Legal News: उत्तर प्रदेश के एक व्यक्ति 2010 में लाल आंख की समस्या का सामना कर रहे थे। इसीलिए उन्होंने 500 रुपये के खर्च पर आंखों की जांच की कराई लेकिन ये उनके लिए एक बड़ा झटका साबित हुई। उनकी एक आंख की रौशनी स्थायी रुप से चली गई। जहां उन्होंने अपनी आंखों की जांच कराई थी, उस संस्थान के खिलाफ ही 15 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। अब राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ऑप्टिकल सेंटर को पीड़ित शख्स को 4.9 लाख रुपये का हर्जाना देने का आदेश दिया है।
एनसीडीआरसी के पीठासीन सदस्य डॉ. इंदर जीत सिंह और सदस्य न्यायमूर्ति डॉ. सुधीर कुमार जैन राकेश कुमार शुक्ला की बेंच ने आलोक आई हेल्थ एंड ऑप्टिकल सेंटर के खिलाफ दायर एक पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई कर रहे थे। इसमें जिला और राज्य उपभोक्ता आयोगों के उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिन्होंने पहले पीड़ित को राहत देने से इनकार कर दिया था।
एनसीडीआरसी ने बताया बड़ी लापरवाही
राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने 13 जून को कहा, “मान्यता प्राप्त चिकित्सा योग्यता न रखने वाले और भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम, 1956 के तहत पंजीकृत न होने वाले व्यक्ति द्वारा एलोपैथिक दवाएं निर्धारित करना, कानून के संचालन के तहत सेवा में कमी और लापरवाही का कार्य है।”
आप्टिकल सेंटर को आदेश दिया है कि वह पीड़ित को मुआवजे के तौर पर 2 लाख रुपये, शिकायत दर्ज करने की तारीख से अब तक के लिहाज से 9 प्रतिशत साधारण वार्षिक ब्याज और मुकदमेबाजी लागत के रूप में 20,000 रुपये का भुगतान करे। पीड़ित ने उपभोक्ता शिकायत 2011 में दर्ज कराई थी। एनसीडीआरसी का आदेश 2026 में पारित किया गया था, इसलिए अकेले ब्याज की राशि ही 2.7 लाख रुपये से अधिक होने की संभावना है, जिससे जुर्माने की कुल राशि लगभग 4.9 लाख रुपये हो जाएगी।
क्या है पूरा केस?
इस केस के रिकॉर्ड्स बताते हैं कि 9 जून 2010 को राकेश कुमार शुक्ला की बाईं आंख लाल हो गई थी। अगले दिन, वह इलाज के लिए उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती स्थित आलोक आई हेल्थ एंड ऑप्टिकल सेंटर गए। उन्होंने आरोप लगाया कि सेंटर में उनकी जांच की, दवाएं और आई ड्रॉप्स निर्धारित कीं, हस्तलिखित पर्चा तैयार किया और परामर्श और उपचार के लिए नकद में 500 रुपये लिए। हालांकि, उनकी हालत सुधरने के बजाय कथित तौर पर तेजी से बिगड़ गई।
पीड़ित ने की हर्जाने की मांग
राकेश शुक्ला की शिकायत में कहा गया है कि 11 जून, 2010 को शुक्ला बहराइच गए और नेत्र विशेषज्ञ डॉ. एके मिश्रा से परामर्श लिया, जिन्होंने गंभीर संक्रमण का निदान किया। 19 जून, 2010 को उन्होंने एक अन्य नेत्र विशेषज्ञ डॉ. किशन लाल से दूसरी राय ली, जिन्होंने भी आंख में गंभीर संक्रमण पाया। हालत बिगड़ने पर शुक्ला को 10 जुलाई 2010 को नई दिल्ली के डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेत्र केंद्र में भर्ती कराया गया।
इलाज के बावजूद उनकी बाईं आंख की रोशनी हमेशा के लिए चली गई। उन्होंने दावा किया कि उनके इलाज पर करीब 2 लाख रुपये खर्च हुए। 2011 में उन्होंने उपभोक्ता मंच से 5 लाख रुपये के मुआवजे, चिकित्सा खर्चों की वापसी, ब्याज और हुए नुकसान के लिए हर्जाने की मांग की।
जिला उपभोक्ता फोरम से झटका
राकेश शुक्ला की शिकायत श्रावस्ती स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम ने 31 जनवरी, 2017 को खारिज कर दी थी। हालांकि, फोरम ने यह पाया कि प्रतिवादी के पास एलोपैथिक दवाएं लिखने के लिए आवश्यक योग्यताएं नहीं थीं, लेकिन उसने यह भी माना कि शुक्ला सेवाओं के बदले भुगतान साबित करने में विफल रहे। परिणामस्वरूप फोरम ने निष्कर्ष निकाला कि वह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत उपभोक्ता नहीं थे और शिकायत खारिज कर दी। हालांकि, फोरम ने यह टिप्पणी की कि वह अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत किसी अन्य सक्षम न्यायालय के समक्ष उपचार का सहारा ले सकते हैं।
राज्य उपभोक्ता आयोग ने भी खारिज किया केस
जिला आयोग से बर्खास्तगी से नाराज होकर राकेश शुक्ला ने उत्तर प्रदेश राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के समक्ष अपील दायर की थी। अक्टूबर 2024 में राज्य आयोग ने जिला फोरम के फैसले को बरकरार रखा और अपील को खारिज कर दिया, जिससे राकेश को पुनरीक्षण याचिका के माध्यम से एनसीडीआरसी का रुख करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
राष्ट्रीय आयोग के समक्ष राकेश शुक्ला ने तर्क दिया कि दोनों निचली अदालतों ने मामले में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों की जांच करने में विफल रहे। इसमें यह भी शामिल है कि क्या प्रतिवादी कानूनी रूप से दवाएं निर्धारित करने के लिए योग्य था और क्या ऐसे उपचार के कारण उसकी दृष्टि चली गई। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उपभोक्ता मंचों ने उन साक्ष्यों को नजरअंदाज कर दिया है, जिनसे पता चलता है कि प्रतिवादी ने उनकी जांच की थी, दवाएं लिखी थीं और उपचार के लिए भुगतान स्वीकार किया था।
जिला और राज्य आयोग के आदेशों में गलतियां
एनसीडीआरसी ने स्वीकार किया कि जिला और राज्य आयोगों द्वारा गंभीर त्रुटियां की गई थीं। आयोग ने पाया कि जिला फोरम ने चिकित्सा लापरवाही, सेवा में कमी और अनधिकृत चिकित्सा अभ्यास से संबंधित मुख्य आरोपों पर निर्णय लिए बिना केवल शिकायत की स्वीकार्यता के मुद्दे पर ही उसे खारिज कर दिया था।
इसमें आगे कहा गया कि राज्य आयोग ने राकेश शुक्ला द्वारा 500 रुपये के भुगतान संबंधी हलफनामे को पर्याप्त सबूत मानकर उन्हें प्रभावी रूप से उपभोक्ता के रूप में स्वीकार किया था। हालांकि, ऐसा करने के बावजूद, आयोग ने कानूनी रूप से सही दृष्टिकोण नहीं अपनाया। राष्ट्रीय आयोग ने माना कि एक बार जब राज्य आयोग ने उपभोक्ता संबंध के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया, तो उसे विवाद में शामिल मूल मुद्दों को उचित रूप से संबोधित करना चाहिए था।
केस स्टडी से निकले अहम निष्कर्ष
राष्ट्रीय आयोग का यह फैसला बताता है कि उपभोक्ताओं को चिकित्सा उपचार प्रदान करने वाले व्यक्तियों की योग्यता की पुष्टि करनी चाहिए, खासकर जब दवाएं निर्धारित की जा रही हों। मरीजों को नुस्खे, बिल, रसीदें और मेडिकल रिकॉर्ड संभाल कर रखने चाहिए, क्योंकि विवाद उत्पन्न होने की स्थिति में ये दस्तावेज महत्वपूर्ण सबूत बन सकते हैं।
यह फैसला इस बात को भी पुष्ट करता है कि पेशेवर लोग अपनी योग्यताओं के दायरे से बाहर काम नहीं कर सकते। यदि किसी चिकित्सक के पास संबंधित क्षेत्र में डिप्लोमा भी है, तो भी वह योग्यता स्वतः ही उसे एलोपैथिक दवाएं लिखने का अधिकार नहीं देती है।
उपभोक्ताओं के लिए यह निर्णय इस बात पर जोर देता है कि अनधिकृत चिकित्सा उपचार उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के तहत दायित्व को आकर्षित कर सकता है। उपभोक्ता संबंधी शिकायतों के लिए व्यक्ति अपने-अपने राज्यों में उपभोक्ता हेल्पलाइन से संपर्क कर सकते हैं या सहायता के लिए राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915 पर कॉल कर सकते हैं।
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