High Court on Encounter: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में मई 2025 में हुए एक पुलिस एनकाउंटर पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने एनकाउंटर के पूरे मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी है। इस एनकाउंटर में दुष्कर्म के 36 वर्षीय एक आरोपी के दोनों पैरों में गोली लगी थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस की कहानी पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं और सीबीआई को 3 महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी, जिसमें उम्मीद की गई है कि सीबीआई को जांच रिपोर्ट देनी होगी।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

दरअसल, 13 अगस्त को दिए अपने आदेश में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने यूपी पुलिस के एनकाउंटर करने के ढर्रे पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा, “आए दिन… जब भी पुलिस किसी व्यक्ति को पकड़ती है, तो अक्सर एक नई FIR दर्ज कर दी जाती है कि आरोपी ने पकड़े जाने पर पुलिस टीम पर अंधाधुंध फायरिंग की।

कोर्ट ने कहा, “आमतौर पर किसी भी पुलिसकर्मी की वर्दी तक को एक छर्रा भी नहीं छूता और वे सभी बाल-बाल बच जाते हैं। पुलिस एक गोली चलाती है और वह सीधे आरोपी के घुटने या उसके नीचे लग जाती है।”

कोर्ट की थी मिनी बस और पेट्रोलिंग की बात

पुलिस चार्जशीट के मुताबिक, आरोपी को नेपाल भागने से रोकने के लिए बिछाए गए जाल में SHO, 5 सब-इंस्पेक्टर, 1 हेड कांस्टेबल और 6 कांस्टेबल यानी कुल 13 लोग एक ही सरकारी गाड़ी में सवार थे। जज ने टिप्पणी की कि जब तक गाड़ी मिनी बस न हो, तब तक पेट्रोलिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले सरकारी वाहन में 13 लोगों का बैठना न तो व्यावहारिक है और न ही कानूनी रूप से सही।

SHO ने नहीं बताया सच

SHO अश्विनी कुमार दुबे का दावा था कि उन्होंने सिर्फ हथियार लोड होने की आवाज सुनकर आत्मरक्षा में रात में दो गोलियां चलाईं और दोनों गोलियां सीधे आरोपी के दोनों पैरों में जा लगीं। जब कोर्ट ने पूछा कि 15 मीटर की दूरी से रात में ऐसा सटीक निशाना कैसे लगा, तो SHO ने कहा कि उस रात चांदनी थी।

अदालत ने कहा कि प्रथमतया ऐसा प्रतीत होता है कि SHO ने FIR और कोर्ट दोनों में सच नहीं बताया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीबीआई जांच के दौरान संबंधित SHO की शूटिंग क्षमता (Shooting Ability) का भी मूल्यांकन किया जाएगा।

23 पुलिसकर्मियों के बीच जमीन पर लेटे आरोपी का “कबूलनामा”

हाईकोर्ट ने उस कथित “कबूलनामे” पर भी सवाल उठाए, जिसे पुलिस के अनुसार आरोपी ने दर्ज कराया था। कोर्ट ने नोट किया कि यह बयान आरोपी ने तब दिया जब वह पैरों में दो गोलियां लगने के बाद जमीन पर घायल पड़ा था और उसे 23 पुलिसकर्मी घेरे हुए थे। इसके अलावा, अदालत ने चिंता जताई कि आरोपी को कानूनी मदद (Legal Aid) तक नहीं दी गई और निचली अदालत ने बहुत जल्दबाजी में उसे उम्रकैद की सजा सुना दी।

आरोपी की पृष्ठभूमि का जिक्र

आरोपी पर पहले 2011 में एक नाबालिग से छेड़छाड़ और 2012 में एक बच्ची से दुष्कर्म व हत्या का आरोप लगा था। निचली अदालत और हाईकोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई थी लेकिन 12 साल जेल में बिताने के बाद 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे बेकसूर पाकर बरी कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट से रिहा होने के कुछ ही समय बाद 9 मई 2025 को आरोप पर 6 साल की बच्ची से दुष्कर्म का नया आरोप लगा। पुलिस का दावा था कि 11 मई को एनकाउंटर के बाद उसे गिरफ्तार किया गया और 3 अक्टूबर 2025 को पॉक्सो (POCSO) कोर्ट ने उसे उम्रकैद की सजा दे दी।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में अंदेशा जताया कि इस एनकाउंटर के पीछे पुलिस की नाराजगी भी हो सकती है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले मामले में आरोपी को बरी करते हुए अभियोजन पक्ष पर कड़ी टिप्पणियां की थीं। आश्चर्यजनक रूप से इस एनकाउंटर में शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए पुरस्कृत भी किया जा चुका है। हाईकोर्ट ने अब निचली अदालत को निर्देश दिया है कि आरोपी को पर्याप्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के बाद उसकी डिस्चार्ज याचिका पर नए सिरे से आदेश पारित किया जाए।

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में पति-पत्नी को लेकर अहम टिप्पणी की है। हाई कोर्ट ने कहा कि अगर दोनों पक्ष एक-दूसरे को गालियां देते हैं या अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं तो पत्नी को ‘बांझ महिला’ कहना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498-ए के तहत क्रूरता नहीं हो सकती है। पढ़िए पूरी खबर…