कोलकाता के टॉलीगंज इलाके में वक्फ संपत्ति पर कथित रूप से बने अवैध भवन को लेकर रविवार को बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला। कलकत्ता हाई कोर्ट ने बुलडोजर कार्रवाई शुरू होने से ठीक पहले इमारत के निवासियों को अंतरिम राहत देते हुए ध्वस्तीकरण पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी।

इससे पहले सुबह ही बुलडोजर मौके पर पहुंच चुके थे और कार्रवाई के विरोध में स्थानीय लोग सड़कों पर उतर आए थे। किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए पुलिस, केंद्रीय बल, कोलकाता नगर निगम और बिजली विभाग के अधिकारी भी मौके पर तैनात किए गए थे।

ध्वस्तीकरण की आशंका के बीच एक प्रभावित निवासी ने कहा कि हमें रातों-रात मकान खाली करने के लिए कहा गया था। अब हम जाएं तो जाएं कहां? हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद फिलहाल निवासियों को राहत मिल गई है।

कुमार साहा नाम के एक व्यक्ति ने दावा किया कि जब वह ध्वस्त किए जाने वाले परिसर का जायजा लेने इलाके में गए तो स्थानीय लोगों ने उन पर हमला किया और उनका पीछा किया। उन्होंने मीडियाकर्मियों से कहा कि यह वक्फ की संपत्ति है और वे यहां अवैध रूप से रह रहे हैं। पहले यह टीएमसी का पार्टी कार्यालय था। स्थानीय लोगों ने मुझ पर बुरी तरह हमला किया। हालांकि, इस प्रकाशन द्वारा उक्त परिसर या किसी सरकारी एजेंसी से उनके संबंध की पुष्टि नहीं की जा सकी। कलकत्ता उच्च न्यायालय के जज राजा बसु चौधरी की अध्यक्षता वाली एकल पीठ ने विध्वंस के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की।

याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करते हुए अधिवक्ता जोहेब रऊफ ने कहा कि उन्होंने पहले सतीश मुखर्जी रोड पर स्थित परिसर संख्या 51/1ए और 51/1बी को खाली कराने और ध्वस्त करने के संबंध में नगर पालिका अधिकारियों द्वारा जारी किए गए कारण बताओ नोटिस को अदालत में एक रिट याचिका दायर करके चुनौती दी थी, और मामला लंबित था।

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उक्त कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान, नगर निगम के अधिकारियों ने शनिवार को परिसर का दौरा किया और कोलकाता नगर निगम अधिनियम, 1980 की धारा 544 और 546 के तहत विध्वंस नोटिस चिपकाया।

उक्त नोटिस के अनुसार, निवासियों को सूचित किया गया था कि विध्वंस कार्य रविवार को सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे के बीच किया जाएगा। राज्य की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि प्रशासन नगरपालिका अधिकारियों द्वारा जारी किए गए अनुरोध का पालन कर रहा था।

सभी पक्षों की बात सुनने के बाद हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता का दावा है कि उसे आदेश की जानकारी तभी हुई जब नोटिस को परिसर की बाहरी दीवार पर चिपकाया गया था। उपरोक्त को ध्यान में रखते हुए, मेरा यह मत है कि नगर पालिका अधिकारियों को आदेश पारित होने की तिथि से 30 दिनों की अवधि तक विध्वंस आदेश पर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। चूंकि याचिकाकर्ता अब आदेश से अवगत है, इसलिए याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार उपलब्ध सभी कदम उठाने की स्वतंत्रता होगी। यह स्पष्ट किया जाता है कि इस न्यायालय ने केएमसी के विशेष अधिकारी (भवन) द्वारा पारित आदेश के गुण-दोष पर विचार नहीं किया है और जब भी इसकी जांच की जाएगी, संबंधित प्राधिकारी इसके दायरे और प्रभाव पर विचार करने के लिए स्वतंत्र होगा।

झारखंड सिविल सेवा परीक्षा में धांधली का मामला: CBI जांच की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट झारखंड संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में कथित धांधली की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराने की मांग वाली याचिका पर सोमवार को सुनवाई करेगा। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत के माध्यम से कार्यकर्ता हरिशरण देवगण द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर सकती है। पढ़ें पूरी खबर।