इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में दहेज उत्पीड़न और घरेलू क्रूरता को लेकर सख्त टिप्पणी की। हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि विवाहित महिला के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को दहेज उत्पीड़न या घरेलू क्रूरता की उसकी शिकायतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस अब्देश कुमार चौधरी की पीठ ने कहा कि दहेज उत्पीड़न या वैवाहिक क्रूरता के पीड़ितों से समझौता करने की सलाह देने से उनका हौसला बढ़ेगा।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, हाई कोर्ट ने कहा, “अक्सर दहेज उत्पीड़न की शिकार महिला को बार-बार अपने परिवार को अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के बारे में बताने के बावजूद समझौता करने, विवाह बचाने या तालमेल बिठाने की सलाह दी जाती है। न्यायालय का मानना ​​है कि ऐसी सलाह अनजाने में ही अपराधियों को और ज्यादा साहसी बना सकती है और पीड़िता को निरंतर दुर्व्यवहार का शिकार बना सकती है, जिसके परिणामस्वरूप अंततः पीड़िता की मृत्यु तक जैसे दुखद और अपरिवर्तनीय परिणाम हो सकते हैं।”

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी 27 जुलाई को दहेज हत्या के एक मामले की सुनवाई के दौरान की। जिसमें एक महिला और उसकी 15 महीने की बेटी की हत्या हुई थी। अदालत ने गौर किया कि पीड़िता ने कई मौकों पर अपने परिवार के सदस्यों को अपने ससुराल वालों द्वारा लगातार दहेज की मांग और उनके द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न के बारे में बताया था।

पीठ ने कहा कि इस तरह की बार-बार की शिकायतों को सामान्य वैवाहिक मतभेद नहीं माना जाना चाहिए था। कोर्ट ने आगे कहा कि इन्हें मदद, सुरक्षा और समय पर हस्तक्षेप की वास्तविक गुहार के रूप में पहचाना जाना चाहिए था।

अदालत ने कहा कि कोर्ट का यह मत है कि इस मामले के तथ्य इस बात की याद दिलाते हैं कि जब भी कोई बेटी बार-बार अपने परिवार से सहायता मांगती है और अपने ससुराल में हो रहे उत्पीड़न, भय और अपमान को व्यक्त करती है, तो उसकी चिंताओं को सहानुभूति, गंभीरता और तत्परता के साथ सुना जाना चाहिए। परिवार का यह नैतिक और सामाजिक दायित्व है कि वह उसका समर्थन करे, उसकी बात पर विश्वास करे और उसकी सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए।

न्यायालय पीड़िता के पति, दो देवरों, सास और ससुर द्वारा दायर आपराधिक अपीलों पर सुनवाई कर रहा था। उन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304-बी के तहत दोषी ठहराया गया था और 2016 में एक निचली अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

साल 2011 का है मामला

2011 के एक मामले में दहेज की मांग पूरी न होने के चलते 25 वर्षीय मीना देवी और उनकी 15 महीने की बेटी की हत्या कर दी गई थी। आरोप यह था कि शादी के समय पीड़िता के परिवार वालों ने 2.26 लाख रुपये दिए थे, लेकिन इसके अलावा एक मोटरसाइकिल और 1 लाख रुपये की अतिरिक्त मांग भी की गई थी।

हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि साक्ष्य स्पष्ट रूप से दहेज हत्या और घरेलू क्रूरता के लिए कानूनी आवश्यकताओं को स्थापित करते हैं। अतः न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा। दहेज हत्या के मामलों में तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता पर जोर देते हुए न्यायालय ने कहा कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए कानूनी कार्यवाही आवश्यक और सराहनीय है, लेकिन वे समय पर हस्तक्षेप का स्थान नहीं ले सकतीं जो ऐसी मौतों को रोक सकती हैं।

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान मामला केवल आरोपियों को जवाबदेह ठहराने और कानून के अनुसार उन्हें दोषी ठहराने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक संदेश देता है कि बेटी द्वारा की गई मदद की हर गुहार को करुणा, गंभीरता और त्वरित कार्रवाई के साथ सुना जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि समय पर हस्तक्षेप से अपूरणीय क्षति को रोका जा सकता है, जबकि देरी से पश्चाताप और मुकदमेबाजी से खोई हुई जिंदगी को वापस नहीं लाया जा सकता।

न्यायालय ने आगे कहा कि यह परिवारों, समुदायों और समाज की साझा जिम्मेदारी है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी महिला को चुपचाप पीड़ा सहने के लिए मजबूर न किया जाए और मदद के लिए की गई हर पुकार का जवाब दिया जाए।

पीठ ने कहा कि परिवारों, रिश्तेदारों और समाज को यह समझना चाहिए कि दहेज उत्पीड़न या घरेलू क्रूरता की हर शिकायत पर तत्काल ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि बहुत देर होने से पहले इसका सार्थक और प्रभावी समाधान निकाला जा सके।

हालांकि न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन उसने आरोपी की सजा को आजीवन कारावास से घटाकर उतनी अवधि तक सीमित कर दिया जितनी अवधि वह पहले ही भुगत चुका है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा गया है कि निचली अदालत आईपीसी की धारा 304-बी के तहत अधिकतम सजा देने के कारणों को दर्ज करने में विफल रही है।

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