सुप्रीम कोर्ट न्यूज: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐसे आरोपी को मिली जमानत कैंसिल कर दी, जिस पर कई राज्यों में नकली लॉ डिग्री रैकेट में शामिल होने का आरोप है। कोर्ट ने उसको अपनी नई जमानत अर्जी में पूरी और सही जानकारी देने के लिए कड़े निर्देश जारी किए। जेबा खान की ओर से दायर इस आपराधिक केस की सुनवाई जस्टिस आर. महादेवन कर रहे हैं। उन्होंने अपने जेठ मजहर खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत के खिलाफ अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 फरवरी को कहा कि, “मजहर खान के खिलाफ आरोप केवल किसी एक फर्जी डिग्री तक सीमित नहीं हैं। यह एक संगठित और योजनाबद्ध गतिविधि का हिस्सा है जिसमें फर्जी शैक्षणिक योग्यताओं, विशेषकर कानून की डिग्री, का निर्माण, प्राप्ति और इस्तेमाल करना शामिल है। इसका सीधा असर कानूनी पेशे की ईमानदारी और न्याय प्रणाली पर पड़ता है।”
आपराधिक इतिहास छिपाना
इस मामले में सबसे चिंता का विषय यह था कि मजहर खान ने हाईकोर्ट के सामने अपना आपराधिक इतिहास छिपाया था। उसने दावा किया था कि उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, सिवाय वर्तमान एफआईआर के। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की गलत और अधूरी जानकारी जमानत देने के फैसले को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि जमानत मिलने के बाद भी उनके खिलाफ “स्टॉकिंग और डराने-धमकाने” के आरोप हैं।
22 सितंबर 2025 को कोर्ट ने मजहर खान को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि अगर वह अपीलकर्ता को डराने या दबाव डालने की कोशिश करेंगे, तो सख्त कार्रवाई होगी।
कोर्ट ने कहा कि चाहे मामला पारिवारिक या संपत्ति विवाद का क्यों न हो, फर्जी वकील बनकर कोर्ट में पेश होने की गंभीरता कम नहीं होती। कोर्ट में फर्जी प्रमाणपत्र का इस्तेमाल केवल निजी विवाद तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसका सार्वजनिक और संस्थागत असर भी होता है।
मामले का संक्षिप्त विवरण
रिकॉर्ड से पता चला कि मजहर खान के खिलाफ अब तक 9 एफआईआर दर्ज हैं। इनमें धोखाधड़ी, फर्जीवाड़ा, आपराधिक धमकी, दंगे और अन्य अपराध शामिल हैं। कुछ केस 2011 तक के हैं। फिर भी हाईकोर्ट में अपनी जमानत याचिका में उन्होंने खुद को लगभग “बिना किसी आपराधिक इतिहास वाला” प्रस्तुत किया। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए जमानत रद्द कर दी।
जमानत याचिका में खुलासा करना अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कुछ लोग जमानत पाने के लिए महत्वपूर्ण तथ्य छिपा देते हैं। इसे रोकने के लिए कोर्ट ने कुछ नियम बनाए:
- हर जमानत याचिकाकर्ता को अपना पूरा आपराधिक इतिहास बताना होगा।
- सभी लंबित एफआईआर और आपराधिक मामले उजागर करने होंगे।
- अगर कोई गैर-जमानती वारंट या अन्य कानूनी कार्रवाई चल रही हो, तो इसकी जानकारी भी देनी होगी।
- पहले की जमानत याचिकाओं और उनके परिणाम बताने होंगे।
- यह सब शपथ-पत्र (Affidavit) के साथ होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई तथ्य छुपाता है तो यह न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
कानून की प्रणाली की ईमानदारी
कोर्ट ने कहा कि अगर जमानत आदेश में कोई त्रुटि है, कानून का उल्लंघन है, या अपराध की गंभीरता, समाज पर असर या आपराधिक इतिहास जैसी चीजों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप सही है।
जमानत का अधिकार स्वतंत्र है, लेकिन यह न्यायिक अनुशासन और अपीलीय निरीक्षण के अधीन है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन अगर जमानत आदेश असंगत, अवैध या अन्यायपूर्ण है, तो इसे रद्द करना न्यायिक जिम्मेदारी है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत देने की स्वतंत्रता असीमित नहीं है। इसे निर्धारित कानूनी मानकों के अनुसार ही प्रयोग किया जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि: संगठित शैक्षणिक धोखाधड़ी
मामला 23 अगस्त 2024 को सराय ख्वाजा पुलिस स्टेशन, जौनपुर, उत्तर प्रदेश में दर्ज एफआईआर से शुरू हुआ। शिकायतकर्ता ने कहा कि एक संगठित गिरोह फर्जी शैक्षणिक डिग्रियां, विशेषकर कानून की डिग्री, बनाकर बेच रहा है।
कहा गया कि मजहर खान ने दावा किया कि उसने सर्वोदय ग्रुप ऑफ इंस्टिट्यूशन्स, जो वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर से संबद्ध था, से LLB की डिग्री हासिल की।
लेकिन विश्वविद्यालय ने 10 अगस्त 2024 को अधिकारियों को लिखा कि यह संस्थान उनके साथ संबद्ध नहीं है और उन्होंने कोई ऐसा मार्कशीट जारी नहीं किया। सर्वोदय विद्यापीठ महाविद्यालय ने भी पुष्टि की कि उन्होंने कोई LLB पाठ्यक्रम नहीं कराया।
अभियोजन ने आरोप लगाया कि मजहर खान ने सिर्फ खुद को वकील के रूप में प्रस्तुत करने के लिए ही फर्जी डिग्री इस्तेमाल नहीं की, बल्कि दूसरों को भी फर्जी डिग्री दिलाने में मदद की।
गिरफ्तारी, जमानत और अपील
मजहर खान को 28 अप्रैल 2025 को गिरफ्तार किया गया। जौनपुर सत्र न्यायालय ने 12 मई 2025 को उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी।
इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 जुलाई 2025 को जमानत दे दी। शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, कहा कि हाईकोर्ट को गलत जानकारी दी गई और महत्वपूर्ण तथ्य नजरअंदाज किए गए।
जमानत कानून: रद्द करना बनाम निरस्त करना
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत रद्द करने और जमानत आदेश को शुरू से ही निरस्त करने के बीच अंतर स्पष्ट किया।
कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ यह देखने के लिए नहीं था कि मजहर खान ने जमानत मिलने के बाद स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया या नहीं। बल्कि हाईकोर्ट के आदेश की कानूनी सटीकता और सही विचार प्रक्रिया पर ध्यान दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने ऑनलाइन मार्कशीट प्रिंटआउट जैसे दस्तावेजों पर भरोसा किया, जिसकी विश्वसनीयता विवादित थी। साथ ही विश्वविद्यालय और संस्थान के आधिकारिक पत्राचार को नजरअंदाज किया गया। ऐसे हालात में जमानत आदेश सही नहीं ठहर सकता।
जांच का हस्तांतरण नहीं
शिकायतकर्ता ने जांच को विशेष एजेंसी को देने की भी मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए इसे अस्वीकार कर दिया कि जांच पहले ही पूरी हो चुकी थी, चार्जशीट दाखिल हो चुकी थी और ट्रायल कोर्ट ने 26 मई 2025 को मामले की सुनवाई शुरू कर दी थी। कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद जांच का हस्तांतरण केवल विशेष परिस्थितियों में ही संभव है, जैसे पक्षपात या उच्च अधिकारी की संलिप्तता, जो यहां साबित नहीं हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत देने में पूरी ईमानदारी और सच्चाई जरूरी है। किसी भी तथ्य को छुपाना या धोखाधड़ी करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। मजहर खान का मामला यह दिखाता है कि कैसे फर्जी शैक्षणिक डिग्री और गलत तरीके से जमानत प्राप्त करना न्याय व्यवस्था की साख पर असर डाल सकता है। कोर्ट ने न केवल जमानत रद्द की, बल्कि भविष्य में जमानत याचिकाओं में संपूर्ण खुलासा और सत्यापन अनिवार्य करने के दिशा-निर्देश भी जारी किए। यह कदम न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और कानूनी पेशे की ईमानदारी सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
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