नासिक की एक कोर्ट ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के मामले में टीसीएस के कर्मचारी दानिश एजाज शेख की अंतरिम अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judge) वी.वी. कथारे ने मंगलवार को शेख की उस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया, जिसमें मुंबई नाका पुलिस स्टेशन में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) के संबंध में अग्रिम जमानत की मांग की गई थी। न्यायाधीश ने पाया कि एफआईआर से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से किए गए जानबूझकर कृत्यों का संकेत मिलता है।
21 अप्रैल के आदेश में कहा गया, “आवेदक के खिलाफ गंभीर आपराधिक इतिहास को देखते हुए एफआईआर में लगाए गए आरोपों की अलग से जांच नहीं की जा सकती। आरोपित अपराध के व्यापक सामाजिक परिणाम हैं, जो समाज में कानून व्यवस्था की स्थिति को प्रभावित करते हैं।”
इसके अलावा, न्यायाधीश ने कहा कि शेख को रिहा करने से जांच में बाधा आएगी, जो अभी भी अपने शुरुआती चरणों में है। शेख फिलहाल नासिक सेंट्रल जेल में एक महिला सहकर्मी के यौन उत्पीड़न के आरोपों पर देवलाली पुलिस स्टेशन में दर्ज एक अन्य मामले के सिलसिले में बंद है।
टीसीएस के एक कर्मचारी, कृष्णा माने ने एफआईआर दर्ज कराई है। जिसमें आरोप लगाया गया है कि 2022 से उनके सहयोगियों, जिनमें शेख और तौसीफ अत्तार शामिल हैं। उन्होंने ऐसी टिप्पणियां की हैं जिनसे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। एफआईआर में कहा गया है कि आरोपियों ने कथित तौर पर माने की हिंदू मान्यताओं के बारे में अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया, जबकि साथ ही इस्लाम की प्रशंसा भी की।
शिकायत में उन आरोपों का विस्तार से वर्णन किया गया है कि व्यक्ति को धार्मिक दबाव का शिकार बनाया गया था, जिसमें उसे कुरान पढ़ने और मांसाहारी भोजन का सेवन करने के लिए मजबूर करना शामिल था। इसके अलावा आरोपों में धमकी देना, सार्वजनिक रूप से अपमानित होना और वरिष्ठ अधिकारियों के पास प्रतिकूल रिपोर्ट दर्ज कराना शामिल है।
शिकायत में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की घटनाओं और महिला कर्मचारियों के प्रति यौन रूप से आपत्तिजनक टिप्पणियों के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया गया है।
अधिवक्ता उमेश वालजादे के माध्यम से दायर अपनी याचिका में शेख ने तर्क दिया कि अपराध सात साल से कम कारावास की सजा के योग्य हैं। उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और उनसे किसी प्रकार की वसूली की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि अग्रिम जमानत के माध्यम से उनकी स्वतंत्रता की रक्षा की जानी चाहिए।
लोक अभियोजक (Public Prosecutor) किरण बेंदभर ने अभियोजन पक्ष (Prosecution) की ओर से याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि शेख और सह-आरोपियों के खिलाफ गंभीर आरोप कई पंजीकृत अपराधों से संबंधित हैं। इसके अलावा, बेंदभर ने बताया कि एक विशेष जांच दल का गठन किया गया है और राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस मामले का संज्ञान लिया है। न्यायालय ने पुलिस को याचिका का जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की सुनवाई 27 अप्रैल को तय की।
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