करीब तीन दशकों तक चली एक लंबी कानूनी लड़ाई पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली को “स्पष्ट उदासीनता” बताया है। अदालत ने एक सरकारी कर्मचारी के मामले में न केवल तत्काल कैडर पुनःआवंटन (reallocation) का आदेश दिया, बल्कि राज्य सरकार पर 1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।
यह मामला एक ऐसे कर्मचारी का है, जिसने 1995 में संयुक्त अधीनस्थ सेवा परीक्षा पास की थी और उच्च अंक प्राप्त करने के बाद “हिल कैडर” (पर्वतीय क्षेत्र) में नियुक्ति का विकल्प चुना था। लेकिन तकनीकी कारणों के आधार पर उसकी नियुक्ति को शुरू में खारिज कर दिया गया। इसके बाद शुरू हुई उसकी लंबी कानूनी लड़ाई, जो 2026 तक जारी रही।
1997 से 2026 तक- न्याय के इंतजार में बीते साल
कर्मचारी ने 1997 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने 2004 में उसके पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि उसके साथ “अत्यधिक तकनीकी” दृष्टिकोण नहीं अपनाया जाना चाहिए और उसे अन्य उम्मीदवारों के साथ 1997 से ही नियुक्त माना जाए। हालांकि, उसे वेतन और एरियर का लाभ नहीं दिया गया।
राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती दी, लेकिन 2009 में उसकी अपील खारिज हो गई। इसके बावजूद, कर्मचारी को वास्तविक नियुक्ति 2011 में ही मिल सकी। यानी अदालत के आदेश के कई साल बाद भी उसे नौकरी पाने के लिए इंतजार करना पड़ा।
2011 में सेवा जॉइन करने के बाद भी उसकी मुश्किलें कम नहीं हुईं। उसने 2012 में कई बार आवेदन देकर अनुरोध किया कि उसे उसी “हिल कैडर” में भेजा जाए, जिसे उसने शुरू में चुना था। इसके पीछे एक महत्वपूर्ण मानवीय कारण भी था। उसका बेटा मानसिक रूप से दिव्यांग है और उसे परिवार के करीब रहने की जरूरत थी।
लेकिन इन आवेदनों पर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि 2011 के बाद से कर्मचारी को “दर-दर भटकने” पर मजबूर किया गया। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि अगर 2004 में हाईकोर्ट ने रास्ता साफ कर दिया था, तो कम से कम उसी समय उसे नियुक्त कर दिया जाना चाहिए था, भले ही राज्य सरकार ने अपील की हो। अदालत ने यह भी कहा कि 2009 में अपील खारिज होने के बावजूद 2011 तक नियुक्ति न देना प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है।
कोर्ट ने कहा- कर्मचारी को उसका हक देने में असामान्य देरी हुई
अदालत ने यह भी कहा कि 1997 से 2026 तक का समय यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि कर्मचारी को उसका हक देने में असामान्य देरी हुई। इस देरी को अदालत ने पूरी तरह से राज्य की “उदासीनता” बताया। इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू कर्मचारी का पारिवारिक हालात भी था। उसके बेटे को मानसिक रूप से दिव्यांग घोषित किया गया है और मेडिकल प्रमाण भी रिकॉर्ड में मौजूद है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में नियमों में विशेष छूट (exception) दी जाती है, जिसमें परिवार के सदस्य की बीमारी को भी ध्यान में रखा जाता है।
नियमों के अनुसार, कैडर आवंटन में कर्मचारी की पसंद, निवास स्थान और वरिष्ठता जैसे कारक देखे जाते हैं। इस मामले में कर्मचारी का निवास भी वर्तमान उत्तराखंड क्षेत्र में था और उसने शुरू से ही हिल कैडर का विकल्प चुना था। इसलिए अदालत ने माना कि उसका अनुरोध पूरी तरह उचित था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि “ट्रांसफर” और “कैडर परिवर्तन” अलग-अलग चीजें हैं। ट्रांसफर केवल कार्यस्थल बदलता है, जबकि कैडर परिवर्तन सेवा की पूरी संरचना को प्रभावित करता है – जैसे वरिष्ठता, पदोन्नति और सेवा शर्तें।
अदालत ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि कर्मचारी का कैडर तुरंत उत्तराखंड में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया पूरी की जाए। साथ ही, अदालत ने हाईकोर्ट से यह भी आग्रह किया कि ऐसे लंबित मामलों की संख्या का पता लगाया जाए और उन्हें तेजी से निपटाने की व्यवस्था की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह चिंता भी जताई कि कई कर्मचारी ऐसे हो सकते हैं जो सेवा विवादों के कारण सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच जाते हैं, लेकिन उन्हें समय पर न्याय नहीं मिल पाता।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं, बल्कि सरकारी प्रक्रियाओं में देरी और संवेदनहीनता का उदाहरण बन गया है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न सिर्फ उस कर्मचारी के लिए राहत है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी एक स्पष्ट संदेश देता है कि लंबे समय तक लटके मामलों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
