सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए गुरुवार को कहा कि मौजूदा व्यवस्था में सरकार अपनी पसंद के व्यक्ति को नियुक्त कर सकती है। कोर्ट ने कहा कि चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल होते हैं, लेकिन तीन में से दो सदस्य सरकार के पक्ष में होते हैं। कोर्ट ने सरकार से पूछा कि नियुक्ति प्रक्रिया में स्वतंत्रता का दिखावा क्यों किया जा रहा है। साथ ही सुझाव दिया कि केंद्रीय मंत्री की जगह किसी स्वतंत्र व्यक्ति को चयन समिति में शामिल किया जाना चाहिए।
शीर्ष अदालत के पहले दिए गए निर्देश का हवाला देते हुए, जिसमें चयन समिति में प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और विपक्ष के नेता को शामिल करने की बात कही गई थी। जस्टिस दीपांकर गुप्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि सीजेआई ही इस प्रक्रिया का हिस्सा हों, लेकिन समिति में किसी स्वतंत्र व्यक्ति का होना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो विपक्ष के नेता की मौजूदगी केवल औपचारिक बनकर रह जाएगी।
पीठ ने यह भी कहा कि जब सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रधानमंत्री, सीजेआई और विपक्ष के नेता वाली स्वतंत्र समिति के जरिए होती है, तो मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में भी ऐसा क्यों नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण संस्था है, क्योंकि यह देश में लोकतंत्र को बनाए रखने और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने का काम करती है।
हालांकि, अटॉर्नी जनरल के. वेंकटरमणी ने दलील दी कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की निष्पक्षता और स्वतंत्रता उनकी नियुक्ति के बाद उनके कार्य करने के तरीके से तय होती है, लेकिन पीठ ने इस तर्क से असहमति जताई। अदालत ने कहा कि निष्पक्षता की शुरुआत नियुक्ति प्रक्रिया से ही होती है। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग को न केवल निष्पक्ष रूप से कार्य करना चाहिए बल्कि निष्पक्ष दिखना भी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह नियुक्ति जल्दबाजी में की गई प्रतीत होती है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने चयन समिति की संरचना पर भी कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा, “कैबिनेट के किसी मंत्री को चयन समिति का हिस्सा क्यों बनाया जाना चाहिए? मान लीजिए सत्तारूढ़ दल के 300 सांसद हैं और प्रधानमंत्री उनमें से अपने 25 सबसे भरोसेमंद सांसद चुनते हैं। फिर उन्हीं 25 में से एक को समिति में शामिल कर माइक्रोमैनेज क्यों किया जाता है? फिर विपक्ष के नेता को शामिल करने का क्या मतलब रह जाता है? उनकी भूमिका केवल औपचारिक बनकर रह जाती है। कोई मंत्री प्रधानमंत्री के खिलाफ नहीं जाएगा। फैसला हमेशा 2:1 के अनुपात में होगा। फिर इस संस्था की स्वतंत्रता का दिखावा क्यों किया जा रहा है?”
अदालत उस कानून की वैधता की जांच कर रही है, जिसे सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के बाद बनाया गया था जिसमें यह कहा गया था कि इस प्रक्रिया में स्वतंत्रता लाने के लिए नियुक्तियां प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता के एक पैनल द्वारा की जानी चाहिए।
2024 में चुनाव आयुक्तों के रूप में ज्ञानेश कुमार (जो अब मुख्य चुनाव आयुक्त हैं) और एस. एस. संधू की खोज, चयन और नियुक्ति से जुड़ी प्रक्रिया अदालत की जांच के दायरे में आने के बाद पीठ ने केंद्र सरकार से इस संबंध में मूल रिकॉर्ड पेश करने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति करने वाली समिति में मुख्य न्यायाधीश शामिल होते हैं। अदालत ने कहा कि सीबीआई की तुलना में चुनाव आयुक्त की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह लोकतंत्र को बनाए रखने से जुड़ी संस्था का हिस्सा है। पीठ ने कहा, “हम यह नहीं कह रहे कि CJI को ही शामिल किया जाए, लेकिन कोई स्वतंत्र सदस्य क्यों नहीं होना चाहिए? वह मंत्रालय से ही क्यों होना चाहिए?”
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी चीफ ममता बनर्जी गुरुवार को पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हुई हिंसा को लेकर दायर एक याचिका के संदर्भ में कलकत्ता हाई कोर्ट में पेश हुईं। इस दौरान उन्होंने भाजपा सरकार पर बंगाल के लोगों की रक्षा करने पर विफल रहने का आरोप लगाया। पढ़ें पूरी खबर।
