दिल्ली-NCR में हाल के दिनों में सामने आई रेप की घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। कोर्ट ने दिल्ली में चलती स्लीपर बस में नाबालिग से यौन उत्पीड़न की घटना को भी मामले में शामिल किया है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कोर्ट की रजिस्ट्री को इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज करने और सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने को कहा।

जस्टिस पारदीवाला ने कहा, ”इन मामलों को देखकर 2012 के निर्भया कांड की दर्दनाक यादें ताजा हो जाती हैं। इससे यह सवाल उठता है कि पिछले एक दशक में कानून लागू करने वाली व्यवस्था में वास्तव में कोई सार्थक सुधार हुआ है या नहीं।”

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में हाल में सामने आए रेप के मामलों पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि इन घटनाओं से साफ होता है कि कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियां और प्रशासन लोगों की बुनियादी सुरक्षा सुनिश्चित करने में गंभीर रूप से नाकाम रहे हैं।

कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक जगहों पर लोगों, खासकर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा करना प्रशासन की अहम जिम्मेदारी है। हाल की घटनाओं ने इस जिम्मेदारी को निभाने के तरीके पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

दिल्ली-एनसीआर में महिला सुरक्षा पर सवाल

गौर करने वाली बात है कि 21 सितंबर को दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पास आस्था कुंज पार्क में 17 साल की एक लड़की के साथ तीन लोगों ने गैंगरेप किया। बताया गया कि आरोपियों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर वारदात को अंजाम दिया।

इस महीने अब तक दिल्ली में यौन उत्पीड़न के कम से कम 13 मामले सामने आ चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली-NCR में लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं कानून लागू करने वाली एजेंसियों और प्रशासन की गंभीर नाकामी को दिखाती हैं। कोर्ट के मुताबिक, ये एजेंसियां लोगों की बुनियादी सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रही हैं।

व्यवस्था में आखिर जिम्मेदारी किसकी?

कोर्ट ने कहा कि बिना हिंसा के डर के सम्मान के साथ जीना हर व्यक्ति के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पार्क, सड़कें, बसें, मेट्रो स्टेशन, अंडरपास और फुटब्रिज जैसे सार्वजनिक स्थानों को लापरवाही के कारण असुरक्षित जगह नहीं बनने दिया जा सकता। खराब रोशनी, निगरानी की कमी, पुलिस की गश्त ना होना या प्रशासन की ऐसी कमियां जिन्हें रोका जा सकता है, लोगों की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं बननी चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी घटनाओं पर सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की चिंता जताना स्वाभाविक है। लेकिन अगर इसके साथ जवाबदेही तय नहीं होती तो यह पर्याप्त नहीं है। इससे इस बड़े सवाल का जवाब नही मिल पाता है कि व्यवस्था में आखिर जिम्मेदारी किसकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ”सिर्फ एकजुटता जताना इस सामाजिक बुराई का समाधान नहीं है।” कोर्ट ने कहा कि ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए ठोस और मापने योग्य कदम उठाने होंगे। इसके साथ ही अपराध रोकने, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और कमजोर वर्ग के लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों की है, उनकी जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।