गुजरात की वडोदरा की एक स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने गुरुवार को अक्टूबर, 2024 में नवरात्रि उत्सव के दौरान 16 वर्षीय लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मामले में पांच लोगों को दोषी ठहराया है। इस घटना के बाद बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुआ था। हालांकि, घटना के दो साल से भी कम वक्त में इस मुकदमे का (20 अगस्त) समापन हो गया।
गुरुवार को जिला सरकारी वकील अनिल देसाई ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि सूरत के नयन सुखाडवाला और वडोदरा के वरिष्ठ अधिवक्ता शैलेश पटेल सहित अभियोजकों की एक विशेष टीम ने पुलिस के मामले को सफलतापूर्वक साबित कर दिया है।
देसाई ने कहा, “हम पुलिस केस को संदेह से परे साबित करने में सफल रहे। पुलिस द्वारा फोरेंसिक विशेषज्ञों की मदद से जुटाए गए वैज्ञानिक साक्ष्य, जिनमें पीड़िता के गरबा परिधान पर आरोपी के शरीर के तरल पदार्थों (Body Fluids) के नमूने भी शामिल थे। जिसने दोष सिद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आरोप पत्र दाखिल करने से लेकर मुकदमे के अंत तक, मामला पूरी तरह मजबूत था।”
यह घटना नवरात्रि के दूसरे दिन यानी 4 अक्टूबर 2024 को हुई। जिसके बाद पुलिस ने दो सप्ताह के अंदर 6,000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी। देसाई ने कहा कि अदालत 25 अगस्त को सजा पर दलीलें सुनेगी। वरिष्ठ अधिवक्ता पटेल ने कहा कि इस घटना में अज्ञात लोग शामिल थे। अपराध स्थल सुनसान था। जहां सीसीटीवी की कोई सुविधा नहीं थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता पटेल ने कहा, “यह जांच आसान नहीं थी। पुलिस के पास शुरुआत में कोई सुराग नहीं था और जांच लगभग अंधेरे में चल रही थी, लेकिन जिला पुलिस और क्राइम ब्रांच ने अपने सभी संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए महत्वपूर्ण सुराग जुटाए। आरोपियों का पता लगाने के बाद हमने अदालत में 315 दस्तावेजी और भौतिक साक्ष्य पेश किए, जिन्होंने इस मामले को साबित करने में निर्णायक भूमिका निभाई।”
सूरत में कई हाई-प्रोफाइल आपराधिक मामलों को संभाल चुके सुखड़वाला (Sukhadwala) ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के समर्थन में मौजूद सबूत घटनाओं के क्रम को स्थापित करने में एक महत्वपूर्ण कड़ी थे।
उन्होंने कहा कि आरोपी ने पीड़ित का मोबाइव फोन छीनकर मगरमच्छों से भरी विश्वामित्री नदी में फेंक दिया था, लेकिन पुलिस और दमकल टीम ने फोन की तलाश में काफी समय लगाया। अदालत ने पुलिस, दमकल अधिकारियों और पीड़ित की जांच करने वाले डॉक्टरों के बयानों को स्वीकार कर लिया है।
‘आरोपी अपराध करने के इरादे से बाहर गया था’
इस मामले ने घटना के तुरंत बाद काफी ध्यान आकर्षित किया था। जांचकर्ताओं ने स्थानीय अदालत को बताया था कि पांचों आरोपी, जिन्होंने दावा किया था कि वे 4 अक्टूबर की रात को केवल “गरबा देखने” के लिए बाहर गए थे। संभवतः अपराध करने के इरादे से एक साथ निकले थे।
अपराध स्थल के पुनर्निर्माण (Reconstruction) के बाद वडोदरा ग्रामीण पुलिस ने अदालत को बताया था कि जांचकर्ताओं को उस रात आरोपियों द्वारा लिए गए मार्ग पर कोई गरबा स्थल नहीं मिला था।
पुलिस ने अपने रिमांड आवेदन में कहा था, “इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आरोपी अपराध करने के इरादे से एक साथ बाहर निकले थे। साथ ही यह भी कहा था कि जिस तरीके से कथित तौर पर अपराध किया गया था, उससे यह जांच करना जरूरी हो जाता है कि क्या ये लोग अतीत में भी इसी तरह के अपराधों में शामिल रहे होंगे।
घटना के कुछ दिनों बाद पांचों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया और शुरू में उन्हें पुलिस हिरासत में भेज दिया गया। बाद में जांचकर्ताओं ने हिरासत की अवधि बढ़ाने का अनुरोध किया। अदालत को बताया कि आरोपियों ने असहयोग किया है और जांच को गुमराह करने की कोशिश की।
पुलिस ने कहा था कि प्रारंभिक रिमांड अवधि (Initial Remand Period) का एक बड़ा हिस्सा चिकित्सा प्रक्रियाओं को पूरा करने में गुजरा। जिसमें आरोपी से वीर्य के नमूने एकत्र (Semen Samples) करना भी शामिल था।
जांचकर्ता पीड़िता के मोबाइल फोन की बरामदगी की भी कोशिश की थी। जिसके बारे में आरोपियों ने कथित तौर पर दावा किया था कि उसे वडसार के पास विश्वमित्री नदी में फेंक दिया गया था।
पुलिस ने फोन की तलाश के लिए वडोदरा अग्निशमन विभाग की सहायता मांगी थी। साथ ही अदालत को यह भी बताया था कि आरोपी फोन के निपटान के बारे में जांचकर्ताओं को गुमराह कर रहे होंगे और आपस में जिम्मेदारी से बच रहे होंगे।
सुनवाई के दौरान जनता में भारी आक्रोश देखने को मिला। आरोपियों के साथ अदालत में पेशी के दौरान वकीलों के एक समूह द्वारा कथित तौर पर मारपीट किए जाने के बाद कानून-व्यवस्था बनाए रखने के एहतियाती उपाय के तौर पर अगली सुनवाई को संवेदनशील गवाहों के लिए निर्धारित एक कक्ष में स्थानांतरित कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने नई दिल्ली के जंतर-मंतर और देश भर के अन्य स्थानों पर हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा के आरोपों की स्वतंत्र रूप से जांच करने के लिए पांच सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति (HPEC) का गठन किया है। कमेटी को पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक और असंगत बल प्रयोग के आरोपों के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों द्वारा सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ हिंसा के कथित प्रयोग और चोटों की जांच करने के लिए कहा गया है। पढ़ें पूरी खबर।
