षीय (Ex Parte) रूप से आगे बढ़ाई गई।

बैंक के आश्वासन के बावजूद रकम वापस नहीं मिली

आयोग ने पाया कि शिकायतकर्ता के खाते से 45000 रुपये गलती से किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में ट्रांसफर हो गए थे। बैंक ने भी कानूनी नोटिस के जवाब में इस ट्रांजैक्शन के होने की पुष्टि की थी।

आयोग ने कहा कि शिकायतकर्ता ने 10 जनवरी 2019 को ही बैंक को इस गलत ट्रांसफर की जानकारी दे दी थी। हालांकि बैंक शिकायतकर्ता के इस दावे का खंडन करने वाला कोई दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं कर सका।

आयोग ने यह भी माना कि बैंक ने शिकायतकर्ता को आश्वासन दिया था कि कुछ दिनों के भीतर संबंधित व्यक्ति के खाते से रकम वापस ले ली जाएगी। लेकिन शिकायतकर्ता द्वारा कई बार संपर्क करने के बावजूद 45000 रुपये ना तो वापस वसूले गए और ना ही उसके खाते में लौटाए गए।

आयोग ने कहा कि यह मामला स्पष्ट रूप से उपभोक्ता सेवा में कमी (Deficiency in Service) का है।

फैसले का क्या है महत्व?

यह फैसला इस बात को मजबूत करता है कि अगर किसी ग्राहक के पैसे गलती से दूसरे खाते में चले जाएं और समय पर सूचना मिलने के बावजूद बैंक उचित कार्रवाई नहीं करता तो उसे ‘सेवा में कमी’ का दोषी ठहराया जा सकता है।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ बार-बार आश्वासन देना बैंक की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता खासकर तब जब वह अपने दावों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य पेश न कर सके।

ऐसी स्थिति का सामना करने वाले उपभोक्ता अपने राज्य की उपभोक्ता हेल्पलाइन या राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (1915) पर शिकायत दर्ज कर सहायता प्राप्त कर सकते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ जांच समिति की रिपोर्ट बुधवार को संसद के दोनों सदनों में पेश की गई। तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपने के कई महीनों बाद इसे संसद के पटल पर रखा। रिपोर्ट लोकसभा और राज्यसभा में संबंधित महासचिवों ने पेश की। दो खंडों में तैयार इस रिपोर्ट में जांच के दौरान जुटाए गए मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य शामिल हैं।