केंद्र सरकार ने गुरुवार को संसद को बताया कि 2021 से जनवरी 2026 के बीच देश के हाई कोर्ट में कुल 593 जज नियुक्त किए गए। इनमें से बहुत कम जज अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं।
राज्यसभा में डीएमके सांसद पी. विल्सन के सवाल के लिखित जवाब में केंद्रीय कानून एवं संसदीय कार्य राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि इस अवधि में नियुक्त 593 जजों में से केवल 26 अनुसूचित जाति से, 14 अनुसूचित जनजाति से और 80 अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं। इसके अलावा 37 जज अल्पसंख्यक वर्ग से संबंधित हैं।
मंत्री ने यह भी जानकारी दी कि इसी अवधि के दौरान देश के अलग-अलग हाई कोर्ट में 96 महिलाओं को जज के रूप में नियुक्त किया गया। यह आंकड़े न्यायपालिका में सामाजिक और लैंगिक प्रतिनिधित्व को लेकर बहस को फिर से सामने लाते हैं।
जिम्मेदारी को न्यायपालिका की ओर संकेत करते हुए मंत्री ने कहा कि प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति की पहल कौन करेगा, यह पहले से तय है। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति का प्रस्ताव भारत के सीजेआई शुरू करते हैं, जबकि उहाई कोर्ट में यह जिम्मेदारी संबंधित हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की होती है।
हालांकि, उन्होंने आगे कहा कि सरकार न्यायपालिका में सामाजिक विविधता बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार लगातार उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से आग्रह करती रही है कि जजों की नियुक्ति के लिए नाम भेजते समय अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं से जुड़े योग्य उम्मीदवारों पर भी गंभीरता से विचार किया जाए, ताकि न्यायपालिका में बेहतर सामाजिक संतुलन बन सके।
मंत्री के इस जवाब पर प्रतिक्रिया देते हुए डीएमके नेता पी. विल्सन ने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों का प्रतिनिधित्व बहुत कम होना हैरान करने वाला है। विल्सन पहले अगस्त 2012 से मई 2014 तक भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के रूप में भी काम कर चुके हैं।
डीएमके नेता पी. विल्सन ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “हमारे संविधान के 76वें वर्ष में प्रवेश करते हुए, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संरचना में चिंताजनक रुझान बने हुए हैं, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व घट रहा है। उच्च न्यायालयों में विविधता की उल्लेखनीय कमी है, जो भारत के अद्भुत रूप से विविध और बहुलवादी समाज को प्रतिबिंबित नहीं करती है। कई सामाजिक समूह उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में कम प्रतिनिधित्व रखते हैं। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की भर्ती प्रक्रिया में स्पष्ट भेदभाव दिखाई देता है।”
प्रतिशत में दिए गए आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि आंकड़ों के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में से 4.38% अनुसूचित जाति (एससी) श्रेणी से, 2.36% अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी से, 13.49% ओबीसी श्रेणी से हैं, जबकि 79.76% न्यायाधीश सामान्य वर्ग से संबंधित हैं।
उन्होंने आगे बताया कि 2018 और 30 अक्टूबर, 2024 के बीच, संख्याएं समान रूप से निराशाजनक थीं, जिसमें अनुसूचित जाति श्रेणी से 3.07% (21), अनुसूचित जनजाति श्रेणी से 2.05% (14), अन्य पिछड़ा वर्ग से 11.99% (82) और शेष 82.89% (567) थे।
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उन्होंने कहा कि इससे यह संकेत मिलता है कि दलितों के अधिकारों की पर्याप्त रूप से रक्षा नहीं की जा रही है। जिससे संभावित रूप से उल्लंघन और अतिक्रमण हो सकते हैं। लोगों को चिंता है कि कुछ वर्गों से संबंधित न्यायाधीशों का एक संकीर्ण, समरूप समूह समाज के विविध विचारों और मूल्यों को प्रतिबिंबित नहीं कर सकता है, विशेष रूप से संस्कृति और पीढ़ीगत अंतर से संबंधित मुद्दों पर, क्योंकि वे कानूनों की व्याख्या अपने स्वयं के पृष्ठभूमि के आधार पर करते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि अधिक विविधतापूर्ण न्यायपालिका अत्यंत आवश्यक है। इसके बिना, कम प्रतिनिधित्व वाले समूहों के अधिकार अधिक खतरे में पड़ जाते हैं। जिससे भेदभाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐतिहासिक रूप से शोषित समूहों से न्यायाधीशों की कमी स्पष्ट संकेत देती है। यह योग्यता की कमी या अनुपलब्धता के कारण नहीं है, बल्कि उनके साथ भेदभाव करने और उन्हें न्यायपालिका से दूर रखने का एक दृढ़ निर्णय है। उन्होंने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति में संवैधानिक संशोधन की मांग की। साथ ही कहा कि ओबीसी/एससी/एसटी को आनुपातिक प्रतिनिधित्व में शामिल किया जाए। उन्होंने कहा कि कुछ समूहों का अत्यधिक प्रतिनिधित्व” वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली की “निष्पक्षता और सामाजिक विभाजनों से परे भर्ती करने में इसकी विफलता” पर सवाल उठाता है।
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